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गरीबों के लिए कर्ज का पर्व

Posted On: 30 Aug, 2014  
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Junction Forum Others बिज़नेस कोच में

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जनता की चाहत

Posted On: 3 May, 2014  
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Others Politics social issues में

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देवालय या शौचालय

Posted On: 4 Oct, 2013  
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Junction Forum Others Others Politics में

6 Comments

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

आदरणीय डाकघर में आज भी बचत खाते, ,आवर्ती खाते ,सावधि खाते और मासिक आय योजना के खाते खोले जाते है !लेकिन कम ब्याज दरों के कारण और अभिकर्ताओं के कम कमीशन के कारण .डाकघरों से ज्यादा खाते निजी बैंको यथा संजीवनी और आदर्श में खोले जा रहे है जहाँ सरकारी ब्याज से कहीं ज्यादा ब्याज मिलता है और अभिकर्ताओं को भी ज्यादा कमीशन मिलता है ! बचत का सबसे बड़ा आकर्षण ब्याज है !इन दिनों डाकघरों को भी बैंक की तर्ज पर परिवर्तन की तैयारी चल रही है .लेकिन सर्वर आये दिन काम न करने के कारण सब निवेशक परेशान है ,पहले इन सब में सुधार जरुरी है ! मेरा आलेख एक पक्ष नहीं कह रहा है जो सच है वही कह रहा है ,! जन धन योजना में खता धारक को बीमा की सुविधा दी जा रही है क्या आपको लगता है जीरो बैलेंस खाते पर उन्हें बीमा लाभ मुफ्त में मिलेगा? जी नहीं उन्हें बीमा लाभ लेने के लिए प्रीमियम तो देना ही पड़ेगा !क्या डेबिट कार्ड से मुफ्त में खरीदारी होगी ? उधार की आदत विकसित होगी !शौक आएगा अमीर की तरह बड़े बड़े मॉल से खरीदारी करने का ..कर्जदार होकर लौटेंगे ...सिर्फ खाता खोलने से बचत नहीं होती .कोई धनवान नहीं होता .न ही अमीर और गरीब की खाई कम होगी ! आदरणीय मोदी जी ने जिस उद्देश्य से इस योजना की शुरुआत की है ...हम तो सिर्फ आशा कर सकते है और योजना की सफलता का इंतज़ार भी कर लेते है .सब कुछ भविष्य की गर्त में है ...उत्तरदायित्व निभाने के लिए बहुत कुछ है जिसको सुधारने की जरुरत है आपकी प्रतिक्रिया के लिए हम आपके आभारी है

के द्वारा: D33P D33P

नमस्कार जवाहर जी मछलियों को दाना खिलाएंगे तभी तो मछली जाल में आएगी ! ये जन धन योजना का बीमा और क्रेडिट कार्ड ये दाने है जो मोदी जी गरीबो को खिला रहे है ये दाने गरीब को बैंक में खाते खुलवाएंगे और बड़े बड़े मॉल में उधार में खरीदारी करने को मजबूर करेंगे और कर्ज के जाल में फंसेंगे एक दिन में डेढ़ करोड़ खाते ..!!!! शायद इतने खाते तो कोई एक बैंक पूरे साल में भी नहीं खोलती ,ये सब सरकारी आंकड़े है !गरीबो के लिए बहुत योजनाएं पहले भी चली उनसे गरीबो को कितना लाभ हुआ ..फायदा सिर्फ ऊपर वालो को हुआ ,हम भी निवेशकों के लिए बहुत योजनाएं चलाते थे ,असलियत क्या है कोई अनजान नहीं , परदे के पीछे असली फायदा किसे होता है ,हक़दार को तो कभी हुआ नहीं, अगर हुआ तो केवल कुछ प्रतिशत .. प्रतिक्रिया के लिए आभार ... शीशे का अक्स तो सुन्दर दिख रहा है पर फोटोशॉप न हो यही बेहतर होगा

के द्वारा: D33P D33P

आदरणीय गुरु जी आपने सही फ़रमाया एक ही दिन में रेकार्ड खाते खोले गए .वैसे आप किसी दिन बैंक या डाकघर जाकर देखिये कितने चक्कर में एक खाता खुलता है ! हो सकता है आदरणीय मोदी जी का मन से किया गया प्रयास अच्छे परिणाम दे ,दुआ भी है !पर हमारा कार्यक्षेत्र यही है ,हम रोज़ ऐसे ही किस्सों से दो चार होते है !जब भी किसी नए कार्य की शुरआत होती है तो सभी कर्मचारी कहे या सभी वर्ग उत्साह से कार्य करते है फिर वही डाक के तीन पात !कागज़ी प्रक्रिया से बचने के लिए आज भी लोग इकठे होकर vc चलाते है .हर माह कुछ निश्चित रकम किसी के पास रखते है !अभी हाल ही में हमारे शहर में ऐसे ही कोई महिला सबके पैसे हज़म कर गायब हो गई अब पुलिस भी कुछ नहीं कर पा रही !ऐसे लोगो से बचने के लिए बैंक में खाता खोले जाने की अच्छी शुरआत है ! ग्रामीण लोग शहर वासियों से ज्यादा चतुर होते है सरकारी योजनाओ और लाभ की योजनाओ पर उनकी खूब नज़र रहती है ,पर रोज़ कमाओ और रोज़ उड़ाओ वाली आदत क्या इतनी जल्दी खत्म हो जाएगी ?आखिर खाते में जमा करने के लिए भी तो जेब में कुछ होना चाहिए .रोजमर्रा के खर्चे और महंगी होती जा रही शिक्षा के बाद कुछ बचेगा तो ही बैंक में जमा कराया जायेगा और फिर इन खातों पर ब्याज कितना मिलेगा ?बैंको या डाकघर में राशि जमा करने का सबसे बड़ा आकर्षण ब्याज है जो आदर्श और संजीवनी निजी बैंक सरकारी योजनाओ में मिलने वाले ब्याज से दुगना ब्याज दे रही है ! आज के हालत में जो राशि बैंक या डाकघर में जमा होनी चाहिए वो इन निजी बैंको में जा रही है और इन पर सरकार का कोई अंकुश नहीं है ,सहारा कांड से भी आप अनजान नहीं होंगे बहुत लोगो की बड़ी बचत इनमे फंसी हुई है ! जन धन योजना में गरीब डेबिट कार्ड लेकर उधार में खरीदारी करेंगे ! साहूकारों के स्थान पर बैंको से कर्ज लेंगे ,,कर्जदार तो ये लोग रहेंगे ही ! इन गांव वालो को सरकारी नियम की समझ नहीं है उन्हें केवल प्रत्यक्ष लाभ नज़र आता है ,इन खातों से आगे इन्हे कितना लाभ होगा ,देखेंगे .... आपकी प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत आभारी है हम

के द्वारा: D33P D33P

आदरणीया दीप्ति जी ! प्रधानमंत्री जन धन योजना के नकारात्मक पहलुओं पर ही आपने विचार किया है और एक अधूरी जानकारी मंच पर प्रस्तुत की है ! मैं जहाँ रहता हूँ,वो गांव और शहर की सीमा रेखा है ! मैं अक्सर देखता हूँ कि इस गांव के मर्द बगीचे में बैठकर जुआ खेलते हैं और दारू पीते हैं ! अौरतें खून पसीना बहाकर कमाती हैं और मर्द मारपीट कर उनसे रूपये छीन ले जाते हैं ! इसीलिए अधिकतर अौरतें कालोनी में परिचित अौरतों के यहाँ अपने रुपए जमा करती हैं ! जिसदिन प्रधानमंत्री जन धन योजना का शुभारम्भ हुआ उस दिन शिविर में खाता खुलवाने के लिए इस गांव की अौरतों की लम्बी लाईन लगी थी ! वो सब बहुत खुश थीं ! आपने कहा है कि यह योजना गरीब की जेब में डाका डालने की योजना है ! गरीब हमलोगो से ज्यादा चतुर हैं ! वो सरकारी योजनाओं में कभी लुटते नहीं हैं,बल्कि उलटे सरकारी घन लूट लेते हैं ! मेरे विचार से तो ये योजना गरीबों के विकास और हित में बहुत कामयाब और मील का पत्थर साबित होगी ! इस योजना में बचत ,निवेश,सुरक्षा और बीमा सभी कुछ हैं ! आपका के लेख की सुंदरता और भाषा-शैली मुझे बहुत प्रभावित की ! शुभकामनाओं सहित-सद्गुरुजी !

के द्वारा: sadguruji sadguruji

धनवान वर्ग से तो पैसा निकाल नहीं पाये अब गरीब की जेब में डाका डालने की योजना आदरणीया दीप्ति जी , सादर अभिवादन ! बहुत दिनों बाद आपकी अर्थ ब्यवस्था पर आधारित आलेख पढ़कर बड़ी संतुष्टि हुई.... अभी ताल मैं तो यही समझ रहा था जो मोदी साहब बोल रहे थे - आर्थिक छुआछूत से छुटकारा. देखते देखते भारत के सभी गरीब अचानक अमीर बन गए... डेबिट कार्ड से बड़े बड़े मॉल में खरीदारी करने जा रहे हैं. ...सभी न्यूज़ पेपर, टी वी चैनेल, बड़े बड़े आर्थिक विशेषज्ञ तो यही कह रहे हैं. एक दिन में डेढ़ करोड़ खत खोलकर बैंक कर्मी भी अपनी कार्यक्षमता का परिचय दे चुके अब और जड़ा स्टाफ किसलिए चाहिए ...बताइये न! बाकी दिनों में यही बैंक कर्मचारी किसी काम के लिए कितना डेरी लगते हैं पर मोदी जी का डर ही कुछ ऐसा है किउनके खिलाफ कोई एक शब्द न तो बोल सकता हैं नहीं लिख सकता है ...आपके पोस्ट पर भी जो कॉमेंट आएंगे उन्हें पढ़ लीजियेगा... कोई सरकार २८ रूपये में अमीर बनती है तो कोई जीरो बैलेंस में भी...जय हो भारत की विकास यात्रा...अब बुलेट ट्रैन लाने गए हैं मोदी जी वहां भी मछलियों को दाना खिलने से नहीं चूके.

के द्वारा: jlsingh jlsingh

आदरणीय जवाहर सादर ,,नमस्कार ,,,आपका स्वागत है ,मुझे ख़ुशी है की पहली प्रतिक्रिया आपकी है ! सच तो ये है कि ये किसी के पक्ष में नहीं है ,..ये वास्तविकता है ,,,,,,,,,,सरकार को सभी धार्मिक प्रतिष्ठानों को प्रतिबंधित कर देना चाहिए .लेकिन आय प्राप्ति का जरिया होने से सरकार कोई सख्त कदम नहीं उठती,उल्टा ,कभी राम कभी अयोध्या के मसले उठाती है और चुनावी दांव खेलती है ! अब आप ही बताइए मंदिरों से आम जनता को क्या हासिल है ? कम से कम शौचालय आम जनता की सुविधा के काम तो आयेंगे ! कितने लोग फुटपाथ पर गुजर करते है ,जिनके पास ये आवश्यक सुविधा भी उपलब्ध नहीं है ,क्या वो किसी मंदिर का उपयोग कर सकते है ......नहीं उन्हें सही सुविधा मुहैया होनी चाहिए

के द्वारा: D33P D33P

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

आदरणीय दीप्ती जी, सादर ! इस घटना का प्रमुख कारण ऐन मौके पर प्लेटफार्म बदलने कि घोषणा है ! आखिर रेल कंट्रोल में बैठे अधिकारी क्या नशा किये रहते हैं जो ट्रेन आने के दस मिनट पहले प्लेटफार्म बदल देते हैं ! क्या उन्हें समझ नहीं है कि इससे उन यात्रियों को कितनी परेशानी होगी, जो बच्चों और सामान के साथ यात्रा कर रहे हैं ! अभी दो वर्ष पहले मुगलसराय स्टेशन पर भी सैकड़ों यात्रियों कि जान इसी वजह से मची भगदड़ से हुई थी ! और ये नेता.... ये नेता मानवता के नाम पर कलंक हैं ! लाशें पड़ी है, घायल चीख रहे हैं, हर तरफ अफरा-तफरी है, लोग बेहाल हो रहे हैं, स्ट्रेचर नहीं है, दवाइयां नहीं है, मदद नहीं है, एम्बुलेंस नहीं है, पर ये केवल बयान दे रहे हैं ! लगभग ५०० लोग लापता हैं, जानकारी देने वाला कोई नहीं ! करोड़ों - अरबों का फंड रखने वाली पार्टियां, चाहे वह कोई भी पार्टी हो, किसी ने इन बेबसों के लिए मदद का हाथ आगे नहीं बढ़ाया ! दो दिन होने को आये, भाजपा के नेता भी केवल बयान दे रहे हैं, घटना स्थल पर जाकर उनकी सुधि लेने का ख़याल इनको नहीं आया ! महज दस-बीस लाख के खर्च में हजारों लोगों कि परेशानियां दूर हो सकती थी, पर किसी पार्टी ने ऐसा नहीं किया ! धिक्कार है !

के द्वारा: shashibhushan1959 shashibhushan1959

अजय जी ...नमस्कार आपने सही कहा हमारा द्रष्टिकोण हमारी सोच को प्रभावित करता है .और हमारी सकारात्मक सोच सामने वाले को सकारात्मक रूप से प्रभावित करती है !सकारात्मक सोच की तरंगे नकारात्मक प्रभाव को समाप्त करती है !लेकिन हर जगह ये केवल हमारी सोच काम नहीं करती ......जितना हमारी सोच सामने वाले कि सोच को प्रभवित करती है उतनी ही सामने वाले की सोच हमारी सोच को भी प्रभावित करती है !हो सकता है किसी की नकारात्मक तरंगे हम पर भी नकारात्मक प्रभाव डाले उस समय इंसान का स्वयं पर नियंत्रण समाप्त हो जाता है !अनुशासित मस्तिष्क ही इस पर नियंत्रण रख सकता है जैसा कि आप स्वयं जानते है कि अनुशासित मस्तिष्क का निर्माण हर एक के लिए इतना आसन भी नहीं है !....जवाब देरी से देने के लिए माफ़ी चाहूंगी .....आपका सेमिनार सफल रहा होगा ....आपकी विस्तृत प्रतिक्रिया के लिए आभार

के द्वारा: D33P D33P

जवाहर जी सही कहा आपने इन आयोजनों में हमेशा जनता पिसती है .इलाहबाद के महाकुम्भ में कई नेताओ ने भी शिरकत की पर उनमे से किसी के साथ तो कोई हादसा सुनने में नहीं आया .क्यूंकि सारी सुरक्षा व्यवस्था उनको मिल जाती है और जनता पर लाठीचार्ज होता है !सीमित धनराशी जेब में हो और कोई परदेश में इस तरह के हादसों से दो - चार हो जाये तो परिजन की मृत देह को लेकर कोई कहाँ जाये किससे मदद मांगे ...कितनी दुखद स्थिति है !कल्पना से ही दिल दहल जाता है !धर्म के नाम पर हमारा आचार व्यवहार सयंमित है सही है .पर धर्म के नाम पर खिलवाड़ भी तो उचित नहीं है !करोडो लोगो को एक प्लेटफार्म से दुसरे प्लेटफार्म तक लोगो को दौड़ाना ......अफरातफरी तो होनी ही थी क्या रेलवे या प्रशासन को इस बात को अंदाज़ा नहीं था ?पर जो भी हुआ बहुत दुखद हुआ ..........लोगो की आस्था अंधी है .इससे इंकार नहीं किया जा सकता !प्रतिक्रिया के लिए आभार

के द्वारा: D33P D33P

के द्वारा: jlsingh jlsingh

आदरणीय दीप्ती जी, सादर प्रणाम | बहुत सुंदर कविता ..पर हमे इस संसार में की अच्छी बातो /विचारों पर कंसन्ट्रेट करने से ज्यादा फायदा हों सकता हैं ,लोग अच्छे हैं या बुरे हैं ..इसका निर्धारण हम अपने खुद के चश्मे से देखकर करते हैं,हमारा चश्मा ऐसा होना चाहिए की इससे हर माहौल या परिस्थिति कि सिर्फ अच्छी बाते दिखे तो जीवन संवर सकता हैं संयोग कि बात ये हैं की जिस समय मैं आपका ब्लॉग पढ़ रहा हूँ साथ ही एक सेमीनार कि तैयारी कर रहा हूँ जो कल देना हैं ,उसमे मैं विचार पर कुछ बोलने वाला हूँ जो इस प्रकार हैं - "विचार शक्तिशाली जीवित वस्तुएं हैं ,उर्जा के छोटे छोटे बंडल हैं यदि तुम समझना चाहों तों| अधिकतम लोग अपने विचारों कि प्रकृति पर कोई विचार नही करते लेकिन तुम्हारे विचारों कि मूल्यवत्ता तो तुम्हारे जीवन के स्तर का निर्णय करती हैं |विचार इस भौतिक दुनिया का उसी प्रकार से हिस्सा हैं जैसे वह झील जिसमे तुम तैरते हों या वह सड़क जिस पर तुम चलते हों |एक मजबूत अनुशासित मस्तिष्क ,जिसका निर्माण कोई भी दैनिक अभ्यास से कर सकता हैं ,अलौकिक चीजे प्राप्त कर सकता हैं |यदि तुम जीवन परिपूर्ण ढंग से जीना चाहते हों तो तो अपने विचारों कि ऐसे ही देखभाल करों जैसे अपनी सबसे कीमती वस्तुओ कि करते हों |आंतरिक अशांति को दूर करने के लिए कठोर परिश्रम करों |तुम्हे इसका प्रतिफल बहुतायत में मिलेंगा " कड़े शब्दों के लिए माफ़ी चाहूँगा |आपका अजय

के द्वारा: ajaykr ajaykr

सादर नमस्कार विजय जी ..............ये सब सत्ता के दंभ में है इनको जनता के दर्द से कोई लेना देना नहीं है ....मिडिया भी तो बिकी हुई है सत्ता की नकेल जिसके हाथ में है उसमे विदेशी खून है ,जो भारत की बेटी के खून पर नहीं रोयेगा . कल टीवी पर उनको आंसू बहाते देखा गया .उनके आंसू भी वोटो की राजनीती खेलते है !कितना शर्मनाक है सब !इतने बड़े हादसे के बाद भी अभी तक कुछ नहीं हुआ ,किस्से की तरह इसे भूलकर नया साल मनाएंगे अगले चुनावो की रणनीति बनायेंगे ! सबसे बड़ी बात इतनी बड़ी घटना के बाद, जिसके लिए पूरा देश हिल गया पूरे देश की जनता रोई .......क्या उन हादसों में कमी आई? सब कुछ तो वैसा ही है अपराधी को पुलिस का डर नहीं ,.पुलिस को जनता की चिंता नहीं .....सारी पुलिस व्यवस्था जनता की नहीं,नेताओ की हिफाज़त में लगी है जनता के प्रति पूरी तरह से संवेदनहीन ....... ...... प्रतिक्रिया के लिए आभार

के द्वारा: D33P D33P

नमस्कार सरिता जी सही कहा आज दामिनी नहीं रही पर देश के लिए कई सवाल दे गई .......और कितनी दामनियों को इन वहशियों के आगे अपनी जान देनी होगी अपनी सबको मातम मानते देखा सुना ....क्या होगा उससे ,लोगो ने आन्दोलन किया आक्रोश दिखाया ,किसके ऊपर फर्क पड़ा ....न सत्ता पर न मंत्रियो ,ना सांसदों पर !! पुलिस आन्दोलन को दबाने में लगी है !इतने जनाक्रोश के बाद भी उसी तरह की घटनाएँ अब भी हो रही है !अपराधियों को पुलिस का खौफ नहीं ,वहीं पीड़ितों को पुलिस पर भरोसा नहीं रहा है ।सारी पुलिस इन नेताओ की सुरक्षा के लिए है आम जनता की सुरक्षा के लिए नहीं ......थोड़े दिन में सब शांत हो जायेगा दिल्ली के इसी हादसे के बाद भी उसी दिल्ली में नया साल और गणतंत्र दिवस भी मनाया जायेगा आप देख लेना..मन त्रस्त है ......कल टीवी पर सोनिया गाँधी को रोते देखा मगरमच्छ के आंसू थे ,जिसमे वैसे ही विदेशी खून की बू है ...उसे क्या दर्द है देश का खून बहा या इस देश की बेटी की जान गई .बहुत गुस्सा भी रहा है पर हम और आपकी तरह सब बेबस है

के द्वारा: D33P D33P

के द्वारा: D33P D33P

जवाहर जी नमस्कार सही कहा .इनके लिए अपनी कुर्सी के सामने किसी की न तो जान की कीमत है न इज्ज़त की !कोई चिल्लाये तो पुलिस को दमन के लिए दौड़ा देते है ,देखिये प्रदर्शन कारियों को खदेड़ने के लिए कितना पुलिस बल है लेकिन जनता की सुरक्षा के लिए नहीं है ,यहाँ इनकी अपनी सुरक्षा का सवाल जो था !क्या पता आक्रोश में जनता इन्हें ही इनके घर से निकल कर पीट देती इसलिए इन पर सर्दी में पानी और ,लाठिया बरसाना जरुरी जो था मनमोहन,सोनिया,… राहुल, ! शिंदे, शीला दीक्षित, संदीप दीक्षित, सब एक ही थैली के चट्टे बट्टे है हैं!और आगे भी जो आयेंगे वो भी इन्ही की बिरादरी में से आयेंगे सहयोग और सकारात्मक प्रतिक्रिया के लिए आभार

के द्वारा: D33P D33P

आदरणीय दीप्ति जी, सादर अभिवादन! उपयुक्त समय पर सशक्त आलेख!.... पर अन्धो के आगे रोना, अपना दीदा (दृष्टि) खोना के सामान है! काश कि ये घटना किसी नेता, मंत्री की बेटी के साथ घटित होती तो ये क्या बयान देते! यह तो एफ. डी. आई. जैसा उपयोगी मुद्दा नहीं है जिसे जैसे तैसे पास करा दिया जाय! आज के लाठीचार्ज वाली घटना तो अग्रेज पुलिस की याद दिला रही है!...हाय रे पुलिस वाले तुम्हारी भी माँ बहने होंगी .... कितना कुछ कहूं. बहुत कुछ कहा जा रहा है, लिखा जा रहा है, चर्चाएँ हो रही हैं, नतीजा.....वही ढाक के तीन पात! आज एक अधेड़ महिला के मुख से सुना- "आज दिल्ली पुलिस ने हम सभी महिलाओं का सरेआम रेप कर दिया!" इससे बड़ी भर्त्सना और क्या होगी? ... मनमोहना, सुने नाही, सोनिया, बोले नाही... राहुला, देखे नाही! शिंदे, गंदे! शीला दीक्षित, भूली है जवानी, संदीप दीक्षित, नाही शिक्षित! ये मेरे भी आक्रोश हैं!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: manoranjanthakur manoranjanthakur

आदरणीया दीप्ति जी, वर्तमान में एफ.डी.आई. को लेकर सटीक चित्रों के साथ अत्यंत प्रासंगिक, मौलिक, विचारणीय और सुदृढ़ चेतना के साथ लिखा गया आलेख; हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! "हमारे पास उच्च टैक्नोलॉजी नहीं है, इस क्षेत्र में भी निवेश की अति आवश्यकता है। सुरक्षा के क्षेत्र में हम प्रति वर्ष अरबों रुपए के शस्त्र विदेशों से खरीदते हैं। बहुत-सी भारतीय कम्पनियां भारत में ही शस्त्र बनाती हैं। देश के विकास के लिए ऐसे बहुत से क्षेत्र हैं जहां विदेशी निवेश लाभदायक सिद्ध हो सकता है और नि:संदेह विदेशी कम्पनियां उचित कमाई कर सकेंगी। खुदरा व्यापार में भीमकाय बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रवेश से हमारे देश के आतंरिक व्यापार, बल्कि संपूर्ण अर्थव्यवस्था के ताने-बाने को गंभीर खतरा पैदा हो जायेगा."

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

नमस्कार मोहिन्दर जी आपने सही कहा अपने देश के पूंजीपति नेता सभी अपने से कमजोर का शोषण ही कर रहे हैं. किसान जो मेहनत करता है उसको लाभ न मिल कर बिचोलियों और पूंजीपतियों की चांदी कटती है. ये लोग जमाखोरी कर के आम जनता (उपभोग्ताओं) को लूटते हैं.!जो गलत है .फिर भी देश का धन देश में ही रहता है लेकिन इसका मतलब ये भी तो नहीं है एक विदेशी को देश की अर्थव्यवस्था सौप दी जाये और देश का पैसा देश से बहार ले जाने का परमिट दे दिया जाये ! देश के विकास के कई क्षेत्र है जहा विदेशी सहायता ली जा सकती है लेकिन खुदरा क्षेत्र में विदेशियों को अनुमति देना देश के रोजगार और अर्थव्यवस्था के साथ खिलवाड़ करना ही है ! कम्प्यूटर क्षेत्र, निर्माण, दूरसंचार, आटो मोबाइल, ऊर्जा क्षेत्र और खनन ऐसे क्षेत्र हैं जहां विदेशी निवेश देश के लिए फायदेमंद साबित होगा। भारत के हवाई क्षेत्र में अधिक निवेश चाहिए। विदेशो के मुकाबले हमारे पास उच्च टैक्नोलॉजी नहीं है, इस क्षेत्र में भी निवेश की अति आवश्यकता है.सरकार इसमें विदेशी निवेश आमंत्रित कर सकती है ! लेकिन यहाँ तो स्पष्ट दिख रहा है सरकार सिर्फ अपना लाभ सोच रही है इन धूसखोर और भ्रष्ट नेताओ को केवल अपना हित समझ आता है बाकि कुछ नहीं आता ! आम उपभोक्ता इसमें किस तरह लाभन्वित होंगे? वालमार्ट अपने क्रय मूल्य में जगह का किराया .अपने श्रम का मूल्य ,वस्तु का मूल्य ....और सबसे बड़ी बात भारत में घुसने के लिए किये गए व्यय को भी वसूलेगा .कुछ समय के लिए वो सब कुछ सस्ता लगेगा पर अपने पूरी तरह से पैर पसरते ही अपनी मनमानी करने से परहेज नहीं करेगा और उस समय बहुत देर हो चुकी होगी और हम बेबस हो चुके होंगे ! विगत दो तीन वर्षो से सरकार द्वारा कीमतों में इस कदर वृधि की है जिसके मुकाबले पहले पहल वालमार्ट की दरे कम लग सकती है पर दूरगामी परिणाम क्या होगा ये चिंतनीय विषय है आपके कीमती समय और सार्थक प्रतिक्रिया के लिए आभार

के द्वारा: D33P D33P

नमस्कार अशोक जी खुदरा बाजार में विदेशियों के प्रवेश पर एक आम आदमी उसके हश्र पर चिंतित है पर सरकार नहीं .ये समझ नहीं आता आजादी किसको मिली है देश की जनता को या देश के सत्ताधारियो को देश की जनता के साथ खिलवाड़ करने की .. ? उच्च संसदीय परम्पराओं के ज्ञाता ,अर्थशास्त्री ने देश का अर्थशास्त्र बिगाड़ने का निर्णय लेने से पहले एक बार भी नहीं सोचा .और देश को पुन्ह गुलामी की जंजीरे बांधने की सोच ली !देश की आजादी के इतने सालो बाद भी हम अपने देश के विकास करने में सक्षम नहीं हो पाए जो वालमार्ट को देश में पैर पसारने की अनुमति दे दी ? हमारा देश कब वास्तविक गुलामी (इन धूसखोर और भ्रष्ट नेताओ)से मुक्त हो पायेगा समझ नहीं आता आपके कीमती समय और सार्थक प्रतिक्रिया के लिए आभार

के द्वारा: D33P D33P

नमस्कार योगी सारस्वत जी , जब देश में चीनी माल आएगा तो हमारे देश की हमारी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट बंद होनी ही है ! भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता लालकृष्ण आडवाणी जी ने कहा कि जहां एक ओर भारत में वालमार्ट का स्वागत किया जा रहा है, उसी वालमार्ट के खिलाफ अमेरिका में प्रदर्शन हो रहे हैं और न्यूयार्क से उसका बोरिया-बिस्तर बांध दिया गया है। जिस दिन संप्रग सरकार ने वालमार्ट को एफडीआई का तोहफा सौंपा और लॉबिस्टों ने भरोसा दिलाया कि छोटे खुदरा व्यापारी सुरक्षित हैं, उसी दिन वेब समाचार पत्र, अटलांटिकसिटीज ने विदेशी मामलों की प्रसिद्ध पत्रिका से एक हेडलाइन दी थी- `रेडिएटिंग डेथ : हाउ वालमार्ट डिस्प्लेसेस नियरबाइ स्माल बिजनेसेस`। देश में जिन करोड़ों लोगों की जीविका गली-मुहल्ले में रेहड़ी-पटरी लगाकर सब्जी-भाजी बेचकर चलती है या गली के मुहाने की दुकान के सहारे रोजी-रोटी चल रही है,उन लोगों का क्या होगा.सरकार के इस फैसले के साथ एक सवाल उभरता है कि उन करोड़ों खुदरा व्यापारियों का क्या होगा जो अपनी छोटी-छोटी पूंजी के साथ अपनी आजीविका चला रहें है एफडीआई के देश में लागू होने से बेरोजगारी बढेगी।आज कृषि के बाद सबसे ज्‍यादा 18 से 20 करोड़ लोग खुदरा व्‍यापार पर ही निर्भर हैं!वालमार्ट के आने से इन लोगों पर सीधे प्रभाव पड़ेगा। पता नहीं देश की सरकार इन सबके बारे में क्यों नहीं सोच पा रही है ... प्रतिक्रिया के लिए आभार

के द्वारा: D33P D33P

के द्वारा: D33P D33P

एक साधारण सी सोच है कि वालमार्ट एक कंपनी है जिसका सामाजिक कार्य से कोई लेना देना नहीं है... और अगर कोई कंपनी १ करोड़ रुपये भारत में निवेश करती है तो उससे वो दस करोड़ रुपये बनाती है और अपने सैलरी वगैरह पर खर्चे करने के बाद भी वो कम्पनी पांच करोड़ लाभ कमाती है और उसे अमेरिका ले जाती है तो मुझे ये समझ नहीं आता कि इससे देश को क्या लाभ होता है.. मुझे ये समझ नहीं आता है इससे देश को क्या तरक्की होगी... कांग्रेसी देश को समझाने में लगे हैं कि इससे देश को फायदा होगा ...मुझे अभी तक एक भी फायदा समझ नहीं आया ... ऊपर ये देश जो कि एक विदेशी कम्पनी का २०० साल राज झेल चूका है.. फिर वही कहानी ...इतिहास अपने को दोहरा रहा है... और घरों में बैठे उसे देख रहे हैं आलसियों कि तरह ..... कभी कभी इतिहास को पढने में हम सोचते है ये देश कथित तौर पर विश्वगुरु होकर भी किता बेवकूफ रहा होगा जहाँ पहले ८०० साल मुस्लिम शासकों का और फिर २०० साल मुट्ठी भर अंग्रेजो का शासन रहा है... मगर आज कि स्थिति देखे तो तो इतना सब होने के बावजूद हम अपने आपको अकलमंद कह सकते है .. जहाँ फिर वालमार्ट ने १२५ करोड़ डालर लाबिंग( घूसबाजी ..रिश्वतबजी) में खर्च करके अपनी पैठ भारतीय बाज़ार में बना ली.. संभव है इससे देश का कुछ लाभ होने वाला हो मेरी नादान और मोटी बुद्धि को ये बात समझ न आती हो... ये बात तो केवल महामुनि अर्थशाष्त्री और महा मौनी सरदार जी जाने .....

के द्वारा: yogeshkumar yogeshkumar

वालमार्ट ज़्यादातर चीज़े चाइना से इम्पोर्ट करता हे और सभी को मालूम हे चाइना की चीज़े केसी होती हे.घटिया किस्म की चीज़े बेच के मुनाफा अपने देश में ले जाना चाहते हे.और भारत के करोडो लोगो को बेरोजगार और दरिद्र बनाना चाहते हे इसमें केंद्र सरकार पूरी तरह अमेरिका को सहयोग कर रही हे.!! क्या देसी बाजार पर कब्जा करने के बाद बहुराष्ट्रीय़ कंपनिया उन्हीं माल का उत्पादन किसान से नहीं चाहेगी जिससे उसे मुनाफा हो। ये कम्पनियाँ करोडो खर्च कर भारत में अपना विस्तार करेंगी तो क्या वो भारत में दान खाता खोलने आ रही है या मुनाफा कमाने ? या फिर सरकार यह भी समझ पाती कि जब मुनाफा ही पूरी दुनिया में बाजार व्यवस्था का मंत्र है तो दुनिया के जिस देश या बाजार से माल सस्ता मिलेगा वहीं से माल खरीद कर भारत में भी बेचा जायेगा। इसी बात को आगे बढाता हूँ ! मान लेते हैं की इससे ४० लाख नौकरियां मिलेंगी लेकिन जब हमारी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट बंद होती चली जाएँगी तो बेरोजगारी इससे कहीं ज्यदा बढ़ेगी और उसका आंकलन इस सरकार ने नहीं किया है !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

दिप्ती जी, सार्थक समसमायिक लेख के लिये बधाई. आपका सरोकार और चिन्ता जायज है. मुझे सिर्फ़ इतना कहना है कि अपने देश के पूंजीपति भी शोषण ही कर रहे हैं. किसान जो मेहनत करता है उसको लाभ न मिल कर बिचोलियों और पूंजीपतियों की चांदी कटती है. ये लोग जमाखोरी कर के आम जनता (उपभोग्ताओं) को लूटते हैं. शुरु शुरु में जब सिर्फ़ इंडियन एयर लाईनस उडान के क्षेत्र में थी मनमाने ढंग से किराया बसूलती थी. आज देखिये प्राईवेट निवेश ने आम आदमी की हद में हवाई यात्रा ला दी है. कहने का मतलब यह है कि FDI भी उपभोग्ताओं के लिये लाभकारी है... उपभोग्ता आम जनता है...हां पूंजी पति जरूर इस से प्रभावित होंगे क्योंकि अब उन्हें कम्पीटिशन में आ कर अपना मुनाफ़ा कम करना पडेगा. ये मेरे व्यक्तिगत विचार और आंकलन है....मेरा मन्तव्य किसी की भावनाओं को आहत करने की नहीं है. यदि किसी को ऐसा लगे तो क्षमा करें.

के द्वारा: Mohinder Kumar Mohinder Kumar

आदरणीया दीप्ति जी, सादर अभिवादन! मैंने आपसे आग्रह किया था ... और आपने विस्तृत जानकारी से परिपूर्ण आलेख को प्रस्तुत किया! इसके लिए आपका आभार! .....आपकी आशंकाएं बिलकुल सही है. सभी विद्वान और अर्थशास्त्री बखूबी इस खेल को समझ रहे हैं. नेता विपक्ष सुषमा स्वराज ने भी अपने भाषण में इन बातों का जिक्र किया था. .... कांग्रेस कैसे इस प्रस्ताव को पास करा पायी, वह भी सर्वविदित है .... समाधान क्या है? ....मेरे हिशाब से समाधान है, कांग्रेस को उखाड़ फेंकना और वैकल्पिक सरकार के लिए आम जनता को प्रशिक्षित करना! .....पर यह कौन करेगा ? आम आदमी पार्टी? क्या अभी यह इतनी सशक्त हो पायी है? भाजपा क्या अपने अंतर्विरोधों में जकड़ी नजर नहीं आ रही? भाजपा को पूर्ण बहुमत मिलेगा क्या? जबतक ब्यवस्था परिवर्तन नहीं होगा ... देश का विकास या आम आदमी का विकास कैसे हॉग???? प्रश्न अनुत्तरित है ... जरूरत है अच्छे, बुद्धिजीवी और इमानदार लोगों के सत्ता में भागीदार होने की... जबतक निजी स्वार्थ में लिप्त रहने वाले सत्ता की कुर्शी पर काबिज रहेंगे ... आम आदमी, मजदूर, किसान, ब्यापारी मुश्किल में ही रहेंगे! देश राम भरोसे चल रहा है ... राम की माया राम ही जाने! आपके सम्पूर्ण आलेख पठनीय और हृदयग्राही है ! पुन: आभार!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

Shrimati Diptiji, Ye to bahot hi acchhi bat hai ki aap bure logo me bhi acchhai dekhti hai. To phir aaj ke ravano ki acchhai ki jankari bhi aap ko hi vistar ke sath deni chahiye. Tabhi to log unke bure karmo ke bavjud unke acchhe guno ko jankar unki puja karenge maharashtra jile ke aadivasio ki tarah. Kahne ko to mere dil me bhi bahot kuch hai par itna hi kahunga ki shabdo ke jaal me ulajhkar agar aap Ravan ke sita haran ko sirf ek galti manti hai aur use ek swabhimani purush manti hai to aaj ke ravana bhi aapke liye swabhimani purush hi to hai kyonki ye bhi apne kisi na kisi apman ka badla lene ke liye hi aisa kar rahe honge. Rahi bat dushman ki acchhai swikar karne aur Burai se sabak lene ki to aapki jankari ke liye ye bata du ki burai ke pratik ke rup me hi ravan ke putle ka dahan uski buraiyon se sabak lene ke liye kiya jata hai. Aur aapke us bhramak tathya ke bare me bhi spasht karna chahta hu ki ravan apni ek galti ke karan aitihasic khalnayak nahi bana tha. Usse pahle bhi wah kai pap kar chuka tha. Jiska ullekh maine pichhli pratikriya me kiya tha. Aaj agar kusanskar aur amaryada ke ravan roj panap rahe hai to unhe niyantrit karne ke liye aap jaisi striyo ko ma sita jaise adarsh bhi to apnane honge. Ram jaise sanskar bhi apne putro me pallavit karne honge. Ladkiyo ko bhi apni suraksha ke prati sajag rahne ki jarurat hai. Har ladki ki suraksha ke liye ek sipahi to tainat kiya nahi ja sakta. Aise me ladkiyo ko judo karate sikhkar apne aap ko majbut karne ki bhi aavashyakta hai. Kisi nirjan sthan ya ratri ke samay apne parijano ka sath le. Naitik patan bhi is samasya ka mukhya karan hai. Pashchimi sanskriti ka anusaran kar ladkiya aajkal chhote kapde pahnana, ladko ke sath akele ghumna, partiyo me akele jana, inhi sab laparvahiyo ka labh uthakar bure log apni mansha me safal ho rahe hai. Police aur prashasan ke sath ye hamari bhi jimmedari hai ki ham apni suraksha ke prati utne hi sajag rahe. Acchhai aur burai ka sangharsh nirantar hota raha hai aur hota rahega. Bas hame jarurat hai to sangharsh ke liye taiyar rahne ki, taras khane ki nahi. Aur ab mujhe ummeed hai ki aap apne is blog me sudhar kar ravan par garv karne ki bat ko vapas lengi. Dhanyavad.

के द्वारा: raj1985 raj1985

श्रीमान राज जी नमस्कार ....... मुझे न रावण के गुणों का बखान करना है न श्री राम का गुणगान .आपको जो हालत है दिखाई नहीं देते !रावण दहन इसलिए होता है जिससे लोगो को समझ में आये कि बुरे का क्या हश्र होता है !हमारे देश में जहा सीता हरण की सजा रावण को हर साल दी जाती है उसी देश में कितनी सीतायें सुरक्षित है ,कितने राम है ?इस देश की बात कर रहे है ........क्या हालत है आज .सत्ता से लेकर जनता तक सब जगह एक से हालत है .आपको तरस नहीं आता जिस देश में आप है वहां ये सब देखकर ......आपके दिल में अच्छाई है पर सब ऐसे तो नहीं है न राज जी दिल में बहुत कुछ है लिखने के लिए पर ...एक ही बात कहूँगी ...... दुश्मन की भी अच्छाई स्वीकार करने और बुराई से सबक लेने में कोई बुराई नहीं है ....आप मेरे ब्लॉग तक आये इसके लिए आपका बहुत बहुत आभार ...और स्वागत है ,उम्मीद है आगे भी आपका सहयोग बना रहेगा और प्रतिक्रिया का इंतज़ार भी

के द्वारा: D33P D33P

रविन्द्र जी . ...........सादर नमस्कार .. जो हुआ उसे टाला जा सकता था रावण ज्ञानी जरुर था पर अहंकार के अधीन रावण ने सीता हरण का जो कृत्य किया वही उसके विनाश का कारण बना ........मेरा अभिप्राय रावण का गुणगान से नहीं है .....न मै राम विरोधी हु अभिप्राय केवल इतना है !हर साल रावण के पुतले को जलाने वाले ही समाज को कलंकित कर रहे है ,रावण दहन का उद्देश्य लोगो को बुराई का क्या हश्र होता है यही बताना है पर रावण दहन करने वाले ही बुराई में लिप्त है !आज समाज में क्या हो रहा है ? भ्रष्ठाचार .हत्या रेप अपहरण क्या कुछ नहीं हो रहा है जो लोग इन सबमे लिप्त है उनके अन्दर का रावण (बुराई ) नहीं मर सकता !ऐसे लोग रावण दहन करके क्या साबित करना चाहते है .........जलाना है तो अपने अन्दर की बुराई को जलाये ..रोज़ कागज़ का रावण जलाकर क्या होगा ?क्या आज लोगो को इतनी सी बात समझ में नहीं आती कि रावण अहंकारी था .चाहे जितने गुण हो पर उसकी बुराई ने उसका अंत किया ! आपने प्रतिक्रिया अंकित की इसके लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद

के द्वारा: D33P D33P

वासुदेव जी पुनः स्वागत करने पर मै हर्षित हु . ...........सादर नमस्कार ...........न मुझे वाल्मीकि की रामायण से मतलब है न तुलसीदास जी के गुणगान से ..और न ही मेरा अभिप्राय रावण का गुणगान से है .....न मै राम विरोधी हु अभिप्राय केवल इतना है !हर साल रावण के पुतले को जलाने वाले ही समाज को कलंकित कर रहे है ,रावण दहन का उद्देश्य लोगो को बुराई का क्या हश्र होता है यही बताना है पर रावण दहन करने वाले ही बुराई में लिप्त है !आज समाज में क्या हो रहा है ? भ्रष्ठाचार .हत्या रेप अपहरण क्या कुछ नहीं हो रहा है जो लोग इन सबमे लिप्त है उनके अन्दर का रावण (बुराई ) नहीं मर सकता !ऐसे लोग रावण दहन करके क्या साबित करना चाहते है .........जलाना है तो अपने अन्दर की बुराई को जलाये ..रोज़ कागज़ का रावण जलाकर क्या होगा ?क्या आज लोगो को इतनी सी बात समझ में नहीं आती कि रावण अहंकारी था .चाहे जितने गुण हो पर उसकी बुराई ने उसका अंत किया ! वासुदेव जी आपकी प्रतिक्रिया के लिए मै आपकी आभारी हूँ

के द्वारा: D33P D33P

शशिभूषण जी सादर नमस्कार ...........मेरा अभिप्राय रावण का गुणगान नहीं है .....न मै राम विरोधी हु अभिप्राय केवल इतना है !हर साल रावण के पुतले को जलाने वाले ही समाज को कलंकित कर रहे है ,रावण दहन का उद्देश्य लोगो को बुराई का क्या हश्र होता है यही बताना है पर रावण दहन करने वाले ही बुराई में लिप्त है !आज समाज में क्या हो रहा है ? भ्रष्ठाचार .हत्या रेप अपहरण क्या कुछ नहीं हो रहा है जो लोग इन सबमे लिप्त है उनके अन्दर का रावण (बुरे ) नहीं मर सकता !ऐसे लोग रावण दहन करके क्या साबित करना चाहते है .........जलाना है तो अपने अन्दर की बुराई को जलाये ..रोज़ कागज़ का रावण जलाकर क्या होगा ? आपकी प्रतिक्रिया के लिए मै आपकी आभारी हूँ

के द्वारा: D33P D33P

लंका वाले रावण के अपने उसूल थे,अपने कुछ कायदे थे,वो निहायत ही नियम-सम्मत तरीके से अपना विरोध प्रकट करता था,राक्षस था किन्तु उसूलों का पक्का था,इस मुह्जली कांग्रेस सरकार की तरह अनाचारी नहीं था,यही कारण रहा कि उसकी हत्या करने के लिए भगवन ने खुद अवतार लिया और उसके मोक्ष का मार्ग प्रसस्त किया,लेकिन ये सरकार अपने कर्मों से अपना गला खुद घोट रही है,इसके कर्म ही इसको ले डूबेंगे,इनमे शामिल लोगों को मोक्ष प्राप्ति कि आशा छोड़ देनी चाहिए,इन्हें मारने के लिए भगवन को अपना वक़्त जाया करने कि कोई जरुरत नहीं,इनका जाना आत्महत्या होगी,जिसकी सजा है कि अगले जन्म में नाली के कीड़े बनेंगे.आपके आलेख को मेरा समर्थन,अच्छा लगा. :)

के द्वारा: rahulpriyadarshi rahulpriyadarshi

आदरणीय दीप्ति जी,आपके ब्लॉग पर संभवतः पहली बार ही आया हूंगा और यह पहली-दूसरी बार ही होगा कि किसी ब्लॉग पर दोबारा आकार प्रतिक्रिया दे रहा हूँ। आप पुनः वहीं भ्रमित हो गईं और विशेषताओं अथवा गुणों को सद्गुण के रूप में मान रही हैं। गुण निरपेक्ष है, दुर्गुण सद्गुण चरित्र को स्पष्ट करते हैं। मैंने पहले ही लिखा कि शौर्य, पराक्रम, शास्त्रज्ञता, पांडित्य विशेषताएँ/गुण हैं सद्गुण नहीं..! उसने शिव की भक्ति की तो भी अपने स्वार्थ व संसार के त्रास के लिए! आपने जो श्लोक दिया है वह सन्दर्भ से हटकर दिया है। इस श्लोक में रावण का कथन उसकी सच्चरित्रता का द्योतक नहीं है, वह सीता को अपने कपट शब्दों में फंसाना चाहता था। यह वाल्मिकीय रामायण के युद्धकाण्ड में स्वयं रावण ने ही स्पष्ट किया है जब सभा में रावण से नारान्तक ने पूंछा कि आपने सीता को अशोक वाटिका में क्यों रख छोड़ा है, आप बलपूर्वक भी भोग की अपनी लालसा पूर्ण कर सकते हैं? रावण ने कहा कि दुर्भाग्य से मैं ऐसा नहीं कर सकता क्योंकि मैं एक नारी के श्राप से पीड़ित हूँ जिसका मैंने बलात्कार किया था। यदि मैं किसी स्त्री की इच्छा के बिना उसका भोग करूंगा तो वरदान (अमरता का) खंडित होकर मेरे मस्तक के टुकड़े टुकड़े हो जाएंगे। रावण असंख्य स्त्रियॉं के बलात्कार का अपराधी था, उसने असंख्य मानवों ऋषियों की हत्या की थी जैसा कि रामायण में बार बार आता है। उसकी जितनी भी विशेषताएँ आपने गिनाईं हैं उनका उसने संसार पर अत्याचार में प्रयोग किया। सीधी सी बात है रामायण की भूमिका ही यही है कि जब रावण के अत्याचारों से पृथ्वी त्राहि त्राहि कर उठी तो नारायण ने राम के रूप में अवतार लिया। यही हिन्दुओं का विश्वास है जिसे रामायण ने अत्याचार के विरुद्ध सृजित किया। फिर रावण सच्चरित्र कहाँ से हो जाएगा.? विशेषताओं की प्रशंसा रामायणकार ने मुक्त कंठ की है व हिन्दू समाज भी उसकी प्रशंसा करने में संकोच नहीं करता। किन्तु विशेषता को जो आपने सद्गुण सिद्ध करने का प्रयास किया वह निरर्थक व रामायण की भावना व उद्देश्य के ही विरुद्ध है। कई द्वेषभाव से पीड़ित लेखक संदर्भों को तोड़मरोड़ कर ऐसी पुस्तकें लिखते हैं, मैं उनसे परिचित हूँ। किन्तु आपसे निवेदन है कि आप रामायण को मूल में रखकर निष्कर्ष निकालें ऐसी किसी पुस्तक के आधार पर नहीं!! पूरी विनम्रता के साथ अपनी बात रखने के बाद आपके द्वारा ब्लॉग पर किए गए स्वागत के लिए आपको धन्यवाद देना चाहूँगा। साथ ही आपकी सोच सकारात्मक है इसके लिए भी आपको हार्दिक साधुवाद।

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi

यतीन्द्र जी सादर नमस्कार .आप किस मर्यादा की बात कर रहे है ?गुवाहाटी के सरे राह एक लड़की को शिकार बनाने की बात को या सडको पर दौड़ती बंद कार से रेप के बाद सड़क पर फेंक दी गई लड़की की मर्यादा या राजस्थान के भवरी कांड में लिप्त सत्ता के दल्लो की मर्यादा या हरियाणा के सत्ता धारी द्वारा अंजाम दिए गए गीतिका-कांडा कांड की .ये तो कुछ मसले है जो लोगो की नज़र से गुजरे ......ऐसे अनगिनत कांड होंगे जो किसी को पता भी नहीं होंगे !हम भी इसी देश के नागरिक है ,ये देश हमारा है पर जो आज हालत है वो किसी भी सच्चे नागरिक को दुखी करने के लिए काफी है !दुखी होने वाले देश के दुश्मन नहीं है पर जो देश को गर्त में ले जा रहे है वो दुःख और देश के विनाश का कारण जरुर बन रहे है ! आप मेरे ब्लॉग तक आये आपका स्वागत है और प्रतिक्रिया के लिए आभार भी साथ ही विजयादशमी के पावन पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएं.स्वीकार करे

के द्वारा: D33P D33P

दीप्ति जी              सादर, बहुत सुन्दर आलेख. इसमें कोई शक नहीं है कि धर्म ग्रंथों में जों रावण कि छवि पर्स्तुत कि गयी है उसका स्पष्ट उद्देश्य है कि जों व्यक्ति इतना बलशाली हो जिसके कब्जे में शनि जैसे डरावने गृह हो जिसका पुत्र भाई और पूरा ही परिवार इतना बल शाली हो जो स्वयं इतना पुन्य कमा चुका है कि उसका कहीं कोई तोड़ ही नहीं हो उसकी म्रत्यु कैसे हो देवताओं के लिए भी प्रश्नचिन्ह खडा कर दे. ऐसा व्यक्ति भी जब एक अनैतिक कार्य करता है तो फिर उसकी मौत निश्चित है. सीता हरण एक अनैतिक कार्य ही था. रावण का पौरुष इस बात में था कि वह लक्षमण को या तो शूर्पनखा से विवाह के लिए बाध्य कर दे या फिर प्रतिशोध स्वरुप उसे दंड दे. रामायण सीखने का विषय है किसी ने क्या किया क्या कहा का विषय नहीं है. आज रावण दहन जिन उद्देश्यों को लेकर शुरू किया गया था. वह पूर्ण नहीं हो रहे हैं और देश में असुरी शक्ति बढ़ रही है. रावण दहन का अब कोई अर्थ नहीं. सुन्दर आलेख के लिए बधाई स्वीकारें.

के द्वारा: akraktale akraktale

आदरणीय वासुदेव जी नमस्कार  निसंदेह जैसा कि आज तक हमने पढा है  राम एक आदर्श पुत्र थे। पिता की आज्ञा उनके लिये सर्वोपरि थी । पति के रूप में राम ने सदैव एकपत्नीव्रत का पालन किया। राजा के रूप में प्रजा के हित के लिये स्वयं के हित को हेय समझते  थे। विलक्षण व्यक्तित्व था उनका। वे अत्यन्त वीर्यवान, तेजस्वी, विद्वान, धैर्यशील, जितेन्द्रिय, बुद्धिमान, सुंदर, पराक्रमी, दुष्टों का दमन करने वाले, युद्ध एवं नीतिकुशल, धर्मात्मा, मर्यादापुरुषोत्तम, प्रजावत्सल, शरणागत को शरण देने वाले, सर्वशास्त्रों के ज्ञाता एवं प्रतिभा सम्पन्न थे । लेकिन साथ ही वाल्मीकि जी ने रावण के गुणों को निष्पक्षता के साथ स्वीकार करते हुये उसे चारों वेदों का विश्वविख्यात ज्ञाता और महान विद्वान बताते हैं। वे अपने रामायण में हनुमान का रावण के दरबार में प्रवेश के समय लिखते हैं- अहो रूपमहो धैर्यमहोत्सवमहो द्युति:। अहो राक्षसराजस्य सर्वलक्षणयुक्तता॥ आगे वे लिखते हैं "रावण को देखते ही राम मुग्ध हो जाते हैं और कहते हैं कि रूप, सौन्दर्य, धैर्य, कान्ति तथा सर्व लक्षणयुक्त होने पर भी यदि इस रावण में अधर्म बलवान न होता तो यह देवलोक का भी स्वामी बन जाता।"वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस दोनों ही ग्रंथों में रावण को बहुत महत्त्व दिया गया है। राक्षसी माता और ऋषि पिता की सन्तान होने के कारण सदैव दो परस्पर विरोधी तत्त्व रावण के अन्तःकरण को मथते रहते हैं। वाल्मीकि रावण के अधर्मी होने को उसका मुख्य अवगुण मानते हैं।तुलसीदास जी केवल उसके अहंकार को ही उसका मुख्य अवगुण बताते हैं। उन्होंने रावण को बाहरी तौर से राम से शत्रु भाव रखते हुये हृदय से उनका भक्त बताया है। तुलसीदास के अनुसार रावण सोचता है कि यदि स्वयं भगवान ने अवतार लिया है तो मैं जाकर उनसे हठ पूर्वक बैर करूंगा और प्रभु के बाण के आघात से प्राण छोड़कर भव-बन्धन से मुक्त हो जाऊंगा।रावण जहाँ दुष्ट था और पापी था वहीं उसमें शिष्टाचार और ऊँचे आदर्श वाली मर्यादायें भी थीं। राम के वियोग में दुःखी सीता से रावण ने कहा है, "हे सीते! यदि तुम मेरे प्रति काम भाव नहीं रखती तो मैं तुझे स्पर्श नहीं कर सकता।" शास्त्रों के अनुसार वन्ध्या, रजस्वला, अकामा आदि स्त्री को स्पर्श करने का निषेध है अतः अपने प्रति अकामा सीता को स्पर्श न करके रावण मर्यादा का ही आचरण करता है।रावण में कितना ही राक्षसत्व क्यों न हो, उसके गुणों विस्मृत नहीं किया जा सकता। रावण एक अति बुद्धिमान ब्राह्मण तथा शंकर भगवान का बहुत बड़ा भक्त था। वह महा तेजस्वी, प्रतापी, पराक्रमी, रूपवान तथा विद्वान था। लेकिन अहंकार जैसा की सर्वविदित है बुद्धि हर लेता है ,अहंकार जब बुद्धि हर लेता है, तो ज्ञानियों और शुभचिंतकों की सलाह भी अनसुनी कर दी जाती है। इसका परिणाम सर्वनाश के रूप में होता है वही रावण के साथ हुआ ,उसके सब गुणों पर अहंकार भारी रहा जो उसके विनाश का कारण बना ! हम हिन्दू है ,भारतवासी है जहा हर साल हम अपने इष्ट के सम्मान में रावण जला कर उनकी स्तुति करते है .....शायद रावण की प्रशसा करने से डरते है कि कोई क्या कहेगा ,क्यूंकि हम लकीर के फ़कीर है .अच्छे कि अच्छाई को स्वीकार करने में भी डरते है !मै राम विरोधी या धर्म विरोधी नहीं .पर दुशमन कि अच्छाई को स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं है मुझे ! मेरा यह मानना है हर इंसान के ह्र्ध्य में राम और रावण (अच्छाई और बुराई .(रावण को बुराई का नाम मैंने इसलिए दिया क्यूंकि सदियों से हम -आप उन्हें यही संबोधन देते आये है ) बसते है !बस मौका मिलने की देर है .रावण अपना सर उठा लेता है !आज कितने रावण हमारे समाज में सर उठाये घूम रहे है-हरियाणा के विवादास्पद का गीतिका कांडा कांड ..राजस्थान के भवरी कांड के राजनैतिक हस्तिया , बैंगलोर का गैंगरेप.. 2008 में राजधानी दिल्ली से सटे नोएडा में 14 वर्षीया आरुषी तलवार की हत्या ,गुवाहाटी कांड ,अपहरण इस तरह की अनगिनत घटनाएँ हम रोज़ समाचार पत्रों में टीवी पर देख सुन रहे है क्या इनको अंजाम देने वाले राम है ?ये रावण है जो हर साल हमारे सामने रावण के पुतले जलाते है पर अपने अन्दर के रावण को नहीं मार सकते जो मौका पाते ही बुराई को अंजाम देते है ........ वासुदेव जी रामायण .महाभारत , गीता की हमें उतनी ही जानकारी है जितना हमे साहित्य में उपलब्ध है या जितना हमने पढा है इसमें विविधता हो सकती है पर यह हमारे विवाद का मुद्दा नहीं है बात यहाँ रावण और श्री राम के गुणों और अवगुणों के बखान की भी नहीं है ,बात है बुराई की जो आज भी हमारे समक्ष है उसे दूर करने की ! आप शायद पहली बार मेरे ब्लॉग तक आये है आपका स्वागत है , आपने समय दिया उसके लिए मै आपकी बहुत बहुत आभारी हु

के द्वारा: D33P D33P

आदरणीय दीप्ति जी, पूर्ण विनम्रता के साथ कुछ बिन्दु रखना चाहूँगा। रावण के विषय में मैंने आपने अथवा किसी अन्य व्यक्ति ने कहाँ से जाना होगा; निःसंदेह रामायण से ही.! तो क्यों न रामायण का गंभीर अध्ययन किया जाये ताकि इस तरह के भ्रमों से बचा जा सके जोकि आपके लेख में प्रतिबिंबित हो रहे हैं.! स्वयं रामायणकार रावण को कभी महान नहीं कह सका, उसने उसे अधम की श्रेणी में रखा., किन्तु आज के विद्वान न जाने कहाँ कहाँ से उसमें सद्गुणों को ढूंढ लाते हैं.!! मुझे बचपन से ही वाल्मीकि रामायण, मानस, अध्यात्म रामायण सहित अन्य कई ग्रंथों (पुराणों) के अध्ययन का अवसर मिला.. किन्तु ऐसी व्याख्याए खान से निकलती हैं मैं नहीं समझ पाता हूँ.! शास्त्रों का ज्ञाता होना, तंत्र अथवा रसायन का ज्ञाता होना अथवा महापंडित होना विशेषता तो होती है किन्तु सदगुण नहीं होता.! सद्गुणता अपनी सामर्थ्य व विशेषताओं के प्रयोग से सिद्ध होती है| विस्तार भय से मानस अथवा श्रीमद्वल्कीयरामायण के श्लोकों सन्दर्भों को नहीं रख सकता किन्तु एक श्लोक है संस्कृत में- "विद्या विवादाय धनम् मदाय, शक्ति: परेषाम् परिपीडनाय। खलस्य साधोर्विपरीतमेतद्ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय॥ अर्थात दुष्ट की विद्या विवाद के लिए, धन अहंकार के लिए, शक्ति दूसरों को कष्ट देने के लिए होती है। इसके विपरीत सद्गुणी साधु पुरुष के उपरोक्त गुण क्रमशः ज्ञान, दान व पर-रक्षा के लिए होते हैं। भारतीय दर्शन में विद्या व ज्ञान दो भिन्न स्थितियों के लिए अभिप्रेत हैं। रावण किस स्थिति में था..?? बल से सम्पूर्ण ब्रम्हाण्ड में उसके मचाए हाहाकार का विस्तृत वर्णन मिलता है- "अस भ्रष्ट अचारा.....। "हिंसा पर अति प्रीति तिन्ह के पापन कवन मिति"। सीता का अपहरण पहला पाप नहीं था जैसा कि आपने लिखा... हजारों स्त्रियॉं के बलात्कार का पाप अपने सिर ढोये घूमता था रावण। एक बलात्कारित स्त्री के श्राप के कारण ही रावण को सीता को अशोक वाटिका में रखना पड़ा था। वाल्मीकि रामायण के युद्धकाण्ड में पढ़ें। मानस के अरण्यकाण्ड में पढे कि मनुष्यों ऋषि मुनियों को उसके अनुचर मार के खा जाते थे; "निसिचर निकर सकल मुनि खाये..." विद्या में जिस तंत्र रसायन का आपने उल्लेख किया उसे मानस के लंकाकाण्ड अथवा वाल्मिकीय के उत्तरकाण्ड में पढ़ें, संसार के त्रास के लिए किस प्रकार प्रयोग किया गया.! रावण बहन का बदला राम लक्ष्मण से न लेकर चोरी से भेष बदलकर स्त्री चुराकर लेता है, आपको वो भी सही लगता है.! विस्तार तो बहुत है, उचित होगा आप रामायण में ही पढ़ें तथा सामर्थ्य व सद्गुणों में भी अंतर समझें। रामायण का रावण तो ऐसा ही है जिसे रामायण में दुष्ट, सठ, अधम, पापमति, निर्लज्ज, परस्त्रीगामी, हिंसक व अत्याचारी विशेषणों से भूषित किया गया है...! आपका रावण कहाँ से आया... कहना कठिन है! किन्तु पुतला उसी रावण का जलाते हैं जिसके विषय में हम रामायण जानते हैं और उसे बुराई के प्रतीक के रूप में मानते हैं.! ...और आज राम हजारों सीताओं की रक्षा के लिए कहाँ से निकलकर आएंगे जब आज रावण को ही सही ठहराया जाने लगा है..????

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi

आदरणीया, सीता-हरण सर्वथा अनुचित था, सूपर्णखा की नाक काटना भी उतना ही अनुचित था, उसके विवाह-प्रस्ताव को और सीता पर उसके प्रहार को और तरीके से टाला जा सकता था | आप ने महा प्रतापी लंकेश के जीवन और कर्म का प्रामाणिक वर्णन किया है और आज के रावणों से बखूबी जोड़ा है | इस अच्छे आलेख की ये पंक्तियाँ मुझे ज्यादा अपील करती हैं -- " क्या आज कोई भी स्त्री राम जैसे पति का वरण करना चाहेगी जो अपने जीवन का लम्बा समय पति के साथ वनवास का भोगने के बावजूद किसी की बातो में आकर गर्भवती अवस्था में उसका परित्याग कर दे ? आज उसी रावण को एक बार मारने के बाद रोज़ रोज़ मार कर उत्सव मनाया जाता है दुख का विषय है कि आज हम चाहे कितने ही रावण जला लें लेकिन समाज में कुसंस्कार और अमर्यादा के रावण रोज पनप रहे हैं। सीता के हरण पर रावण का वध करने और उत्सव मानाने वाले देश की कितनी सीताये रोज़ किसी न किसी रावण के हाथो बेइज्जत हो रही है,कभी गुवहाटी में सरे राह रावणों के बीच अपमानित होती है कभी दिल्ली में किसी सड़क पर दौड़ती बंद कार में .! देश में असली रावण तो आजाद घूम रहे है और उनके पुतले जलाकर किस बात के उत्सव मनाये जा रहे है ? दशहरे के नाम पर लाखो रूपये फूंके जा रहे है !!रावण ने जो किया वो एक स्वाभिमानी भाई की तरह एक भाई होने का फ़र्ज़ निभाया !लेकिन क्या आज कोई राम है जो देश की लुटती हुई सीताओ को बचा सके !" अभिनव कुकर्मी मनुष्य से जोड़कर इस पौराणिक आख्यानक लेख की प्रस्तुति पर हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

दीप्ति जी नमस्कार , आपके खयालात मुझसे कितने मिलते हैं....मैं आपके रावण के बारे में जानकारी से आश्चर्य चकित हूँ। चूंकि मैं निजी तौर पर रावण जी का बहुत बड़ा प्रशंसक हूँ। आपकी ये पंक्तियाँ कितनी सच्छी है:---------- "रावण की सीता हरण की एक गलती ने उसे ऐतिहासिक खलनायक बना दिया ……और राम को देवता की गद्दी पर विराजमान कर दिया !.लेकिन अगर देखा जाये तो क्या वो गलती थी .लक्ष्मण ने सूर्पणखा की नाक काट दी थी, जो रावण की बहन थी। इसी कारण रावण ने सीता का हरण कर लिया था !क्या एक स्वाभिमानी भाई की नज़र के नज़रिए से देखा जाये तो रावण अपनी जगह सही था।"..... आज तो गली गली में महा रावण हैं जो अपहरण के साथ बलात्कार भी करते हैं और उल्टे वही रावण का पुतला भी जलते हैं....बहुत ही सटीक वर्णन के भूरी भूरी प्रशंशा करता हूँ आपकी लेखनी की, । साभार

के द्वारा: डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज" डॉ॰ सूर्या बाली "सूरज"

अनिल जी ..नमस्कार माफ़ी मांगने की जरुरत नहीं है ,नसीहते बुरी नहीं होती उनमे अच्छाई ही होती है और फिर हर एक इंसान दुसरे को नसीहते देने लायक नहीं होता ,मुझे ख़ुशी है किआप नसीहत देने का हौसला और काबिलियत रखते है ! बात जहा तक मेरी फोटो की है ये फोटो भी मेरी है और facebook पर भी मेरी ही फोटो है !facebook वाली फोटो पिछले माह ,जब हम दुबई घूमने गए थे ,वहा ली थी और यहाँ पर जो फोटो है वो एक साल पहले की है (शायद पिछले जनम की लग गई )हां मै आपसे बहुत बड़ी हूँ आपकी उम्र का तो मेरा पोता है जिसकी अभी पिछले साल ही शादी हुई है और आपकी तो अभी शादी भी नहीं हुई !फिर भी कोई बात नहीं आप अपनी नसीहते चालू रखिये और धोखा खाने से बचिए ! आप मेरी पोस्ट पर आये और आपने प्रतिक्रिया दी उसके लिए मै आपकी आभारी हु और आगे भी अपनी हर पोस्ट पर आपकी प्रतिक्रिया की अभिलाषी भी !

के द्वारा: D33P D33P

के द्वारा: mparveen mparveen

आदरणीय अशोक जी मैंने आम भाषा में बचत के विकल्पों में शेयर, जीवन बीमा और म्युचल फंड को सम्मिलित किया है, वास्तव में लोगो को यही ग़लतफ़हमी है कि इनमे निवेश कर अपना पैसा सुरक्षित कर सकते है लेकिन ये निवेश पूरी तरह जोखिम भरा है और बाजार के उतर चड़ाव पर निर्भर करता है ! कई बार तो निवेशित मूल भी नहीं मिलता !लेकिन चूँकि एजेंटो को लघु बचत योजनाओ में प्राप्त होने वाले कमीशन से यहाँ कमीशन जयादा मिलता है इसलिए वो निवेशको को प्रलोभन देकर इनमे निवेश के लिए प्रोत्साहित करते है ! आज राजकीय सेवा में कार्यरत कर्मचारियों को बीमा ,दुर्घटना बीमा और चिकित्सा सुविधा उपलब्ध है ,उन्हें इसके लिए अलग से पॉलिसी लेने की जरुरत नहीं पड़ती फिर भी वो अपने और अपने परिवार के सदस्यों की जीवन बीमा पॉलिसी लेकर आयकर में छूट भी प्राप्त कर सकते है !एजेंट वही पॉलिसी बताते है जिनमे उन्हें कमीशन ज्यादा प्राप्त होता है ,इसलिए पूरी जानकारी के बाद ही पॉलिसी लेना उचित है !लघु बचत योजनाओ में सबसे बड़ा फायदा ये भी है कि परिपक्वता पर स्रोत पर आयकर की कटोती नहीं होती ! साथ ही जमा dhan पूर्णरूप से सुरक्षित rahta है यधपि मेरा कार्य क्षेत्र यही है ….पर मेरे लेखन को विस्तार देने के लिए मै आपकी आभारी हु !

के द्वारा: D33P D33P

दीप्ति जी           सादर नमस्कार, मै आपके आलेख के शुरूआती पंक्ति से ही सहमत नहीं हूँ. क्योंकि इसमें आपने बचत के विकल्पों में शेयर, जीवन बीमा और म्युचल फंड को सम्मिलित किया है जों कि बचत के विकल्प नहीं जोखिम और जीवन सुरक्षा के विकल्प हैं.           हमारे यहाँ जनता यही गलती करती है कि बचत, बीमा और जोखिम में फर्क नहीं समझ पाती.इसलिए अक्सर यह ठगी जाती है. गैर सरकारी बैंको या सहकारी संस्थानों में भी निवेशित धन जोखिम ही है.            बचत का सबसे आसान और उत्तम तरीका है आवर्ती बचत यह निश्चित आय वालों के लिए है यह छोटी छोटी बचत को कुछ वर्षों में बड़ा आकार देती है.यह सरकारी बैंक और पोस्ट ऑफिस में किया जाना ही सबसे सुरक्षित  माना जाता है.           अचानक प्राप्त होने वाली बड़ी रकम को जिसकी तत्काल जरूरत न हो उसे आवश्यकता अनुसार समयावधि के लिए बैंक और पोस्ट ऑफिस में जमा किया जा सकता है.           बीमा एक ऐसी सुविधा है जिसका लोग सही उद्देश्य नहीं जानते और एजेंटों द्वारा ठगे जाते हैं. इसके मुख्य तीन प्रकार होते हैं. एक चिकित्सकिय, दुर्घटना और तीसरा जीवन बीमा. सबसे आवश्यक है जीवन बीमा जों आपकी म्रत्यु के पश्चात कि जवाबदारी को पूरा करे.इसको महंगाई,जरूरत और वक्त के हिसाब से आंकलित किया जाता है. इसमें प्रतिवर्ष एक मुश्त रकम जमा कि जाती है जों वापसी योग्य नहीं होती. कम उम्र में बीमा कराने पर यह रकम कम होती है.          शेयर और म्युचल फंड में निवेशित रकम पूर्णतया जोखिम होता है जों आपके जोखिम उठाने कि क्षमता पर ही निर्भर करता है. यह लघु बचत करने वालों के लिए मुसीबत भरा हो सकता है.          कुछ अधिक बचत करने के सामर्थ्य वालों के लिए पी पी एफ  और एम् आय एस  भी अच्छे विकल्प हैं.           मेरा प्रतिक्रया को विस्तार से लिखने का कारण बचत, बीमा और जोखिम पर आपके लिखे आलेख को और थोड़ा विस्तार देना था. आपने इस विषय पर लिखा, यह एक सराहनीय और समाजोपयोगी कार्य है. आपको हार्दिक बधाई.

के द्वारा: akraktale akraktale

विक्रमजीत जी आपका स्वागत है ... बड़े लोगो की बड़ी बड़ी बातें ......आपने सही कहा कि चिड़िया कि चोंच से सागर खाली नहीं होता और दान देने से धन नहीं घटता ! जिनसे पास अकूत धन है उनके पास न तो पैसा ख़तम होता है और न ही उन्हें धन को बचाने की जरुरत होती है !.और फिर मेरा ये ब्लॉग मध्यम श्रेणी के आय वर्ग के लिए है ,जिनके पास अपनी दैनिक जरूरत पूरी करने के बाद थोड़ा पैसा अपने आड़े वक्त के लिए ,घर में बच्चो की शिक्षा और शादी आदि के लिए बचा कर रखने की जरुरत होती है !जब उनका वही पैसा गलत जगह निवेश करने से डूब जाता है ,तो शायद निवेशक की हालत आपने नहीं देखी!मेरा कार्य क्षेत्र यही है मैंने ऐसे बहुत लोगो को आंसू बहाते देखा है ! वैसे भी आजकल सभी को किसी न किसी कारण से राशी जमा करने की जरुरत होती ही है और आजकल सभी निवेश क्षेत्रो में संयुक जमा के साथ मनोनयन की सुविधा उपलब्ध है ! इसके अभाव में निवेशको का बहुत सारा धन सरकार के पास रह जाता है और परिवार जन उसे पाने की जटिल प्रक्रिया में उलझे रहते है!,नियमित बचत से जरुरत के वक्त उधार लेने से बचा जा सकता है ! प्रतिक्रिया के लिए आपका आभार

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के द्वारा: minujha minujha

आदरणीय जवाहर जी सादर नमस्कार सरकार को वास्तव में जनता के स्वास्थ्य की चिंता कम अपने राजस्व की चिंता ज्यादा है !प्रतिबन्ध के मसौदे से तो लगता है ये प्रतिबन्ध केवल सरकार और गुटखे के बड़े खिलाडियों की छोटे विक्रेताओ को मार्केट से गायब करने की मिली भगत है,क्यूंकि ना तो तम्बाकू पर पाबन्दी लगाई गई है न गुटखे पर ,यह पाबन्दी तंबाकूयुक्त गुटखे पर लगाई गई है ,जैसा अशोक जी ने कहा जिसका तरीका लोगो ने भी निकाल लिया है एक जर्दे का दूसरा पानमसाले का.पाउच खरीदा और हो गया जर्देवाला गुटखा! बस आपका ब्लोगिंग का नशा बरक़रार रहे जिससे लोगो को कुछ कुछ तो नशा हो जो पान मसाले और जर्दे के नशे से बेहतर है प्रतिक्रिया और तारीफ के लिए आपका धन्यवाद

के द्वारा: D33P D33P

आदरणीय दीप्ती जी ,सादर प्रणाम| गुटखा,धूम्रपान करने वालो की समस्या दिनों दिन बढ़ रही हैं,जों की एक राष्ट्रव्यापी समस्या हैं ...मुम्बई के टाटा हास्पिटल में सैकडो लोग प्रतिदिन गुटखे खाने के कारण मर रहे हैं |हृदय द्रवित हों जाता हैं |सामूहिक रूप से नशा मुक्ति अभियान चलाने पर कोई परिणाम नही आने पर बड़ी निराशा हुयीं |भिन्न भिन्न तबके के लोगों से बात की डॉ .इंजी.,समाज सुधारक ....सिगरेट ,गुटखा खुद खातें हैं ...पर आत्मबल की कमी से छोड़ नही पातें हैं |बहुत ज्वलंत विषय पर आलेख लिखकर आपने इस दिशा में कार्य करने के लिए उत्साहवर्धन किया हैं ,आपका बहुत बहुत आभार |सादर - "जीने की आरजू में , मरने लगा है आदमी अपने ही साए से , डरने लगा है आदमी बारूद के ढेर पे बिछा के बिसात ; चाहत उम्रे -दराज़ की ,करने लगा है आदमी . पसमांदा दिमाग , थका हारा बदन आट्मी ताकात का दम , भरने लगा है आदमी सीने में हसद , दिल में जलन अपनी ही आग में , जलने लगा है आदमी तर्जुमानी न कर सका , वेद -ओ -हदीस की मज़हबी जूनून में , मचलने लगा है आदमी न खौफे -खुदा ,न याद -ए-खुदा "साहिल " शैतान की खिदमत सिर्फ , करने लगा है आदमी

के द्वारा: ajaykr ajaykr

आदरणीय दीप्ति जी, सादर अभिवादन! बजट के समय आपने जो आलेख प्रस्तुत किया था उससे एक बेहतर अर्थशास्त्री लग रही थी. अब हमें लगता है कि आप उससे भी ऊपर हैं! "क्या ये प्रतिबन्ध केवल सरकार और गुटखे के बड़े खिलाडियों की छोटे विक्रेताओ को मार्केट से गायब करने की मिली भगत है ?" हमेशा से यही होता आ रहा है - बड़ी मछलियाँ छोटी मछलियों को खा जाती हैं! मेरे आस पास दोनों तरह के लोग हैं - एक नशा करने वाला (शराब, तम्बाकू, गुठका, सिगरेट आदि का) दुसरे तरह के लोग भी हैं, जो चाय तक नहीं पीते!... मैं चाय का शौक़ीन हूँ, मिठाई का भी, खाने का भी कभी विरोध नहीं करता ... अब ब्लोगिंग का नशा भी लग गया है ... क्या करूँ? कुछ उपाय हो तो सुझाइए! आपके महत्वपूर्ण आलेख पर अभिनन्दन!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: D33P D33P

शब्दों की खलिश जी को जलाती है ! शब्दों की कशिश जी को लुभाती है !! आदरणीय दीप्ती बहिन ..... सादर अभिवादन आपकी कविता की यह लाइने मेरे मन के भावों को पूरी तरह से झिंझोड़ जाती है क्योंकि मैं भी सोचा करता हूँ की शब्दों में कितनी ताकत होती है किसी शब्द को पढ़ कर मन में करुणा तो किसी को पढ़ कर गुस्सा +प्यार +भक्ति का भाव कुछ भी भाव आ सकते है बस उन शब्दों को हम किस प्रकार से लेते है +उनका असर हम पर किस प्रकार होता है वोह हमारे दृष्टिकोण और नजरिये तथा सोच समझ के ढंग पर निर्भर करता है ...... बाकी एक कवी/कवियत्री गागर में सागर भरने का हुनर रखते है इसलिए मेरे जैसे द्वारा शब्दों में बयाँ करना थोड़ा मुश्किल हो जाता है ..... शब्दों की ताकत और असर के सामने हम नतमस्तक है ..... इस बेहतरीन कविता +जो खुद में है नायाब भावों को समेटे हुए पर ढेरों मुबारकबाद

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

के द्वारा: D33P D33P

मोहतरमा, लेखिका नासिर शर्मा की किताबें तो मैंने नहीं पढ़ी ...या यूं कहें आपके लेख के पहले मैं उन्हें जानता भी नहीं था ...खैर.... मेरा कहने का मतलब किसी दूसरे के द्वारा किये गए सर्वे पे विश्वाश करने के बजाय अगर हम अपनी अंतर आत्मा से अपने अन्दर झांके और अपने से जुडें लोगों को देखे तो हमें अहसास हो जायेगा की हम सौदागर हैं या उन्हें सच्चे दिल से चाहते हैं.. बहुत बार हम अखबार में लिखे या दूसरे की बातों पर विश्वाश कर लेते हैं ..जबकि उनका संदर्भ कुछ और होता है.... अपना जमीर अपनी अंतर आत्मा से बड़ा कोई धर्म और कोई सर्वे नहीं होता ..... अगर उसके अन्दर कोई कोई काम या निहित स्वार्थ की भावना नहीं जुडी हो तो... कभी कभी लेखक या लेखिका अपने से जुडें किसी मित्र से धोखा खाने के बाद सारी नारी या सारे पुरुषों को उसी तराजू में तौलने लगते है... आखिर लेखक या लेखिका भी इन्सान हैं ..आपकी तरह ..मेरी तरह ....

के द्वारा: yogeshkumar yogeshkumar

शशिभूषण जी सादर नमस्कार आपने सही कहा विवाह और लिव इन रिलेशनशिप – इन दोनों में कोई तुलना ही नहीं है! “live in reletionship “ को पारिस्थितिक समझौता कहे या आज की पीढी की मानसिकता जहा वो आजाद रहने का स्वाद लेना चाहते है , जब तक मन किया साथ रहे जब चाहे अलग हो जाये किसी भी तरह से हमारे संस्कारो के अनुकूल नहीं है ! लेकिन इसका आकर्षण भी अस्थायी है ,जानवरों की तरह ( लिव इन रिलेशनशिप)लोग जिसके साथ जब मर्जी हो रहने लग जाये और जब चाहे अलग हो जाये ,तो अव्यवस्था तो लाजिमी है !लेकिन विवाह का कोई विकल्प नहीं है वैदिक काल से विवाह प्रथा चली आ रही है जिससे समाज में व्यवस्था भी है विवाह ऐसे दो व्यक्तियों को बिना किसी स्वार्थ और स्नेह से साथ रहने की अनुमति देता है जो सामाजिक व्यवस्था को सुचारू रूप से सञ्चालन में सहयोगी है! आपके कीमती समय और प्रतिक्रिया के लिए के लिए आभार

के द्वारा: D33P D33P

अजय जी आपने सही कहा जब भिन्न परिवार के, भिन्न प्रष्ठभूमि के,भिन्न विचारधाराओ के दो व्यक्ति मिलते है तो उनके बीच कई तरह के मतभेद हो सकते है ,(मतभेद तो रक्त संबंधो यथा पिता- पुत्र, भाई- बहन ,में भी होता है )किन्तु साथ रहते रहते उनके बीच जो आत्मिक सम्बन्ध बनता है वही भावनाए उन्हें ता -उम्र जोड़े रखती है ! अपवाद सभी जगह है जहा तारतभ्य स्थापित करने में दम्पति विफल हो जाते है वहा उनके मध्य अलगाव भी हो जाता है !आप किसी भी दम्पति से दुसरे पक्ष के बारे में जब बात करेंगे तो उसी तरह की शिकायते सुनाने को मिलेगी जैसा अनुभव लेखिका नासिरा शर्मा जी को हुआ पर इसका मतलब ये कदापि नहीं कि उनके मध्य कटुता ही है !वो भी स्नेह है छोटी मोटी शिकायते जो दो व्यक्तियों को साथ रहने में हो सकती है उन्हें उसी नज़रिए से देखना उचित है न कि वैवाहिक संस्कार पर ही आक्षेप लगाना !समय के साथ साथ लोगो की मानसिकता में परिवर्तन होता जा रहा है फिर भी वैवाहिक रिश्तो की अहमियत कम नहीं हो जाती जहा निस्वार्थ दो व्यक्ति अपना पूरा जीवन एक दुसरे के सहारे बिता देते है ! आपके कीमती समय और प्रतिक्रिया के लिए आभार

के द्वारा: D33P D33P

मेरा नया लेख 'अपना जीवन साथी कैसे चुने "आ गया हैं |और मैं वशी शाह साहब की कुछ पंक्तियाँ आपको नजर करना चाहूँगा - मुहब्बत अखिरिश है क्या ? वसी ! मैं हंस के कहता हूँ - किसी प्यासे को अपने हिस्से का पानी पिलाना भी ..मुहब्बत है ! भंवर मे डूबते को साहिल तक लाना भी ..मुहब्बत है ! किसी के वास्ते नन्ही सी क़ुरबानी .मुहब्बत है ! कहीं हम राज़ सारे खोल सकते हों मगर फिर भी , किसी की बेबसी को देख कर खामोश होजाना भी …मुहब्बत है ! हो दिल मे दर्द , वीरानी मगर फिर भी किसी के वास्ते जबरन ही मुस्कराना भिओ मुहब्बत है ! कहीं बारिश मे भीगते बिल्ली के बच्चे को ज़रा सी देर को घर में ले आना , भी मुहब्बत है ! कोई चिडया जो कमरे में भटकती आ गयी हो उस को पंखा बंद कर , रास्ता बाहर का दिखलाना ,मुहब्बत है ! किसी का ज़ख़्म सहलाना , किसी के दिल को बहलाना .. मुहब्बत है ! मीठा बोल , मीठी बात , मीठे लब्ज़ सब क्या है ? मुहब्बत है ! मुहब्बत एक ही बस एक ही इंसान की खातिर मगन रहना , कब है ? मुहब्बत के हजारों रंग , लाखों रूप हैं किसी भी रंग में , हो जो हमें अपना बनती है ये मेरे दिल को भाती है .......... [वसी शाह ] **************************************************आपका अजय

के द्वारा: ajaykr ajaykr

राजू आहूजा जी आपका बहुत बहुत स्वागत है, आपकी बात से पूर्णतया सहमत हु ....जिन रिश्तो में गहराई नहीं है,मर्यादा नहीं हो. केवल सतही तौर पर साथ रहते है .चाहे वो कोई भी रिश्ता हो ,स्थाई नहीं हो सकता ! और फिर कहावत सही है कि जहा दो बर्तन होंगे तो आवाज़ तो होगी ही ,जब विपरीत विचारधारा ,भिन्न परिवारों के दो अजनबी साथ रहने लग जाते है तो किसी मुद्दे पर मतभेद हो सकता है .फिर भी विवाह ऐसे दो व्यक्तियों को बिना किसी स्वार्थ और स्नेह से साथ रहने की अनुमति देता है जो सामाजिक व्यवस्था को सुचारू रूप से सञ्चालन में सहयोगी है! वही पश्चिमी तर्ज़ पर live in reletionship जब तक मन किया साथ रहे जब चाहे अलग हो जाये किसी भी तरह से हमारे संस्कारो के अनुकूल नहीं है ! आपके कीमती समय और प्रतिक्रिया के लिए के लिए आभार

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aadrneeya दीप्ती जी ,सादर प्रणाम | आपने बहुत ही ज्वलंत मुद्दा उठाया हैं .............. हमने सारे परिवार को विवाह के केन्द्र पर खड़ा किया हैं ,प्रेम के केन्द्र पर नही|हमने यह मान रखा हैं की विवाह कर देने से दो व्यक्ति प्रेम में आ जायेंगे ,बंधन में होंगे तो प्रेम आ जायेंगा | प्रेम का जन्म स्वतंत्रता की भूमि में होता हैं जहां कोई बंधन नही,कोई जबरदस्ती नही,जहां कोई कानून नही हंव |प्रेम व्यक्ति का अपना आत्मदान हैं –बंधन नही,जबरदस्ती नही|इसके पीछे कोई विवशता या मजबूरी नही | जब हम लड़का /लड़की को विवाह के बंधन में बिना प्रेम के बाधते हैं ,बिना आंतरिक परिचय के,बिना एक दूसरे के प्राणों के संगीत के ,तब हम केवल पंडित के मंत्रो और वेदों की पूजा में और थोथे उपक्रमों में उनको विवाह से बाँध देते हैं|फिर आशा करते हैं की उनके जीवन में प्रेम पैदा होंगा ,प्रेम तो पैदा होने से रहा हाँ उनके सम्बन्ध कामुक ,सेक्सुअल होतें हैं | हाँ प्रेम पैदा हों जाय तो व्यक्ति साथ जुडकर परिवार निर्माण कर सकता हैं | प्रेम के आभाव में गृहस्थी संघर्ष कलह द्वेष ,ईर्ष्या और २४ घंटे उपद्रव का अड्डा बन जाती हैं |सारी दुनिया म स्त्रियाँ हिस्टीरिया ,न्युरोसिस से पीड़ित हों रही हैं |विक्षिप्त उन्माद से भरती जा रही हैं |सब परिवार में प्रेम के आभाव से हैं | आपका अजय

के द्वारा: ajaykr ajaykr

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नमस्कार योगेश जी माफ़ी चाहूंगी अगर आपने इसे अन्यथा लिया या आपको इससे किसी भी तरह से ठेस लगी .आपने लिखा मेरा लेख थोडा नारीवादी हो गया .क्या करू नारी हु ना.इसलिए अपना पक्ष पहले रखना पड़ेगा वैसे आपने सही कहा इस रिश्ते की गहराई ,बिना लाग लपेट एक दुसरे का ख्याल रखना ,सेवा करना इसमें कोई सौदा कैसे हो सकता है ! अगर कोई इस रिश्ते पर निशाना साधता है तो यक़ीनन ये नज़रिए का फर्क होगा . आप अविवाहित है अपना सब काम आप स्वय करते है ....चलिए ये भी अच्छा है आपकी पत्नी को आपका खूब सहयोग रहेगा ( LOL ) आपने सही कहा जब अख़बार में .लेखिका नासिरा शर्मा का लेख पढा :“पति और पत्नी में बड़ा सौदागर कौन” लगा उनको कही कुछ गलत अनुभव हुआ है .पति – पत्नी के इस रिश्ते में थोड़ी मान मनुहार हो सकती है पर सौदा नहीं , जहा तक जरुरत की बात है वो हर जगह स्वीकार करनी पड़ेगी जहा पत्नी पति और परिवार की सेवा करती है वही पति भी परिवार की हर जरूरत पूरी करने के लिए प्रतिबद्ध है !सामाजिक तौर पर पारिवारिक भरणपोषण के लिए पति जिम्मेदार है न कि पत्नी !रिश्ते में दोनों का सहयोग जरुरी है इसे सौदा तो नहीं कहा जा सकता !दोनों ही एक दुसरे के पूरक है ! ये तो give n take है जो हर रिश्ते पर लागु होता है ! पर आज रोज़ अखबारों में ,दूरदर्शन पर ,पत्रिकाओ में हर तरह के किस्से मिल जाते है जो इन रिश्तो को शर्मिंदा भी करते है ......पर इसके बावजूद ये रिश्ता बहुत अहम् है जिसकी किसी भी तरह से तौहीन करना उचित नहीं है आपकी प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद

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के द्वारा: D33P D33P

phool singh जी ,,मैंने क्या लिखा बात वो नहीं है मैंने जब अख़बार में .लेखिका नासिरा शर्मा का लेख पढा :“पति और पत्नी में बड़ा सौदागर कौन” लगा उनको कही कुछ गलत अनुभव हुआ है .पति - पत्नी के इस रिश्ते में थोड़ी मान मनुहार हो सकती है पर सौदा नहीं , जहा तक जरुरत की बात है वो हर जगह स्वीकार करनी पड़ेगी जहा पत्नी पति और परिवार की सेवा करती है वही पति भी परिवार की हर जरूरत पूरी करने के लिए प्रतिबद्ध है !सामाजिक तौर पर पारिवारिक भरणपोषण के लिए पति जिम्मेदार है न कि पत्नी !रिश्ते में दोनों का सहयोग जरुरी है इसे सौदा तो नहीं कहा जा सकता !दोनों ही एक दुसरे के पूरक है !आपकी प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद

के द्वारा: D33P D33P

आदरणीय दीप्ती बहिन जी .... सादर अभिवादन ! किसी एक मिसाल को हम पूरी मानव जाती पर लागू नहीं मान सकते है इस अगर मगर के चक्कर से निकलना ही होगा हमको कल को तो कहने वाले यह भी कह सकते है की बच्चे अपने माता पिता के उपर निर्भर होते है अगर उनकी यह निर्भरता खत्म हो जाए तो वोह उनसे अलग होने + रहने में एक पल की भी देरी नहीं लगाएंगे यस फिर कल को कोई यह भी उठ कर कहने लग जाएगा की माता पिता औलाद को स्वार्थवश अपने बुढापे के सहारे बनाने के लिए ही पाल पोस कर बड़ा करते है ऐसे तो हम किसी भी रिश्ते के बीच में से प्यार को माइंस करके देखने की भूल कर बैठेंगे आपने अपने विचार रखे है पढ़ कर अच्छा लगा सुन्दर लेख पर मुबारकबाद :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-? :-x :-) :-? :-x :-) :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-P :-? :-x :-) :evil: ;-) :-D :-o :-( :-D :evil: ;-) :-D :mrgreen: :-? :-x :-) : :roll: :oops: :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) जय श्री कृष्ण जी

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

मोहतरमा, आपने कहा पुरुष ब्लॉगर इसे अन्यथा ना ले ...मगर मैंने तो अन्यथा ले लिया ... हा हा हा ... वैसे आपका ब्लॉग थोडा नारीवादी हो गया.. आपने लिख दिया महिलाओं को घर के काम मजबूरी में करने पड़ते हैं.. और ये काम उनसे करवाए जाते हैं... मैं आप से इन बातों में सहमत नहीं हूँ.. पति पत्नी का रिश्ता वास्तव में एक दुसरे का अधूरापन पूरा करता है... वैसे तो मैं अभी अविवाहित हूँ और अपना सारा काम स्वयं ही करता हूँ.. जरूरत नहीं लगती कि कोई मेरे कपडे धोये और मेरे लिए खाना पकाए..... मुझे नहीं लगता मुझे अगर विवाह करना है तो इसलिए करना है कि मेरी पत्नी मेरे कपडे और मेरे लिए खाना पकाए.... मुझे तो live in relation समझ नहीं आता... विवाह का कोई विकल्प नहीं.. ये प्रकृति ने कुछ कमियाँ पुरुषों में कुछ महिलाओं में दी है.. मुझे नहीं लगता ये सम्बन्ध एक सौदा है और सारे पुरुष एक सौदागर हैं... जो आपने कहानी बताई वो एक अपवाद है ...मेरे पास भी ऐसे जीते जागते किस्से हैं जहाँ महिला अपने फायदे के लिए अपने पति यहाँ तक कि बच्चे तक को छोड़ देती है... मगर वो भी एक अपवाद है...

के द्वारा: yogeshkumar yogeshkumar

क्या नसीरा जी के संपर्क में आये दम्पति अपवाद नहीं थे ?.क्यूंकि अपवाद तो हर जगह मौजूद है !ये सौदागरी कुछ हद तक हो सकती है पर इससे वैवाहिक रिश्तो की अहमियत कम नहीं हो जाती ,इस सामाजिक रिश्ते के साथ केवल दो व्यक्ति नहीं कई अनजान लोग जुड़ जाते है !जिससे सामाजिक सौहार्द में बढोत्तरी होती है !विवाह की महत्ता को किसी भी तरह से कम नहीं आँका जा सकता ! आदरणीय दीप्ति जी, सादर अभिवादन! आपने अपने या नासिर जी के प्रश्न का उत्तर खुद ही अपने अंतिम पाराग्राफ़ मे दे दिया ! पति-पत्नी एक दुसरे की जरूरत तो हैं ही, एक 'अनजाना सा बंधन' जो प्यार का ही हो सकता है, मैंने कई बुजुर्ग दंपत्ति को साथ रहते, एक दूसरे को मदद करते, मुस्कुराहटों के साथ बतियाते देखा है ... इसे सौदागर जैसे शब्द से नवाजना घोर नाइंसाफी होगी! माफ़ करेंगी मेरी यही राय और अनुभव है ... नोक-झोंक प्यार को बढ़ावा ही देते हैं ....

के द्वारा: jlsingh jlsingh

आदरणीय दीप्ती जी, सादर ! विवाह और लिव इन रिलेशनशिप - इन दोनों में कोई तुलना ही नहीं है ! नकली विग में और असली बालों में कोई तुलना हो सकती है क्या ? ऐसा कहने वाले मानसिक रूप से कुंठित ही कहे जायेंगे ! बिना किसी कागजी प्रमाण-पत्र के पति-पत्नी सम्पूर्ण जिंदगी एक दुसरे के साथ और एक दुसरे के लिए बिता देते हैं ! पत्नी की तुलना नौकरानी से करना, पति-पत्नी के रिश्ते को व्यापारिक दृष्टिकोण से तुलना करना, ये सब मानसिक दिवालियेपन की निशानी है ! ऐसे लोग स्वयं अपने जीवन में कहीं न कहीं किसी न किसी कुंठा और पूर्वाग्रह से ग्रस्त होते हैं, और चाहते हैं की उनकी इस कुंठित विचारधारा का समर्थन करने वाले कुछ और लोग बने ! सम्पूर्ण विश्व हम भारतीयों के वैवाहिक जीवन की स्थिरता पर चकित होता है ! ऐसे लोग इस स्थिरता को आघात पहुंचाते हैं ! ""क्या आधुनिक युवा वर्ग की “live in reletionship “ इन्ही समझौतों और परिस्थितियों से बाहर निकलने की कोशिश है ?"" हरगिज नहीं ! “live in reletionship “ पारिस्थितिक समझौता है, विवाह जीवन भर साथ निभाने की गारंटी है ! अपवादों की बात अलग है ! सादर !

के द्वारा: shashibhushan1959 shashibhushan1959

किसी कारण से उपरोक्त पोस्ट कीतस्वीर दिखाई नहीं दे रही और इसे एडिट करने में भी परेशानी हो रही है ...तो इस पोस्ट का matter दुबारा यहाँ पेश है जिन्दगी और मौत जिन्दा थे तो किसी ने पास बिठाया भी नहीं ! अब खुद मेरे चारो और बैठे जा रहे है! पहले कभी किसी ने मेरा हाल न पुछा! अब सभी आंसू बहाए जा रहे है ! एक रुमाल भी भेंट न किया जब हम जिन्दा थे! अब शालें और कपडे ऊपर से ओडाए जा रहे है ! सब को पता है कि अब हम इनके काम के नहीं ! मगर फिर भी बेचारे दुनियादारी निभाए जा रहे है! कभी किसी ने एक वक्त का खाना भी न खिलाया! अब देसी घी मुह में डाले जा रहे है ! जिन्दगी में एक कदम भी साथ न चल सका कोई ! अब फूलो से सजा कर कंधो पर उठाये जा रहे है ! आज पता चल कि मौत जिदंगी से कितनी बेहतर है ! हम तो बेवजह ही जिन्दगी की चाहत किये जा रहे है !!!

के द्वारा: D33P D33P

आदरणीय दीप्ती जी .... सादर अभिवादन ! आज सुबह ही याद आया की आपके प्रश्न का अपने ब्लॉग पर उत्तर दिया ही नहीं .... जैसा की आदरणीय भ्रमर जी ने प्रश्न उठाया की आज तक मैं कांग्रेस के विरोध को होते हुए देख कर भी चुप क्यों रहा ..... अगर कांग्रेस का कोई नेता घौटाले को अंजाम देता है तो मैं पार्टी को समर्थन के नाम पर उस को हलक के नीचे नहीं उतार सकता ..... अगर इस मंच पर सही को सही कहा है तो इस बात का यह मतलब नहीं हूँ की मैं कांग्रेस विरोधी हूँ .... इसी बात को बताने तथा यह भी समझाने , की कमेन्ट के लालच में किसी का भी अकारण ही समर्थन नहीं बल्कि उसकी बजाय उत्साहवर्धन करने की नियत से ही थोड़ा बहुत सहा है ..... वैसे भी राजनितिक पार्टी के नाम पर और के नाम पर लड़ना कम से कम इस मंच पर बिलकुल भी उचित नहीं है ..... ********************************************************************* सच में ही आपकी रचना अति उत्तम है ..... मैं मीनमेख निकालने वाला ऐसे ही जल्दी जल्दी किसी की तारीफ नहीं करता हूँ ..... इसमें कहा गया तो सामने दीखता ही है लेकिन बहुत से अनकहे की कल्पना करके, उसको समझ करके पाठक खुद ही इसको अपने लिए विस्तार दे लेता है ..... यह एक अलग खासियत है इस कविता की ..... बस आज इतना ही

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

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आदरणीया दीप्ति जी, आदाब, नमस्कार और प्रणाम! मैंने कई बार आपकी पंक्तियों को और छवियों को देखा कभी सामने से तो कभी छिपकर ... कलुषित मन में बहुत सारे ख़याल आए और गए ..... याद आई वो पंक्तियाँ ... मैंने दिया जिनको आइना, आइना लेकर भी वो आई ना! फिर मैंने अपने आप को आईने में देखा तो राजा दसरथ की याद आ गयी ... थोड़ी प्रेरणा बुजुर्ग सज्जन को अपने आपको आईने में निहारते हुए देख कर भी सोचा .... अब थोडा सा रसा स्वादन आप भी कर लीजिये गोस्वामी जी की उन पंक्तियों को जब राजा दशरथा ने अपने आपको आईने में उस समय देखा था जब उनके भी बाल पकने लगे थे. एक समय सब सहित समाजा। राजसभाँ रघुराजु बिराजा।। सकल सुकृत मूरति नरनाहू। राम सुजसु सुनि अतिहि उछाहू।। नृप सब रहहिं कृपा अभिलाषें। लोकप करहिं प्रीति रुख राखें।। तिभुवन तीनि काल जग माहीं। भूरि भाग दसरथ सम नाहीं।। मंगलमूल रामु सुत जासू। जो कछु कहिज थोर सबु तासू।। रायँ सुभायँ 'मुकुरु कर' (आईने को हाथ में लिया) लीन्हा। बदनु बिलोकि मुकुट सम कीन्हा।। श्रवन समीप भए सित केसा( कान के पास कुछ केश सफ़ेद होने लगे थे)। मनहुँ जरठपनु अस उपदेसा।। नृप जुबराज राम कहुँ देहू। जीवन जनम लाहु किन लेहू।। दो0-यह बिचारु उर आनि नृप सुदिनु सुअवसरु पाइ। प्रेम पुलकि तन मुदित मन गुरहि सुनायउ जाइ।। अंत में कुपित या ईर्ष्याअग्नि में जल कर आपकी ही पंक्ति को दुहराता हूँ --- "करती क्या हो सारा दिन" ! बस आईने को निहारना ... यही काम रह गया है ... कृपया अन्यथा न लीजियेगा ... पर आपकी बेहद 'खूबसूरत प्रस्तुति' को देख अपने आप को रोक नहीं सका! बधाई!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: PRADEEP KUSHWAHA PRADEEP KUSHWAHA

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के द्वारा: Punita Jain Punita Jain

के द्वारा: D33P D33P

के द्वारा: D33P D33P

निःशब्द हूँ आज .....बिलकुल निःशब्द.........! हमने आसमान से जमीन का सफ़र तय किया उनके लिए! उन्हें खबर भी न हुई एक नज़र देखा और मुस्करा कर चल दिए!! रफ्ता रफ्ता उनकी चाहत के रंग दिल में गहराने लगे ! हवाओ ने भी रुख बदला वो बारिश के डर से उठे और चल दिए!! आँखे बरस रही थी अनवरत ,दरिया बना था आँखों में ! उनके कदम बड़े और कागज़ की किश्ती तैरा कर चल दिए!! क्या गिला करू मैं इन झूमती हवाओं का ! उन्होंने संगीत समझा और गुनगुना कर चल दिए!! खनक उठे हम कांच के टूटे टुकडो की तरह !! वो अपना अक्स निहार कर चल दिए ! ऐ खुदा किसी को ऐसा मंजर न दिखाए मोहब्बत में !! हम उनके आगे बिखरते गए किताब के पन्नो की तरह! वो आये अहिस्ता से चिंगारी दिखा कर चल दिए!!....बहुत खूब......... दर्द की सीमा को पार कर गयी आपकी यह रचना...............किसी शायर ने कहा है दर्द का हद से गुजर जाना है दावा हो जाना.....इसका मतलब मेरे अनुसार, मर जाने से है......मतलब न रहेगा बांस न बजेगी बासुरी........!एक आप से विनती करना चाहता हूँ यदि आप इसे मजाक या कुछ और न समझे तो........आज के बाद फिर ऐसी कोई रचना पोस्ट मत करियेगा क्योंकि ऐसी रचना मुझको आत्महत्या करने के लिए प्रेरित करती हैं....और यदि मैं मर गया तो फिर सोच लीजियेगा.....सारा इलज़ाम आपके ऊपर जाएगा.....!

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

आँखे बरस रही थी अनवरत ,दरिया बना था आँखों में ! उनके कदम बड़े और कागज़ की किश्ती तैरा कर चल दिए!! क्या गिला करू मैं इन झूमती हवाओं का ! उन्होंने संगीत समझा और गुनगुना कर चल दिए!! क्या यही प्यार है इतना दर्द, खुदा बचाये ऐसे सच्चे  प्यार से। मेरा मानना है कि सच्चा प्यार एक  पागलपन है। प्यार से कब  किसने क्या पाया, हाँ कवि जरूर बना देता है ये प्यार। प्यार पीड़ा को जन्म देता है और पीड़ा कविता को, और कविता आनन्द को। सॉरी मैं कहाँ भटक  गया था। आया था प्रतिक्रिया देने  और  लिखने लगा प्रेम  रामायण। दीप्ति जी सादर नमस्कार, कविता की उपरोक्त पक्तियाँ बहुत  ही सुन्दर बन पड़ी हैं।

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

के द्वारा: VIVEK KUMAR SINGH VIVEK KUMAR SINGH

अदरणीय एवं पूजनीय सरिता जी, ‘अपनी डफली अपना राग’ ………..मुझे तो ये देख कर यक़ीन नहीं आ रहा है की आप इस तरह की बातें कर रही है………. अरे जिसका कोई मान ही नहीं है उसक मानहानि क्या होगा……अगर ऐसा है तो आपको उसी वक्त respond करना चाहिए था जब आपने लेख को पढ़ा…….आत्मवान व्यक्ति respond करता है…..तीन दिन बाद react नहीं……..और ऐसा भी क्या मान जो किसी के देने से मिलता हो और न देने से घट जाता हो….मुझे पूरा उम्मीद है कि किसी पुरुष ने उकसाया होगा आपको……चाहे वो बाहर का पुरुष हो या फिर आपके ख़ुद के भीतर का….. इस कमेंट को पढ़ने के बाद एक बात तो मैं दावे के साथ कह सकता हूँ की आपका चित स्त्रेण बिल्कुल नहीं है…..आपकी मानसिकता पुरुषो वाली है….. इस सब के आलवे……न तो कोई स्त्री सिर्फ स्त्री होती है और न ही कोई पुरुष सिर्फ पुरुष होता है……..स्त्री पुरुष के बीच जो भेद है वो quality का नहीं है quantity का है……हरेक पुरुष के भीतर स्त्री होती और हरेक स्त्री के भीतर पुरुष होता है…….और इसी वजह से, हो सकता है की किसी का शरीर स्त्री का हो लेकिन उसका चित पुरुष का हो…… “इस महावाहियत, घटिया, निकृष्ट कोटि के लेख को खुद जे जे ने क्यूँ नहीं हटाया…” जेजे ने इसलिए नहीं हटाया क्योंकि यह महावाहियात और घटिया लेख हमारे समाज का ही हिस्सा है……ये किसी और लोक की बात नहीं है……….. आपकी जानकारी के लिए एक बात बता दें….की बिना रावण के राम का होना असंभव है…….आप तब तक ही मर्यादित हैं तब की अमर्यादित लोग समाज मैं मौजूद हैं……ये जीवन का गहरा गणित है इसे अच्छे से समझ लीजिए…….जिस दिन दुनियाँ से प्रकाश का अंत हो जाएगा उसी दिन अन्ध कार भी चला जाएगा………. ” इस लेख को तुरंत हटाने की अपील करती हूँ” क्या हटा देने से मान-सम्मन वापिस आ जाएगा…..अगर यदि आजाएगा तो इस तरह की थोथी मान सम्मान का क्या मोल……….और किसी के माने देने से आपका मान बढ़ता है………..तो समझ लीजिए देने वाला आपसे कहीं जियादा सम्मानित है………..क्योंकि देने वाला लेने वाले से हमेशा ऊपर रहेगा……..मान-सम्मान भीख माँगने की चीज़ नहीं है………ये भिखमंगापन त्यागिए………! और अंत मे यही कहूँगा….कि , ’जो सच मे ही सम्मानित व्यक्ति है उनके मान सम्मान को वो लेख पढ़ कर तनिक भी ठेस नहीं पहुँचेगा….. और जिनको पहुँचेगा वैसे table कुर्सी की कौन परवाह करता है…………मेरे भीतर के स्त्री को तो कोई ठेस नहीं पहुँचा………” (और कोई भी व्यक्ति अगर अस्तित्व के इस स्त्री और पुरुष के रहस्य को और गहरे से समझना चाहता हो…….मुझे पर्सनल मेल कर के जान सकता है………) एक और बात ज़रा मुझे बताइए….जब आब मरेंगी तो क्या आप के साथ दुनियाँ की सभी तथाकथित स्त्रियाँ मर जाएँगी……? व्यक्ति का अस्तित्व होता है…समाज का नहीं…..मैं अचंभित हूँ कि जो लोग खुद अंधविश्वास मे जी रहें है वो लोगों को क्या अंधविश्वास से बाहर निकलेंगे……????

के द्वारा: follyofawiseman follyofawiseman

मेरी सदा सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध एक आवाज अनिल कुमार ‘अलीन’ कुत्ता, मैं या तू ?http://merisada.jagranjunction.com/2012/05/20/%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%AE%E0%A5%88%E0%A4%82-%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%A4%E0%A5%82/ sinsera के द्वारा May 22, 2012 48 घंटे से सोच रही हूँ कि इस पोस्ट को कोई “report abuse ” क्यूँ नहीं कर रहा है.? सभी प्रबुद्धजन पढ़ रहे हैं और कमेन्ट भी कर रहे हैं… मुझे कटु व कठोर भाषा कतई पसंद नहीं है लेकिन मजबूरीवश कह रही हूँ कि इस महावाहियत, घटिया, निकृष्ट कोटि के लेख को खुद जे जे ने क्यूँ नहीं हटाया….आश्चर्य है….? समाज की विकृतियों को विकृति के रूप में दिखाया जाये तो पढना बुरा नहीं है, लेकिन 2%मानसिक रोगियों के आधार पर पूरी स्त्री जाति को लेखक महाशय generalize करने की धृष्टता कैसे कर सकते हैं..? यह “x-rated” लेख पूरी स्त्री जाति का अपमान है. मैं लेखक महाशय से इस लेख को तुरंत हटाने की अपील करती हूँ …अन्यथा उनके इस घृणास्पद कृत्य के लिए उनके ऊपर मानहानि का दावा किया जा सकता है…. इस पोस्ट और मेरे कमेन्ट की कॉपी मेरे पास है….कृपया कमेन्ट डिलीट करने का निकृष्ट कृत्य न करें….

के द्वारा: sinsera sinsera

के द्वारा: D33P D33P

के द्वारा: D33P D33P

के द्वारा: MAHIMA SHREE MAHIMA SHREE

दीप्ति जी नमस्कार, आपके ब्लॉग इन्टरनेट की दुनिया पर मैंने कमेन्ट करना चाहा पर शायद नेट को मंजूर न हुआ और ३ कोशिशों के बाद भी कमेन्ट नहीं कर पाई .. आपका वो ब्लॉग काफी हद तक सही था सत्य के करीब नहीं बल्कि सत्य ही था . आजकल यही हो रहा है .... माफ़ कीजियेगा उस ब्लॉग की बात मैं इस पोस्ट पर कर रही हूँ पर क्या करू आज शायद यहाँ पोस्ट हो जाये कमेंट्स ...... हाँ तो आपको तो ये सब एक लड़के ने कहा था पर आपको विस्वास न होगा की ऐसा प्रस्ताव मुझे किसी औरत ने किया .... उसका मेसज पढ़कर मेरे भी पैरों तले जमीन खिसक गयी टाइप हुआ था पर फिर इग्नोर करना ही ठीक लगा क्यूंकि दुनिया में सब तरह के लोग हैं .... अब बात करते हैं आपकी इस पोस्ट की जिसमे बहुत ही खूबसूरत ढंग से आपने दिल की भावनाओं को व्यक्त किया है .... तारीफ में बस इतना ही कहना चाहूंगी की too good .... keep it up ..... :)

के द्वारा: mparveen mparveen

के द्वारा: ajaydubeydeoria ajaydubeydeoria

के द्वारा: D33P D33P

योगेश जी आपने सही कहा विशेष कर महिलाओ के पास मित्रता के बहुत प्रस्ताव आते है .......मेरे पास जिस का प्रस्ताव आया उसने अब्प्नी पूरी जीवनी लिख भेजी उसको पढकर वो मुझे एक बाल अपराधी ही लगा जो अब अपने मन में IPS बनाने का सपना पाल चूका है लेकिन शायद उसके आचरण के कारण अब अकेला हो चुका है ...देखिये उसके पत्र का एक अंश ____" papa ka sapana tha ips banu or ab mera b yahi sapana h ab me jab gar jaunga to ips bankar jaunga "और मुझे उसका हौसला बना रहे इसलिए जवाब भी देना पड़ा "मुझे लगता है अब आप इतने समझदार हो गए है कि आपनी जिन्दगी के लिए क्या अच्छा और क्या बुरा है दोनों में फर्क कर सकते हो ...सबसे बड़ी बात आपकी जिन्दगी में आपके साथ क्या हुआ उसका अहसास है आपको .बस अपने आप को मजबूत रखिये और बुरी दोस्ती को छोड़ कर अच्छी जिन्दगी कि शुरुआत कीजिये अच्छे विचार रखिये ,जिदंगी बहुत खूबसूरत है इसे बेकार में मत जाया कीजिये,bas yahi ak sapna lekar chalo ishvar tumahri madad karenge IPS bankar dikha dijiye सबको" उसकी तन्हाई का सबब देखिये "pagal life bohot boring ho gai h koi to ho jo pyar se bat kare itana b bada nhi hua ki sahi galat ka pata chale ips ban jau bt koi to mera sath de jab khud ko boring mahsus karu to use bat kar लू" लेकिन उसके बाल मन में अभी भी अच्छे संस्कार मौजूद है इसका अंदाज़ा इन शब्दों में झलकता है - " i knw aap bade ho to kya bade log chhote logo se dosti nhi kar sakte me aapke bache ki age ka hu to aap mujhe apna beta samjh kar hi frndsip kar लो"

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महोदया नमस्कार, आपको जिस तरह से किसी ने फेसबुक में मित्रता का प्रस्ताव भेजा.. वो एक आम बात है आजकल ... मगर आपने जिस तरीके से उस प्रस्ताव को समझा ..या कहें handle किया वो अपने आप में काबिले तारीफ है... ये आप के सुलझे विचारों को दर्शाता है... ये एक साधारण सी बात है कि लड़कियां मित्रता के बहुत से प्रस्ताव पाती हैं... इन प्रस्तावों में कुछ का उद्देश्य गलत और कुछ का सिर्फ फेसबुक मित्रता तक ही होता है... बहुत से लोग किसी को समझने के लिए भी मित्रता प्रस्ताव भेजते हैं... खैर तकनीक तो इसी तरह से विकसित होती रहेगी.. लोगों को उसके अनुसार जिंदगी जीने का आदत डालनी पड़ती है और पडती रहेगी... अभी जागरण जंक्शन में भी सोशल मीडिया के नियंत्रण पर बहस चल रही है.. इस तरह जब भी कोई नयी तकनिकी आती है उसके गलत इस्तेमाल के डर पर बहुत चर्चा होती है... मगर बाद में लोग इन सब बातों के आदी हो जाते हैं..... एक जमाना था जब लोग अपने लोगो के साथ बहुत समय बिताते थे ...फिर टीवी ने लोगों में दूरियां बढ़ानी शुरू कर दी... मगर अब ये सोशल मीडिया लोगों को करीब लाने कि कोशिश कर रहा है... खैर बहुत बातें कहने को ....

के द्वारा: yogeshkumar yogeshkumar

आदरणीया दीप्ती जी , नमस्कार. यह दुनिया कहाँ जा रही है ? कुछ समझ नहीं आता. अब यही होना ही है . रिश्ते भी शर्मशार होंगे. इन्टरनेट का सदुपयोग कम, दुरूपयोग ज्यादे हो रहा है. खासकर किशोर उम्र के बच्चों के बीच. हैरानी तो तब होती है जब समझदार और उम्रदराज़ लोग भी वही करते नज़र आते हैं. मुझे वह दिन नहीं भूलता जब इन्टरनेट अभी हमारे देश में नया-नया आया था . उस समय मैं इलाहबाद में कंप्यूटर हार्डवेयर का काम करता था और एक बुजुर्ग जज साहब के यहाँ इन्टरनेट का कनेक्शन इंस्टाल किया था . उनकी ख्वाहिशें जानकर मुझे ही शर्म आने लगी. लेकिन कस्टमर थे , उनको संतुष्ट करना था . उनको इन्टरनेट पर वह सब जानकारी देनी पड़ी जो उनकी उम्र के लोगों के लिए शर्म की बात होनी चाहिए. कहाँ मैं उनके बेटे की उम्र का और कहाँ वो . खैर यह दुनिया है. यहाँ अच्छे और बुरे सब हैं . जो जिसके साथ हो ले. माँ-बाप भी अपने बच्चों को क्या संस्कार देंगे जब वह स्वयं ही संस्कारहीन होते जा रहे है. जब उनको खुद का ही होश नहीं है कि वह क्या कर रहे हैं तो अपनी संतानों पर क्या ध्यान देंगे. सार्थक सन्देश......इन्ही छोटे-छोटे प्रयासों से संभवतः कुछ परिवर्तन हो. आभार........

के द्वारा: ajaydubeydeoria ajaydubeydeoria

धन्यवाद योगी जी आपका तहे दिल से स्वागत है .वास्तव में आपका हँसना वाजिब था क्यूंकि इन्टरनेट क्या नया विषय है .......आज सबके लिए इन्टरनेट आम शब्द हो गया है और इसका उपयोग उससे भी आम .जब हम SOCIAL SITES का उपयोग करते है तो हमारी कई तरह के लोगो से मुलाकात होती है और बात भी होती है !मै यह नहीं कह रही कि इसका उपयोग बुरा है बात तो केवल उपयोग करने वाले के ऊपर निर्भर करता है ! इसके साथ मैंने एक विडियो का लिंक भी दिया है ! वास्तव में मैंने जब वो विडियो देखा और एक बिगड़ा बचपन शायद बिगड़ा शब्द गलत होगा गुमराह बचपन कहना उचित होगा ,मेरे संपर्क में आया तो दिल में कई सवाल आये !शायद अभिभावकों को ही अपने बच्चो के साथ इतना सामंजस्य और COMMUNICATION बनाये रखना होगा जिससे बच्चो की गतिविधियों पर नज़र रखनी आसान हो सके !

के द्वारा: D33P D33P

"मैं क्यों उसको फ़ोन करूँ उसके भी तो इल्म मे होगा कल शब मौसम की पहली बारिश थी...." "मेरे दिल की हर धड़कन की खबर रखता है!!" .......ये आदमी मुझे CBI का एजेंट लगता है.....इससे बचके रहने की ज़रूरत है........इसको कहिए कि अब खबर बहुत रख लिया इसने......अब धड़कन की खबर रखने की नहीं.....आपके दिल की धड़कन बन के धड़कने की ज़रूरत है........ " 'फिर भी' वो मुझे"......अभी मुहब्बत बहुत ऊपर-ऊपर का है.......इसको और गहरा जाने दीजिए...... "क्या करू वो मेरे दिल से जाता भी नहीं"......कुछ भी करने की ज़रूरत नहीं है......उसको दिल से निकालने की नहीं दिल बना लेने की ज़रूरत है........ "बंद पलकों से उतरकर सामने आता भी नहीं"..........लग रहा है ये दौर-ए-इब्तिदा है.......अन्यथा...."जिस सिम्त भी देखूँ नज़र आता है की तुम हो," "पर वो मेरे सामने आने से डरता है" यहाँ आपको सम्हल्ने की ज़रूरत है.....प्रेम अगर प्रकाश है तो डर अंधकार....प्रेम और डर का मिलन संभव नहीं है....... "मोहब्बत करता है"....."इश्क़ वो आतिश है 'ग़ालिब', जो लगाए न लगे बुझाए न बुझे....." अभिनय किया जा सकता है महोब्बत नहीं....... "अपनी जिन्दगी का जहर कहता है".....प्रेम जीवन है, जीवन का नमक है......ज़हर नहीं.....इस आदमी की महोब्बत मुझे खोपड़ी की महोब्बत लगती है.....बच के रहिए इससे.......

के द्वारा: follyofawiseman follyofawiseman

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