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तुम करती क्या हो सारा दिन

Posted On: 8 Apr, 2012 Others,मेट्रो लाइफ में

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fighting-coupleघडी देखी सुबह के पांच बजे थे ,सोचा थोड़ी देर और सो लू ..कोशिश तो बहुत की पर विचार ज्यादा हावी होते चले गए !शरीर थकान से टूट रहा था !रात के तीन बजे तक पतिदेव के दोस्तों की आवभगत करते करते उन्हें खाना खिलकर विदा करते रात के 2  बज गए थे उनके जाने के बाद सब जितनी हिम्मत थी समेत कर बिस्तर पर गिर गई !दूध वाला आता ही होगा और फिर पीने का पानी भी केवल आधा घंटा ही आएगा वो भी मुश्किल है!गुडिया को स्कूल के लिए तैयार करना है फिर सब काम निपटा कर खुद भी ऑफिस जाना है .पतिदेव को बहुत समझाया था कि दोस्तों को पदौन्नति की दावत देनी हो शनिवार का दिन रख लो पर सुनता कौन है ,तीन महीने से काम वाली पैसे बढाने के नाम पर काम छोड़ कर चली गई .मेमसाब 800  रुपये में क्या होता है मह्गीवाडा कितना है और बच्चो के स्कूल की फीस … जैसे काम के बदले मैंने उसके पूरे घर का ठेका ही ले लिया हो !रसोई में घुसते ही मूड ख़राब हो गया रात के झूठे बर्तनो का डेर ..पहले उसे निपटाओ, नहीं…… पहले गुडिया को स्कूल के लिए रवाना करू फिर इनमे हाथ डालु.जैसे तैसे गुडिया का टिफिन तैयार कर विदा किया !इतने में पति महाशय .चाय तो पिला दे बहुत थक गया रात को …..सुनकर मन में गुस्से की लहर  सी उठी ..जैसे सारा काम तो खुद ने किया हो ….चाय थमा कर बाकि काम निपटने में लग गई .घडी की तरफ नज़र उठी 9  बज रहे थे ऑफिस जाना है नाश्ता बनाऊ.…पति महोदय तल्खी से बोले नाश्ता अभी ?मुझे ऑफिस जाना है देर हो जाएगी तुम चाहती हो निगल लू नाश्ता …नहीं करना अभी !चुपचाप खाना बना कर रखा और तैयार होकर ऑफिस निकल गई .सारा दिन थकान ,नींद और पतिदेव की तल्खी याद आती रही ,कभी कदर नहीं है कि ऑफिस और घर के बीच मै भी थक जाती हु! शाम को घर आते ही बच्चे ..मम्मा भूख लगी है उनके सर पर हाथ फेरा और उनके लिए सेंडविच बनाए लगी .इतने में पति महाशय का आगमन भी हो गया ,दो कप चाय बनाई और साथ में आकर बैठ गई बिना कुछ कहे चाय का कप उनके हाथ में दिया दोनों में से कोई कुछ नहीं बोला !रात का खाना बना कर डिनर  टेबल पर रखा और वापिस रसोई की तरफ मुड़ी कान टेबल की और लगे थे ..अब क्या बम फूटेगा ….इतनी देर में जोर से चिल्लाने  की आवाज़ आई —–-इतना भी कोई गरम खाना लगाता है क्या !बच्चे मुह पर हाथ रखे अपनी हंसी रोक रहे थे .पापा खाना तो गरम है पर आप को ठंडा करके मुह में डालना था ना!.मुझे याद आया अभी कुछ दिन पहले रात को खाना लगाने लगी तो फोने आया  दुबई से मेरा बड़ा बेटा ऑनलाइन था मेरे पति देव कुछ देर बात करके ..अब अपनी माँ से बात कर ले कहकर उठ गए क्यूंकि उनके खाने और सोने का टाइम हो रहा था ,मैंने गुडिया को कहा बेटा खाना लगा जितने में मै आ रही हु ,और बेटे से कहा कि अब मै जा रही हु पापा को कहाँ खिलाना है हम बाद में या कल बात करेंगे .इतनी देर में मेरी बेटी जो मात्र दस साल कि है उसने खाना जैसा रखा था उठाकर टेबल पर लगा दिया ,देखा पति देव का परा सातवे आसमान पर ...घर में ठीक से गरम खाना भी नसीब नहीं होता साईट पर होते है तो कम से कम हेल्पर गरम खाना तो खिलाते हैदिल ही दिल में सोचा घर में कलह मचाने  से तो अच्छा है साईट पर ही रहो ना !प्रत्यक्ष में बोली लाओ  गरम करके लाती हु ,कोई जरुरत नहीं ऐसे ही निगल लूँगा .….रोज़ खाने के समय पर यही नाटक ..कभी नमक कम है कभी ज्यादा है .कभी मिर्च ज्यादा कभी तरी ज्यादा बस रोज़ के नाटक और फिर रोज का रटा रटाया डायलोग तुम करती क्या हो सारा दिन ?लगता है जहा रिश्तो में समझ ना हो वहा  जिन्दगी बेकार ही लगती है ,आपका क्या कहना है ?

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45 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
April 14, 2012

इस पोस्ट पर खाने का जिक्र है तो मैं उसी लालच में वापस आया हूँ. पर जितना आपने बखूबी पक्ष रखा है मैं उसी में खो गया .खाना भूल गया. १९७२ से मैं अपनी पत्नी के साथ हूँ . वो मेरी प्रत्येक साज सज्जा, भोजन पानी, यानि की सारी चीजों की व्यवस्था करती है. ये मेरा भाग्य है. पर सारी व्यवस्था साधारण नहीं होती खूब चटकीले मिर्च मसालेदार. यदि वो ऐसा न करती तो शायद मैं तरक्की न कर पता. यद्दपि बाण वो हमेशा चलाती है पर मैं इतना आलसी और स्वार्थी हूँ की अगले जनम में भी उसका ही साथ चाहता हूँ. हाँ ये सत्य है वो ये जरूर कहती है की क्या करते हैं आप सारे दिन. बढ़िया पोस्ट . बधाई. मेरे साथ वो फेस बुक पर दिख सकती है साथ पूजा करते हुए परन्तु नाक पर त्योरी चढ़ाये हुए. जब मेरा मन ऑफिस जाने का नहीं करता है तो जरा सा रिन लगाया, वो मुझे धो देती है, मैं फटाक से ऑफिस के अन्दर. बहुत बातें हैं. आज इतना ही.

    D33P के द्वारा
    April 14, 2012

    मजा आ गया .वास्तव में देखा जाये तो ये रिश्ता इतना खूबसूरत है कि क्या कहे कितने गिले शिकवे है इन रिश्तो में फिर भी अगले कई जनम और चाहता है ये रिश्ता ….मेरे पति भी यही कहते है कि घर आओ और तुम कुछ बोलो नहीं तो खाना हजम नहीं होता तुम्हरी चिख चिख के साथ खाने का स्वाद भी बढ जाता है ! वैसे ये पतियों का पत्नियों को बहलाने का अंदाज़ है।  अगर आप चाहेंगे तो मै उनकी नाक पर चड़ी हुई त्योरी देखने की भी इच्छुक हु ! फेसबुक पर भी आपको खोजेंगे

    PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
    April 14, 2012

    स्वागत है. कैसे ढूँढा जाता है मैं नहीं जानता, प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा,

    D33P के द्वारा
    April 14, 2012

    लुटा के सब कुछ चुपके से तेरी बज्म में हैं आये बच गया था जो राख में तेरी अंजुमन में हैं लाये महका करते थे जो कहीं और क्यों आज यहाँ हैं आये मर चुका जब अहसास गुलजार हो चमन अब न भाये देखिये जो दिल को भाया वही हमने भी चुराया

sinsera के द्वारा
April 13, 2012

दीप्ती जी नमस्कार, (कृपया पुरुष वर्ग मेरा कमेन्ट न पढ़े, ये हम लेडीज़ की आपस की बात है…) अब इतनी भी बुराई मत करिए..ठीक है हर बात में कमी निकालते हैं पर इस का एक गूढ़ अर्थ है…देखिये पुरुष के अन्दर एक “male chauvinism ” होती है.जिस के कारण वो खुद को औरतों से श्रेष्ठ समझते हैं..जब उन्हें अन्दर से यह महसूस होता है कि आप उन से ज्यादा अच्छी तरह से काम कर रही हैं, तो वो अपने “इगो” को संतुष्ट करने के लिए बुराई ढूंढते हैं…और जब नहीं मिलती है तो……बेचारे…. आगे से जब वो आप की कमी निकालें तो आप खुद पर गर्व महसूस कीजिये गा…. ज़रा एक दिन कभी बीमार पड़िए गा तो उन की बेचारगी बहुत अच्छी तरह समझ में आ जाये गी.. असल में गलती आप की भी तो है…कभी कभी मुस्कुरा के “help yourself ” भी कह दिया करिए…. होता ये है न कि…….”आसानियाँ इतनी मिली मुझको कि मुश्किल हो गयी…. “

    D33P के द्वारा
    April 13, 2012

    जी बहुत बहुत शुक्रिया आपका ,आपने अपनी प्रतिक्रिया दी और अपने विचार व्यक्त किये ,जैसा कि मैंने akraktale जी के जवाब में लिखा था वास्तव में समस्या तो इनकी जड़ है जो बड़ी गहरी है ! बचपन से जो पुरुष के दिमाग में डाली जाती है और उसे सींचा जाता है कि तुम कमजोर नहीं हो तुम श्रेष्ठ हो ..वही अहंकार उसे मजबूर करता है और स्त्री पर हावी होने की कोशिश करता है! क्या करू sinsera जी बीमार तो हम पड़ते नहीं इसलिए इस बात का तो अनुभव नहीं पर एक बात का अनुभव जरुर है कि मायके जाते ही इनको हमारी याद कुछ ज्यादा आती है …हा हा हा आप समझ ही गई होंगी

Sumit के द्वारा
April 12, 2012

बेचारा पुरुष ,,,,,,,,,,कट जाये फिर भी अत्याचारी …………….समझ नहीं आता कि सब औरतो कि सुई यही आके kyu ruk jati hai …………………. http://sumitnaithani23.jagranjunction.com/2012/04/12/नर-और-नारायण/

    D33P के द्वारा
    April 13, 2012

    no comments…only thanx for ur words on my page

pawansrivastava के द्वारा
April 12, 2012

दीप्ती जी/रेखा जी/सोनम जी आप लोगों ने तो हम मर्दों को तो आपने खलनायक बना दिया ….. ….एक कोयल अगर बाग़ में कूके तो इसका मतलब यह नहीं कि बसंत आ गया …..कुछ पुरुषओं का व्यवहार साड़ी पुरुष जाती की परिभाषवाली का मानक नहीं बन सकता ….. अच्छे बूरे गुण मर्द और औरत दोनों में होते हैं ….ऐसे बहुत मर्द हैं जिनके आदर्शों ,जिनके पुरुषार्थ कि दुहइयां औरतें भी देती हैं ….और ऐसी औरतों की भी कमी नहीं जिनके सामने शैतान भी पानी मागंता है ….अच्छा तो यह होता की आप बजाय अपने पति का यूं पब्लिक फोरम में निंदा करने के उनके साथ प्यार से ताद्म्यता बनाने की कोशिश करतीं …..स्त्री रो कर अपना दुखरा कह लेती हैं पर पुरुष पुरुशोचित्त प्रवृति से बाध्य हो अपने सीने में दुखों का ज्वारभाटा लिए घुटता रहता है ….पुरुष उस छतनारी बरगद के पेड़ सदृश्य है जिसके साए में स्त्री रूपा फूल खिलती हैं … जो ओलावृष्टि,झंझावत जैसे विपदाओं का प्रहार खुद झेल लेता है पर अपने पनाह में पल रहे पुष्प-तरूवों को चोटिल नहीं होने देता ……यकीन मानिये आपके पति इतने बुरे नहीं की प्यार से रस्ते पर न लायें जा सकें ….. आखिर में आपके समस्या के बाबत यह कहना चाहूँगा कि ‘मुझे मलाल था कि मेरे पास जूते नहीं हैं तब तक जब तक कि मैं नुक्कर में मैं उस शख्श से नहीं मिला जिसके पांव हीं नहीं थे’ ….अपना दुःख सबको बड़ा लगता है .

    D33P के द्वारा
    April 13, 2012

    बात मेरी नहीं ये हर औरत की है ..क्षमा चाहूंगी पवन जी ये किसी व्यक्ति विशेष की नहीं है ये एक आम समस्या है जो पति पत्नी के रिश्ते में है ……..ज्यादा कुछ नहीं कहूँगी क्यूंकि आपकी बाते भी अपनी जगह सही है .!अभिवादन स्वीकार करे …प्रतिक्रिया के लिए आभार

shashibhushan1959 के द्वारा
April 11, 2012

आदरणीय दीप्ती जी, सादर ! सचमुच “हम” करते क्या हैं सारा दिन ? आभार !

    D33P के द्वारा
    April 11, 2012

    नमस्कार शशि भूषण जी आप तो पुरुष है .अगर ये सवाल एक पुरुष से किया जाये तो उसका क्या जवाब होगा?

follyofawiseman के द्वारा
April 11, 2012

‘जिस सिम्त भी देखू परेशानी ही परेशानी, कुछ हसीं ख्वाब और ये आँसू उम्र भर की यही कहानी….’ समस्या ये नहीं है की जीवन मे समस्या है…….समस्या ये है, समस्याएँ बहुत छोटी है……इनके हल हो जाने से भी कुछ हल नहीं होगा……..ये असली समस्याएँ नहीं है……….! इनके बारे मे बात करना या न करना दोनों अर्थहीन है………! मूल समस्या कुछ और ही है……ये सब बस लक्षण है……

    akraktale के द्वारा
    April 11, 2012

    दीप्ति जी सादर नमस्कार, मै इस बन्दे की बातों से काफी इत्तेफाक रखता हूँ समस्या कुछ और है. आपके पति महोदय अधिक काम के मारे परेशान है या उनका ही काम उन्हें संतुष्टि नहीं देता जिसकी चिडचिडाहट घर पर महसूस होती है. कारणों पर आपको ही गौर करना होगा. कामकाजी महिलाओं के पति को बहुत कुछ बर्दाश्त करने और पत्नी के काम में हाथ बंटाने की आदत होनी चाहिए, यदि आपने सत्य लिखा है तो यहाँ उसका पूर्ण अभाव है और उसकी बहुत कुछ जिम्मेदारी आपकी भी है की आपने शादी के बाद से ही पति को अपने घरेलु कार्य में सहायक नहीं बनाया.

    D33P के द्वारा
    April 11, 2012

     wise बन्दे की बात तो गौर करने लायक है ही  , सही कहा समस्या तो कही नहीं है वास्तव में समस्या तो इनकी जड़ है जो बड़ी गहरी है ! बचपन से जो पुरुष के दिमाग में डाली जाती है और उसे सींचा जाता है कि तुम कमजोर नहीं हो तुम श्रेष्ठ हो ..वही अहंकार उसे मजबूर करता है और स्त्री पर हावी होने की कोशिश करता है

krishnashri के द्वारा
April 10, 2012

आदरणीय महोदया , कहानी का ताना बाना बहुत सुन्दर बुना गया है .इस पुरुष प्रधान समाज में आपने एक सवाल छोड़ा है , सोचने को विवश करता हुआ .परन्तु सत्य यही है कि पति -पत्नी गाडी के दो पहिये हैं . संतुलन जरुरी है .एक ने बर्तन धोया दुसरे ने साफ कर दिया , इसमें अहम् कहाँ है .घर के अन्दर जिनमें अहम् है वे सुख की तलाश में भटकते रहते हैं जैसे आपकी कहानी का नायक . अच्छी रचना के लिए आभार .

    D33P के द्वारा
    April 10, 2012

    पति -पत्नी गाडी के दो पहिये हैं . संतुलन जरुरी है..ये किताबी बाते है .विवाह से पूर्व एक पुरुष अपनी प्रेमिका से कहेगा ” आप नहीं तुम बोलो अपनापन लगता है ,मुझे नाम से पुकारो तुम्हारे मुह से मुझे अपना नाम अच्छा लगता है ” वही पुरुष शादी के बाद उसी प्रेमिका पत्नी को कहेगा “किसी” के सामने मुझे नाम से मत पुकारना .आप बोलना, तुम मत बोलना !वास्तव में पत्नी को पुरुष अपनी जागीर समझता है !जिसके ऊपर हुकुम चलाना अपना जनम सिद्ध अधिकार मान लेता है वो गाड़ी के दुसरे पहिये की तरह गाड़ी का संतुलन नहीं बनाता, एक कोचवान की तरह घोड़े(पत्नी ) को हंटर से हांकना चाहता है!ये तो स्त्री की सहनशक्ति और स्नेहिल ह्रदय उस रिश्ते को आजीवन निभाने का जज्बा रखती है और निभाती भी है

ajaydubeydeoria के द्वारा
April 9, 2012

कहतीं तो आप सत्य हैं फिर भी….. ये जीवन है…इस जीवन का, यही है…यही है ….रंग..रूप….. हर चीज परिपूर्ण नहीं हो सकती. जैसा हम चाहते हैं वैसा नहीं हो पाता. जीवन में बहुत कुछ सोचना पड़ जाता है. कोई कितना भी दंभ भर ले लेकिन मनुष्य परिस्थितियों का दास होता है. समझौते करने पड़ जाते हैं. हम खुद में तो परिवर्तन ला सकते हैं, दूसरे को बदलना मुश्किल होता है. किनारा भी नहीं कर सकते. क्योंकि अपनी कुछ जिम्मेदारियां भी तो हैं. सार्थक रचना…..आभार……..

    D33P के द्वारा
    April 10, 2012

    अजय जी आपने सही कहा औरत मजबूर और पुरुष मगरूर ,कोई किसी को नहीं बदल सकता और अगर कोई कहता है कि बदल सकते है तो वो बदलाव क्षणिक ही होगा !जिम्मेदारियां सामाजिक रूप से हर रिश्ते को बांधे रखती है !जहा सहना मजबूरी है …प्रतिक्रिया के लिए आभार

rekhafbd के द्वारा
April 9, 2012

दीप्ति जी ,आपकी दास्ताँ पढ़ी ,ऐसा लगा यह मेरी कहानी है ,दरअसल यह हम औरतों की कहानी है |इश्वर ने रिश्तों की समझ हमे ही प्रदान की है जो हमेशा निभाती है \एक अच्छी रचना

    D33P के द्वारा
    April 10, 2012

    नमस्कार रेखा जी ..पहले अभिवादन स्वीकार करे ….ये कहानी मेरी और आपकी नहीं हर औरत की है हर घर की है जहा पुरुष अपने दंभ में चूर और औरत अपने स्नेहिल भावनाओ से मजबूर

April 9, 2012

आपने सही कहा कि रिश्तों में समझ होनी चाहिए. पति-पत्नी में यह आम बात होती हैं,लड़ना और झगना. यह समझ ही ऐसी होती है जो उन्हें बांधे रखती है. मैं अपनी बात कर रहा हूँ. मैं और अनजानी अक्सर लड़ा करते थे और एक दुसरे को बुरा भला कहा करते थे. परन्तु यह समझ ही हम दोनों को बांधे रहती है. आज वह मेरे साथ नहीं है कि मैं उससे झगडा करूँ. पर उन तकरारों को याद करके बंद कमरों में तनहा रोया करता हूँ और कभी-कभी महफ़िलों में भी जैसे अभी-अभी आँखे छलक आई…….रुलाने के लिए …..हार्दिक आभार.

    D33P के द्वारा
    April 10, 2012

    अनिल जी प्रेमी प्रेमिका और पति पत्नी के रिश्ते में बहुत अंतर होता है .आपने अभी केवल एक प्रेमी का रिश्ता जिया है ,प्रेमी रोता है पति रुलाता है।अगर कही आपके दिल को ठेस लगी हो तो क्षमा चाहूंगी

    April 11, 2012

    माफ़ कीजियेगा, दीप्ती मैं सात फेरों और कुछ मन्त्रों द्वारा जुड़े रिश्ते को ही शादी नहीं समझता हूँ. अनजानी मेरी प्रेमिका बाद में है, पहले वह मेरी पत्नी है. जिस दिन उसे purpose किया था उसी दिन सीधे शादी का ही प्रस्ताव रखा था और जब वह मेरा पर्पोज़ल स्वीकार की, उसी दिन से हम दोनों पति पत्नी हो गए. प्रेम तो हम दोनों में बाद में हुआ हैं. शायद आप मेरी कहानी ठीक से नहीं पढ़ी हैं. इस राधा-कृष्ण के प्रेम को पूजने वाले इस धरती पर मानवता और भावनाएं इस कदर नहीं कुचली जाती. यदि लोग सचमुच प्रेम को समझते. मैं नहीं कहता कि मेरा प्रेम राधा-कृष्ण की तरह है या पवित्र है या महान हैं. और न ही कहलाना चाहता हूँ. मेरा प्रेम बस प्रेम है, ‘अनजानी और अनिल’ का जो किसी से तुलना करना बेईमानी समझता हूँ. और हाँ रिश्तों की समझ मुझे भी. परन्तु एक बात कहूँगा कि यदि हम जो बाहर से हैं वही अन्दर से होना चाहिए. स्मार्ट बनना अच्छी बात हैं पर ओवर स्मार्ट बनना अच्छी बात नहीं हैं. अगर अब आपको किसी प्रकार से ठेस पहुंची हो तो मैं क्षमा नहीं चाहूँगा क्योंकि मैं कोई भी बात सोच समझकर बोलता हूँ यदि आपको लगता हैं कि मैं गलत बोला हूँ तो आप मुझे सजा दे सकती हैं. मैं सजा पाने को तैयार हूँ…..

    D33P के द्वारा
    April 11, 2012

    अनिल जी मै आपकी भावनाओ का सम्मान करती हु ,आपको कही दुःख पहुंचा उसके लिए क्षमा चाहूंगी,काश ऊपर वाले को आपका दर्द महसूस हो और कोई चमत्कार हो जाये यही दुआ है

yogi sarswat के द्वारा
April 9, 2012

आदरणीय दीप्ति जी , नमस्कार ! ये तो आपने हर घर की कहानी कह डाली ! लेकिन आदमी भी बेचारा क्या करे ? अपना गुस्सा कहीं तो निकलेगा !

    D33P के द्वारा
    April 10, 2012

    योगेश जी गुस्सा निकलने के एक अदद बीबी क्यों? अब बीबी को गुस्सा निकलना हो तो क्या करे?

    sonam के द्वारा
    April 10, 2012

    very right दीप्ती जी ! क्या सारा गुस्सा पुरुष को ही आता है , खाना बना बनाया मिल जाता है , कपडे धुले हुए मिल जाते है , कोई गेस्ट आ जाये तो सारा काम स्त्री ही करे , और उसके बाद भी अब ये कर दो वो कर दो ! क्या पुरुष कोई कम खुद नहीं कर सकते ! बस एक दिन एक महिला की तरह काम करके देखे ……………… I think पुरुषो की सोच खुद बे खुद बदल जाएगी !

    D33P के द्वारा
    April 10, 2012

    सही कहा आपने एक दिन “तुम करती क्या हो सारा दिन” से तंग आकर मैंने भी मेरे पति से यही कहा चलो एक दिन हम अपनी दिनचर्या बदल लेते है .तो तुरंत जवाब दिया” हा क्यों नहीं .तुम क्या समझती हो तुम बहुत ज्यादा काम करती हो “फिर शायद कामो की गिनती “सुबह पीने का पानी भरने से. बच्चो को स्कूल भेजना उनका टिफिन तैयार करने से लेकर रात के सोने तक के काम” करते ही अपनी गलती का अहसास हुआ और अपने पुरुष दंभ का तीर चलाया .”.तुम्हे तो मुझे बच्चो के सामने शर्मिंदा करने में मजा आता है ” तुम औरतो के पास कोई काम तो है नहीं” ..बात वही की वही रह गई ,और उन्होंने अपना बचाव कर लिया

    sonam के द्वारा
    April 11, 2012

    ऐसा ही होता है दीप्ती जी ! औरत सब कुछ करले फिर भी कुछ नहीं करती ! तभी तो वो औरत है ! अगर औरत को भी पुरुषो की तरह अधिकार मिल जाये तो तो पुरुष पुरुष कैसे कहलायेंगे !

    yogi sarswat के द्वारा
    April 13, 2012

    आदरणीय दीप्ति जी नमस्कार ! मेरा ऐसा कुछ मतलब नहीं था ! आप ने और सोनम जी दोनों ने तो मुझे हड़का दिया ! हहाआआअ ! माफ़ करें ! आज के बाद महिलाओं के विषय में कोई लेख होगा तो सोच समझ कर प्रतिक्रिया दूंगा ! कृपया lightly लें ! धन्यवाद !

    D33P के द्वारा
    April 13, 2012

    माफ़ कीजियेगा योगी जी ऐसा कोई इरादा नहीं हमारा ,आपकी प्रतिक्रिया हमारे लिए अनमोल है और आप सम्माननीय ….आप भी मेरी बातो को सीरियसली न ले ..हा हा हा

चन्दन राय के द्वारा
April 9, 2012

दीप्ति जी, सव्प्रथम आलेख का प्रस्तुतीकरण है उम्दा है , लेख पढने के बाद यही कन्हुंगा , आप 5 दिन बिना किसी लाग लपट के जी के देखीय , लगेगा अरे इस में ही तो मजा , जैसे मीठे के बाद खट्टे का , हर स्वाद ही स्वाद को पूरक बनता है , यही चीजे तो जिन्दगी से जोड़े रखती हैं

    D33P के द्वारा
    April 10, 2012

    चन्दन जी प्रतिक्रिया के लिए आपका आभार .,,,बिना लाग लपेट के लिए चार पांच दिन क्यों दो दिन ही जीकर देख लीजिये जीना दूभर हो जायेगा !हर रिश्ते में एक आवरण जरुरी है चाहे वो कोई भी रिश्ता क्यों न हो !

dineshaastik के द्वारा
April 9, 2012

दीप्ति जी यह तो हर घर की कहानी है। आज  की नहीं, बहुत  पुरानी है।। हर  किसी के साथ  ऐसा होता है रोज। सब देते हैं, एक  दूसरे को दोष।

    D33P के द्वारा
    April 10, 2012

    दिनेश जी ये सही में हर घर की ,हर पति पत्नी के रिश्ते की कहानी है अगर यही सवाल पत्नी अपने पति से करे कि” तुम करते क्या हो सारा दिन” तो किसी पति के पास कोई जवाब नहीं जैसे प्रदीप जी ने कहा कि जब उनकी घरवाली यही सवाल करती है तो वो निरुत्तर हो जाते ,चाहे ये बात उन्होंने मजाक में कही हो पर यही सच है ! और यहाँ जितने पुरुषो ने अपनी प्रतिक्रिया दी है अगर उनके दिल की बात पूछी जाये तो कभी न कभी यही सवाल उन्होंने अपनी पत्नियों से भी किया होगा !

jlsingh के द्वारा
April 8, 2012

दीप्ति जी, सादर अभिवादन! कोई जरूरी नहीं की यह आपका ब्यक्तिगत मामला ही हो!…. पर होता ऐसा ही है लगभग हर घरों में यह तो घर-घर की कहानी है. पत्नी कामकाजी हो तो भी न हो तो भी! आपने शायद दास्तान शर्मा परिवार की न पढ़ी हो. अगर मौका मिले तो पढ़ लीजियेगा और संगीत का सहारा लीजिये…….. मन को शांत रखने के लिए! ब्लॉग अच्छा बना है इसमें आपकी मिनट है जैसा की आपको पिछले ब्लॉग में लोग ताना मार रहे थे -फास्ट फ़ूड कहकर! आपको शर्माजी का लिंक दे रहा हूँ. http://jlsingh.jagranjunction.com/2012/04/05/दास्तान-शर्मा-परिवार-की/

    D33P के द्वारा
    April 10, 2012

    शर्मा जी दम्पति संगीत का सहारा लेकर अपने आप को दबा रहे है ये हल नहीं है किसी समस्या का ,क्यों कोई दम्पति एक दुसरे को महसूस करने का संगीत नहीं सुन पाते,पर शायद इस रिश्ते का संगीत कुछ समय सीमाओ का मोहताज़ है जो सीमाओ को छूते ही समाप्त हो जाता है फिर केवल मजबूरियां समाज की रिश्तो की ही रह जाती है जहा हमें सब भूलने के लिए बाहर के संगीत का सहारा लेना पड़ता है ! जहा तक फास्ट फ़ूड और ताने की बात है ..मुझे कोई शिकायत नहीं है क्यूंकि जैसा मैंने उन्हें भी कहा था कि क्या करू औरत हु रोज़ रोज़ रसोई में खाना पकाते पकाते बोर हो जाती हु इसलिए कभी कभी फास्ट फ़ूड का दिल कर जाता है और स्वाद भी लगता है …हा हा हा प्रतिक्रिया के लिए आपका आभार

Rajkamal Sharma के द्वारा
April 8, 2012

आदरणीय दीप्ती जी …… सादर अभिवादन ! पतिदेव को सिर्फ खाना ही नहीं बल्कि घर + पड़ोस और दुनिया जहां की आपके श्रीमुख से अटपटी +चटपटी और मसालेदार खबरे (मसाला आपका खुद का हो तो बहुत ही बेहतर ) भी चाहिए होती है …… ऐसा करके देखे और उसके बाद नतीजा बताए अच्छी रचना पर मुबारकबाद :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :|

    D33P के द्वारा
    April 10, 2012

    राजकमल जी अभी तो एक डायलोग है केवल फिर एक और जुड़ जायेगा .”सारा दिन मोहल्ले कि पंचायती के अलावा तुम्हारे पास कोई काम है ? वैसे कुछ दिनों से अभी एक डायलोग यह भी जुड़ गया है ,”तुम्हारे पास नेट पर बैठने के अलावा कोई काम है?” .बाकि रही सही कसर आपकी सलाह पूरी कर देगी …मरवाने का पूरा सामान है

yogeshdattjoshi के द्वारा
April 8, 2012

आपने अपना नाम सपष्ट नहीं लिखा है पर नमस्कार, वैसे तो मेरी शादी नहीं हुए है पर कुछ कुछ ऐसा खेल अपने आस पास जरुर देखा है, अनुभव शायद ज्यादा नहीं पर अपने विचार दे रहा हु उम्मीद है पसंद आएँगे. दिल की बात को साफ साफ बयाँन करना इतना आसान नहीं पर आपके शब्द और उनका भाव आपने सही ढंग से रखे है. आज के युग में हम आगे तो बढ़ रहे है पर भावात्मक रूप से पिछड़ रहे है. रिश्ते प्यार से और भावनाओ से चलते है पैसे से नहीं फिर भी उसकी अहमियत कम नहीं आकी जा सकती. छोटी छोटी बातो को नजरंदाज करना जरूरी है पर अगर यह दैनिक है तो समाधान अवश्य होना चाहिए. कार्यालय के बोझ को कार्यालय में ही छोड़ देना और परिवार में हसी खुशी का माहोल बनाए रखना जरूरी है. कभी कभी दो कदम पीछे हटना चार कदम आगे चलने के बराबर होता है. जरूरी नहीं की लोग आपकी इज्ज़त करे पर अगर वो आपके शब्दों को अहमियत नहीं देते तो आपको उनका ध्यान आकर्षित करने की कोशिश करनी चाहिए. इसके लिए आप अपने सोंदर्य का सहारा ले सकती है. साथ ही उनके विचारो और होब्बिस में रूचि ले सकती है. इस तरह जितने ज्यादा विचार आप एक दुसरे के साथ बाटेंगे आपके रिश्ते सुधर जाएंगे. समस्या जहा होती है समाधान भी वही होता है. जरुरत है शांत दिमाग से उसे देखने की. एक अच्छे रिश्ते की कामना करते हुए अपने वाणी को विराम दे रहा हू.

    D33P के द्वारा
    April 10, 2012

    मेरे इस बेतुके ब्लॉग पर आपका स्वागत है …..आपकी शादी हो गई और एक औरत जब आपके अधिकार क्षेत्र में आजायेगी तो आपके अन्दर भी पुरुष दंभ सर उठाएगा .ये एक घर कि नहीं हर घर की कहानी है !जहा तक मेरा मानना औरत कभी छोटी मोटी बातो को तूल नहीं देती पर शायद पुरुषो के अन्दर इतनी सहन शक्ति नहीं होती .आपने कहा” उनका ध्यान आकर्षित करने की कोशिश करनी चाहिए. इसके लिए आप अपने सोंदर्य का सहारा ले सकती है”. पर यकीन मानिये खूबसूरत से खूबसूरत पत्नी भी केवल रात को ही खूबसूरत लगती है(ये एक कटु सत्य है ) दिन में तो उस पर भी तानो की बौछार होती है  ।कार्यालय से घर आते ही पुरुष ही कहता है :” आज तो ऑफिस में बहुत काम था ” कभी औरत नहीं कहेगी वो तो आते ही रोज रसोई में घुस जाएगी और सर्दी हो तो पति रजाई में “जरा चाय पिलाना बहुत सर्दी है ” सर्दी केवल पति के लिए है पति रजाई में पत्नी रसोई में ,अंतर तो केवल ” स” और “ज” का है रसोई और रजाई !फिर भी “तुम करती क्या हो सारा दिन “

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
April 8, 2012

इसमें मुझे क्या कहना है मुझे से नहीं आप से पूछा जा रहा है, जवाब आपको ही देना है, आदरणीय दीप्ती जी, सादर अभिवादन. ये आप को किसने खबर की है की मैं खूब खाता हूँ कई बार खाता हूँ ९७ की.ग्राम. हूँ. डाक्टर पीछे पड़े हैं. ये लेख मेरे पिछले कमेन्ट की तरह है. अच्छा लगा. तुम करते क्या हो सारा दिन ? यही प्रश्न मेरी घरवाली करती है. मैं निरुत्तर.

    D33P के द्वारा
    April 10, 2012

    प्रदीप जी स्त्री क्या करती है कितना करती है पुरुष (पति ) अनजान नहीं होता ,पर शायद पुरुषत्व का दंभ है ! किसी भी पुरुष के पास जवाब नहीं कि वो सारा दिन क्या करते है ,जैसे आपके पास आपकी घरवाली के सवाल जा जवाब नहीं


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