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मैं कितनी अकेली

Posted On: 28 Jan, 2012 Others में

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मैं कितनी अकेली
सोचती हु आज मैं कितनी अकेली
हथेली की तरह फैली चौड़ी सड़क पर
समुन्द्र की तरह फैली महानगर की भीड़ है चारों तरफ
फिर भी
सोचती हूँ हाय आज मैं कितनी अकेली
कहकहे गूंजते है हर उलझन से मुक्त
गूंजती है बच्चो की किलकारियां
उन्मुक्त हंसी में भविष्य की धूप
देखकर उनको सोचती हु हाय
आज मै कितनी अकेली
क्यूँ हूँ जिन्दगी से हताश और निराश
गगन को देखती हूँ नज़र उठाकर
मेरी तरह वो भी है कितना अकेला
न सूरज उसका ना चाँद तारे उसके
तन्हा हूँ मैं आंसू की एक बूँद की तरह
साथी कोई मीत नहीं ,सुन्दर सपनो का गीत नहीं
चाहती हु हंस पडूँ मगर हंस नहीं पाती हूँ
और सोचती हु ……
हाय आज मैं कितनी अकेली

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10 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

dineshaastik के द्वारा
January 31, 2012

भीड़ है कितना हमारे पास किन्तु हम फिर भी अकेले हैं, तन्हाई उसकी साथ है मेरे किन्तु हम फिर भी अकेले हैं। एक ऐसा सच जो जन्म से मृत्यु पर्यन्त हमारे साथ रहता है। सत्य को कविता का श्रंगार, बहुत ही सराहनीय……

    D33P के द्वारा
    January 31, 2012

    सच में अकेलेपन का मर्म हर इंसान के दिल में है ,होंठो पे बेशक मुस्कान हो ,तारीफ के लिए आपका तहे दिल से आभार

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
January 30, 2012

सुन्दर भावों से सजी सुन्दर कविता. बधाई!

    D33P के द्वारा
    January 30, 2012

    अभिवादन राजीव जी .आपने समय दिया उसके लिए आपका धन्यवाद

sadhana thakur के द्वारा
January 29, 2012

किसी और का अकेलापन बाँट लीजिये ,आप का अकेलापन दूर हो जायेगा ……….

    D33P के द्वारा
    January 29, 2012

    आज बहुत दिन बाद आपकी प्रतिक्रिया मिली ,आभार

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
January 28, 2012

आदरणीया, सादर अभिवादन साथी कोई मीत नहीं सुन्दर सपनो का गीत नहीं चाहती हूँ हंस पडूँ मगर हंस पाती नहीं एक गीत की पंक्ति है … गीत गाता हूँ मैं, मुस्कराता हूँ मैं, क्यों कि हंसने का वादा किया था मैंने …मेरा नाम जोकर फिल्म कि थीम देखिये , नजरिया बदल जायेगा. सुन्दर भाव कि रचना. बधाई.

    D33P के द्वारा
    January 29, 2012

    प्रदीप जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया ,आपकी प्रतिक्रिया अनमोल है .मेरा नाम जोकर मैंने भी देखी है ,और उस मुस्कान का दर्द भी अछूता नहीं है .जब मुस्कराने का वादा किया है तो मुस्कान लाजिमी है .वादों पर तो लोग जान की बाज़ी भी लगा देते है ,वादे के साथ सोच का नजरिया भी बदल जाता है

    abodhbaalak के द्वारा
    January 29, 2012

    दीप्ति ji भीड़ में भी अकेले होने का एहसास कराती रचना. आपने बड़े खूबसूरत अंदाज़ में इसे मंच पर रखा है. ऐसे ही लिखती रहें http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

D33P के द्वारा
January 29, 2012

अबोध जी आपकी तारीफऔर हौसला अफजाई के लिए आपका शुक्रिया


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