मुझे याद आते है

Just another weblog

48 Posts

1104 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 7831 postid : 132

s-b-i-के-कर्मठ-कर्मचारी

  • SocialTwist Tell-a-Friend

422463_10150757420143169_771533168_11488119_826932816_n क्या इस पर कुछ लिखना बाकी है ?

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

14 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

ajaydubeydeoria के द्वारा
March 21, 2012

दीप्ती जी नमस्कार, हम कुछ भी कर लें ये लोग नहीं सुधरने वाले. यह चित्र फेसबुक पर भी चर्चा में है. आप नें यहाँ प्रदर्शित किया बहुत-बहुत बधाई.

akraktale के द्वारा
March 18, 2012

दीप्ति जी, हकीकत बयान करता चित्र.सिर्फ बैंक ही नहीं प्रदीप जी ने सही कहा है हर सरकारी दफ्तर की यही कहानी है.स्थाई समाधान के लिए जनता कभी आगे आती नहीं लगता है मटकी में ही भांग घुली है.क्या करेगा एक अन्ना. जब हमको ही अपनी चिंता नहीं है.आपकी जाग्रति को सलाम.

    D33P के द्वारा
    March 19, 2012

    प्रतिक्रिया के लिए आपका आभार ….. जनता जरुरत मंद है,बेबस है इसलिए सोई हुई है

dineshaastik के द्वारा
March 18, 2012

दीप्ति जी, आप जैसे जागरूप सब हो जायँ। तो शायद हमें एक और क्राँति की जरूरत नहीं पढ़ेगी।

    D33P के द्वारा
    March 18, 2012

    दिनेश जी आपका स्वागत है .प्रणाम स्वीकार करे ….कुछ लोगो के जागरूक होने से काम नहीं चलता सच्चाई तो ये है सञ्चालन की बागडोर जिनके हाथो में है ,.वही जागरूक नहीं है .आन्ना हजारे की तरह क्रांति की मशाल लेकर चलते समय हजारो लोग उनके पीछे चल पड़ते है पर वही मशाल थोड़े दिन बाद बुझ जाती है .उसकी तपिश भी नहीं मिलेगी

    dineshaastik के द्वारा
    March 19, 2012

    दीप्ति जी इस तरह के आन्दोलन हमेशा से ही राजनैतिक षडयंत्रों के शिकार होते रहे हैं। लेकिन आशावादी बनिये। क्राँति की चिंगारियाँ कभी बुझती नहीं। कुछ समय  के लिये  दब जरूर जाती हैं।

vikramjitsingh के द्वारा
March 18, 2012

दीप्ति जी, नमस्कार, कुछ न कुछ तो प्रभाव पड़ेगा ही, ‘अंधेर नगरी-चौपट राजा’ अभी कुछ दिन पहले का जागरण अखबार पढ़ें, चीन में भी बैंक में ऐसा ही हुआ था, लेकिन लोगों ने क्या हाल किया बैंक का, मुलाज़िमों की अक्ल ठिकाने लगा दी…… लेकिन भारत में,,,,..? कुछ तो कमी है, हम सभी में, जो सब कुछ जान कर भी अनजान बन जाते हैं….

    D33P के द्वारा
    March 18, 2012

    सही कहा आपने कमी तो हममे ही है …जो इस व्यवस्था की नीव के हम भी भागीदार है .!मैंने देखा है सब बैंको की बात मै नहीं करती क्यूंकि आँखों से नहीं देखा पर S.B.I बैंक के हर काउंटर पर कैमरे लगे हुए है जिससे कर्मचारी की हरकतों पर नज़र रखी जा सके ,पर कर्मचारी उसे स्केल से दूसरी तरफ मोड़ देते है .अब बताइए इसका क्या किया जाये ?

March 17, 2012

सादर नमस्कार! बहुत ही सराहनीय कदम…….प्रशंसनीय और अनुकरणीय. काश हम सभी अपनो काम के प्रति जागरूक होते तो यह प्रश्न इस तरह नहीं उठता.

    D33P के द्वारा
    March 17, 2012

    नमस्कार अनिल जी , आपने सच कहा यही दिल सोचता है क्या ये केवल भारत में है या विदेशो में भी यही हाल है ?

jlsingh के द्वारा
March 17, 2012

ये तो पांच बजने का इंतज़ार कर रहे हैं! ऐसा ही होता है, जहाँ नौकरी जाने का खतरा कम से कम रहता है.

    D33P के द्वारा
    March 17, 2012

    नमस्कार सही कहा आपने जहा नौकरी जाने का खतरा नहीं हो वहा कर्मचारी उदंड हो जाते है ,निजी क्षेत्र में आपको ये कम ही देखने को मिलेगा

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
March 17, 2012

पत्रकारिता शुरू करने हेतु बधाई. शेर का शिकार करिए. इनमें मांस कम मिलेगा. ये घर घर की कहानी है. बधाई.

    D33P के द्वारा
    March 17, 2012

    घर घर की नहीं ऑफिस ऑफिस की कहिये प्रतिक्रिया के लिए आभार ,वैसे आपने मुझे नया रास्ता बताया है ,उसके लिए भी धन्यवाद


topic of the week



latest from jagran