मुझे याद आते है

Just another weblog

48 Posts

1104 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 7831 postid : 57

कब्रिस्तान की ख़ामोशी

Posted On: 2 Feb, 2012 Others में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

चन्दन खुशबू,धुप की महक फैली है फिजाओं में
सुलगती लकड़ियों की चटकती आवाज़ गूँज रही  थी !!
साथ ही अपने से बिछड़ने के दर्द की सिसकियाँ
चिता सुलग रही थी ,मनो हर सुख जल रहा हो !!
माँ की ममता पिता का दुलार ,बहन का स्नेह
सभी कुछ तो सुलग उठा था !!
हर आंख्न में नमी थी ,हर दिल में दर्द था
ये रोज़ की कहानी थी उसकी निगाह में !!
कब्रिस्तान की ख़ामोशी ,सन्नाटे का खौफ
कभी गमज़दा न कर पाया था उसके दिल को !!
बेबस स्नेह उमड़ आता था उसके दिल में उन अपनों के लिए
आज भी निगाहे टिकी थी उस सुलगती चिता पर !!
कितनी चिताए सुलगती देखी,अनगिनत मुर्दा शरीर
आज भी मुर्दा जिस्म है उसकी निगाहों में …!!
अँधेरे कोने की ओर बेबस सी निगाहे उठी ,
एक मुर्दा जिस्म वहा भी है, बिना किसी अपने के !!
बिना दो गज का कफ़न ओड़े !!
आंसू उतर आये थे ,उसकी आँखों में
कब कफ़न ओर कब चिता नसीब होगी उसके जिगर के टुकड़े  को !!
हां ……..वो उसका बेटा था दुनिया को चिता देने वाले को इंतज़ार था
कब रात का सन्नाटा गहरा हो …कब उसके लाल को चिता/कफ़न नसीब हो!!!!!!

sadman1

चन्दन खुशबू,धुप की महक फैली है फिजाओं में
सुलगती लकड़ियों की चटकती आवाज़ गूँज रही  थी !!
साथ ही अपने से बिछड़ने के दर्द की सिसकियाँ
चिता सुलग रही थी ,मनो हर सुख जल रहा हो !!
माँ की ममता पिता का दुलार ,बहन का स्नेह
सभी कुछ तो सुलग उठा था !!
हर आंख्न में नमी थी ,हर दिल में दर्द था
ये रोज़ की कहानी थी उसकी निगाह में !!
कब्रिस्तान की ख़ामोशी ,सन्नाटे का खौफ
कभी गमज़दा न कर पाया था उसके दिल को !!
बेबस स्नेह उमड़ आता था उसके दिल में उन अपनों के लिए
आज भी निगाहे टिकी थी उस सुलगती चिता पर !!
कितनी चिताए सुलगती देखी,अनगिनत मुर्दा शरीर
आज भी मुर्दा जिस्म है उसकी निगाहों में …!!
अँधेरे कोने की ओर बेबस सी निगाहे उठी ,
एक मुर्दा जिस्म वहा भी है, बिना किसी अपने के !!
बिना दो गज का कफ़न ओड़े !!
आंसू उतर आये थे ,उसकी आँखों में
कब कफ़न ओर कब चिता नसीब होगी उसके जिगर के टुकड़े  को !!
हां ……..वो उसका बेटा था दुनिया को चिता देने वाले को इंतज़ार था
कब रात का सन्नाटा गहरा हो …कब उसके लाल को चिता/कफ़न नसीब हो!!!!!!

| NEXT

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (2 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

23 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

D33P के द्वारा
February 25, 2012

hummmm

Tamanna के द्वारा
February 4, 2012

भावनात्मक रूप से बहुत सशक्त रचना है आपकी. उत्तम प्रयास

    D33P के द्वारा
    February 4, 2012

    धन्यवाद तमन्ना जी

अलीन के द्वारा
February 4, 2012

इसे कब्रिस्तान की ख़ामोशी कहूँ या उसका दर्द कि कभी किसी को चिता नशीब होती है…कभी किसी को इसका इंतजार…बहुत खूब ….आपकी रचना दिल पर दस्तक देती हुई जीवन की आखिरी ख्वाइश का मार्मिक विवरण है.

    D33P के द्वारा
    February 4, 2012

    अलीन जी आपका बहुत बहुत आभार, ये जीवन का सत्य है पर बहुत दर्दनाक ,जिसे कोई अपने खयालो में जगह नहीं देना चाहता

February 4, 2012

दीप्ति जी नमस्कार ! बड़े दिनो बाद बधाई हो एक झकझोर देने वाली रचना मिली है…जो जिंदगी की सच्छाई बायाँ कर देती है….इतना सटीक वर्णन की लगता है आप ने चिता जलने की प्रक्रिया को बड़े करीब से देखा है….आपको बहुत मुबारकबाद …

    D33P के द्वारा
    February 4, 2012

    ऐसी सच्चाई जिसका कोई सामना नहीं करना चाहता पर फिर भी हो जाता है ,सूरज जी आपका आपका आभार ,आपने प्रतिक्रिया के साथ अपना समय दिया ,आपके शब्द मेरे लिए पुरस्कार से कम नहीं .पुनः धन्यवाद

Amar Singh के द्वारा
February 3, 2012

बहुत सुन्दर रचना, कब्रिस्तान ऊपर से तो खामोश दीखता है, किन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है. वह तो सदा चीखता है, शोर मचाता है, जगाता है, सुलाता नहीं कभी, झकझोरता है, लेकिन आज इंसान इतना मुर्दा हो चूका है की उसे कभी भी कब्रिस्तान की चीखे सुनाई ही नहीं पड़ती. यदि कभी सुनाई पद जाए तो जल्दी ही भूल भी जाते है. बड़ी ही कमजोर याददाश्त है हमारी. मंद बुद्धि तो ठहरे. यदि हमने कब्रिस्तान की चीख सुनी होती समझी होती, फिर तो आंसू न होते, दुःख न होता, होता तो बस उसका समाधान, जैसा कभी बुध को हुआ था. एक शव देखने मात्र से मृत्यु की चीखे सुन ली थी उन्होंने. समाधान खोजा. तो सिद्धार्थ से बुध हो गए. आपको इसका शीर्षक रखना चाहिए था चीखता कब्रिस्तान, तब कही यह वास्तव में सही होता. किन्तु फिर भी आप सही है अभी हमको कब्रिस्तान में खामोशी ही मालुम होती है तो खामोश सुनना ही पसंद भी करते है. किन्तु सत्य किसी की पसंद का मोहताज नहीं. सत्य तो याधार्थ है. साक्षात है, जिसे हमे स्वीकृत करना ही पड़ता है. http://singh.jagranjunction.com

    D33P के द्वारा
    February 3, 2012

    अमर जी अभिवादन स्वीकार करे, ये सच है कि मृत्यु जीवन का सत्य है पर फिर भी सबके अंतर्मन में इसका खौफ है कोई आज सिद्धार्थ नहीं है जो मृत्यु को साक्षात् देखकर बुद्ध बन जाये ,जहा तक कब्रिस्तान कि चीखो कि बात है कोई सुनना नहीं चाहता , और जरुरत भी नहीं है !कब्रिस्तान का सन्नाटा ही चीखों से ज्यादा खौफनाक है ! मुझे याद है हमारे स्कूल के रास्ते में कब्रिस्तान था और जब भी हम उसके पास से गुजरते थे ,जलती हुई चिताओं को देखकर नासमझ होते हुए भी खौफ से भाग खड़े होते थे ! ये जीवन अनवरत चलता रहेगा एक जीवन का अंत और नये जीवन का सृजन,यही जीवन का मर्म है।।

sonam के द्वारा
February 3, 2012

आपकी कलम से हमारे दिल तक पहुंचती ये रचना  बहुत सुनदर भाव लिए। बधाई सवीकार करें।

    D33P के द्वारा
    February 3, 2012

    धन्यवाद सोनम जी ,मुझे और रचनाओं पर भी आपकी प्रतिक्रिया की अपेक्षा है

RaJ के द्वारा
February 3, 2012

बहुत गहरे भाव लिए आपकी रचना के लिए आपको मुबारकबाद

    D33P के द्वारा
    February 3, 2012

    प्रतिक्रिया के लिए आभार

akraktale के द्वारा
February 3, 2012

D33P , बहुत ही मार्मिक रचना मगर क्या जनसंख्या का बढ़ता घनत्व और सोने की जंजीरों में जकड़ा गणतंत्र इस परिस्थिति को बदल पाने में कभी सक्षम होगा?शायद उन आखों के गहरे गड्ढे यही सोच कर और गहरे होते जा रहे हैं.जीवन्त रचना.बधाई.

    D33P के द्वारा
    February 3, 2012

    पहले हम गुलाम थे ,आज भी गुलाम है ,आज हम अपने ही देश के रखवालो के हाथ गुलाम है ,हर कोने में ऐसी बेबसी देखने को मिल जाएगी ,जहाँ किसी की नज़र नहीं जाती ,और सच तो ये है की कोई नज़र डालना भी नहीं चाहता आज हर एक दिल में इतना स्वार्थ है ,किस और दिल का दर्द और बेबसी उसे नज़र ही नहीं आती ! आज सरकार अगर कुछ करना भी चाहे तो नीचे की सरकार (भ्रष्ट अधिकार ,मंत्री वर्ग)ज्यादा ताकतवर है !

pushkar के द्वारा
February 2, 2012

शब्द बोलते हैं अगर कोई शब्द चित्र बनाना जानता हो।आप जानती हैं इसे हमेसा कायम रखें यही मेरी शुभकामना है।

    D33P के द्वारा
    February 3, 2012

    पुष्कर जी आपने मेरी लेखनी को सराहा ,जिसके लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
February 2, 2012

आदरणीया, सादर अभिवादन. पहले चित्र पर नजर पड़ी कौंधती बिजलियाँ वहां इधर दिल की धड़कन बढ़ी घनघोर तम देख साँसे थमी बैठे देखा जो उसे सर झुकाए समझ गया कि दुनिया लुटी देख दशा उस लाल की प्रक्रति भी जार जार रोई हो न ऐसा कभी ऐ मेरे खुदा चिता/ कफ़न को भी तरसे कोई चांहे वो दुश्मन हो या अजीज न उजड़े आशियाँ किसी का दुआ है आपकी कविता ने ह्रदय को छुआ है.

    D33P के द्वारा
    February 3, 2012

    अभिवादन प्रदीप जी ,हमेशा की तरह आपकी प्रतिक्रिया का निराला अंदाज़ ,मेरे दिल को छु जाता है ,सही कहा आपने कभी किसी पर इस तरह का दर्द न आये ,दुआ यही है ,कहते है दुआओं में बड़ा असर होता है !मै खुद जब जब इसे पढती हूँ आँखों में आंसू आ जाते है !!

    PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
    February 3, 2012

    आदरणीया D33P जी , सादर अभिवादन. प्रतिक्रिया का अंदाज का शुक्रिया . फोलो माई ब्लॉग करना चाहें तो कर लें. शायद मेरे ब्लॉग पसंद आयें. कृपया.

sadhana thakur के द्वारा
February 2, 2012

दर्दभरे भाव ……बहुत अच्छा…….

    D33P के द्वारा
    February 2, 2012

    thanx sadhana ji

D33P के द्वारा
February 4, 2012

कृपया और करना चाहे तो……..शब्दों का उपयोग कर मुझे शर्मिंदा न करें ,कुछ समय की कमी की वजह से मै आपके सभी ब्लॉग नहीं देख पाई.जानती हु आपकी लेखनी कमाल की है !


topic of the week



latest from jagran