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फिर आज निराशा क्यूँ

Posted On: 5 Feb, 2012 Others में

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इन गहरे गहरे नयनों फिर आज निराशा क्यूँ !!

कोई जला गया था आशा के दीप ..

तुमने आज फिर बुझाया क्यूँ !!

इन गहरे गहरे नयनो में फिर आज निराशा क्यूँ

अजनबी राहों के अनजाने मीत

हाथ थाम बढ चले थे मंजिल की ओर!!,

साथी थे तुम मंजिल तक के

पर  अनजानी डगर पर तनहा छोड़ चले क्यूँ

इन गहरे गहरे नयनों फिर आज निराशा क्यूँ !!

कोमल की कल्पना आज सम्मित चितवन से ओझल क्यूँ

कोई शिकवा नहीं मुझे तुमसे

फिर होंठों पर कम्पन आँखों में गवाही क्यों

इन गहरे गहरे नयनों फिर आज निराशा क्यूँ

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14 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

dineshaastik के द्वारा
February 11, 2012

दीप्ति जी नमस्कार, जो चला गया तो चला गया अब तो वो अपने हाथ नहीं। हम अब उसकी क्यों सोच रहे, जो सचमुच अपने साथ नहीं। जो आगे आने वाला है हों उसके स्वागत को तत्पर। जो बीत गया हम क्यों सोचे, क्यों न हम करें आज बेहतर। दीप्ति जी कुछ अधिक लिख दिया हो तो माफ करें, मैंने वह लिखा जो मेरी सोच है। कृपया मेरी “बहस” को देखकर अपने विचार व्यक्त करें। http://dineshaastik.jagranjunction.com/

    D33P के द्वारा
    February 11, 2012

    दिनेश जी आभार …..आपकी प्रतिक्रिया मेरे लिए अनमोल है, क्षमा मांग कर मुझे शर्मिंदा न करें

shashibhushan1959 के द्वारा
February 8, 2012

महोदया, “”इन गहरे गहरे नयनों “”में”" फिर आज निराशा क्यूँ ! दिल को टुकड़े-टुकड़े करना ही था तो उसे तराशा क्यूं !!!”"” आशा और निराशा एक ही सिक्के के दो पहलू हैं जो आते जाते रहते हैं.

    D33P के द्वारा
    February 8, 2012

    शशिभूषण जी आपका अभिवादन है ,ये जीवन है …इस जीवन का यही है रंग रूप

Rajkamal Sharma के द्वारा
February 6, 2012

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    D33P के द्वारा
    February 7, 2012

    राजकमल जी आपकी मुस्कराहट के लिए आपका आभार

Santosh Kumar के द्वारा
February 5, 2012

आदरणीया ,.सुन्दर अभिव्यक्ति आपकी बस इतना ही कहूँगा , .निराशा के बादल जायेंगे ..आशा के सूरज चमकेंगे .. .बढ़ चलो जिधर है देश प्रेम ,साथी लाखों मिल जायेंगे वन्देमातरम !!

    D33P के द्वारा
    February 5, 2012

    सादर अभिवादन संतोष जी. अधूरी जिन्दगी को पूरी होने की प्यास है निराशा के अंधेरो पर उजाले की आस है !! धन्यवाद

pushkar के द्वारा
February 5, 2012

आशाओं का द्वार खोलती घनघोर घटाए निराशा की ! जीवन पथ है युही गुजरता. धुप और छावं के बीच ! निराशा को हावी न होने दीजिये:),कलम चलती रहे गजल युहीं निकलते रहे, बस इतनी सी हार्दिक शुभकामना के साथ !

    D33P के द्वारा
    February 5, 2012

    हौसला बढाने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद

abodhbaalak के द्वारा
February 5, 2012

निराशा को दूर भगा दें क्योंकि आपकी रचनाये कटाई निराश नहीं करती, पर मई आपकी साड़ी रचनाओ पर, और खास कर के एक दिन एक से ज्यादा पर शायद ही अपनी प्रतिक्रिया दे सकूँ ऐसे ही लिखती रहें http://abodhbaalak.jagranjunction.com

    D33P के द्वारा
    February 5, 2012

    अबोध जी ….धन्यवाद , मै आपकी आभारी हु आप आये तो ….जानती हूँ इस मंच पर पढने के लिए इतना कुछ होता है कि एक जगह गाड़ी पर ब्रेक लगा लेना आसान नहीं है !आपकी प्रतिक्रिया मेरे लिए अनमोल है !

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
February 5, 2012

अजनबी राहों के अनजाने मीत हाथ थाम बढ चले थे मंजिल की ओर!!, साथी थे तुम मंजिल तक के पर अनजानी डगर पर तनहा छोड़ चले क्यूँ आदरणीया डी३३पी जी. सादर अभिवादन. अतीत समुन्दर से गहरा होता है वर्तमान निखरा-बिखरा रहता है भविष्य पर केवल मौत का पहरा होता है लाख तसल्ली दे कोई लगाये मरहम कह दें भुला देंगे गुजारे वक्त की यादों को उन्हें भुलाना आसां नहीं होता.

    D33P के द्वारा
    February 5, 2012

    सादर अभिवादन प्रदीप जी ,सच में अतीत भुलाये नहीं भूलता पर उसकी गवाही ज्यादा तकलीफ देह होती है


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