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"सौदागर कौन"

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” कृपया पुरुष  ब्लोगर्स इसे अन्यथा न ले “ तटस्थ भाव से प्रतिक्रिया देने का अनुरोध है !


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अख़बार में लेखिका नासिरा  शर्मा  का लेख पढा  :“पति और पत्नी में बड़ा सौदागर कौन” जिन्होंने एक वृद्ध पति पत्नी से जो बीमार है और एक दुसरे की सेवा में तत्पर है,  से बातचीत की .एक हैरान कर देने वाला  सच सामने आया  _पत्नी की सोच है  जो इस उम्र  में जो  मिल जाये वही ठीक है वर्ना पत्नी को ये शिकायत है जिन्दगी भर मुझसे प्यार न करने वाला और इधर उधर नज़र फेंकने वाला पति जानता है पत्नी ही उसके काम आएगी तभी वो उसकी सेवा करता है वरना जिन्दगी भर उसे नौकरनी से ज्यादा अहमियत  न दी और अब तो वो खुद भी बुढा हो गया है कोई औरत उसे पसंद भी न करेगी !पति का कहना है मैंने इस औरत को कभी तवज्जो नहीं दी अब इसकी सेवा कर रहा हु जिससे इसके हाथ पैर जल्दी ठीक हो जाये और ये काम करने लायक हो जाये ताकि मै अगर खाट पकड़ लू तो ये स्वस्थ होकर मेरी सेवा कर सके !

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ये रिश्ता है या सौदा  ?
हिन्दू संस्कारो में विवाह को  पवित्र बंधन का नाम दिया गया है !जहा लड़की को सिखाया जाता है पति देवता है .उसकी अवज्ञा से पाप लगेगा ,उसकी सेवा उसका धर्म है !विवाह को जन्मजन्मान्तर का रिश्ता माना जाता है ! क्या ये सब ढोंग है
स्त्री और पुरुष विवाह करके  जिदंगी का एक लम्बा हिस्सा एक दुसरे के साथ गुजार देते है ! क्या वो रिश्ता  एक मजबूरी है जो  उन पर थोप दी गई ,.एक समझोता …जो समाज के डर से निभाना भी जरुरी है !और लम्बे समय साथ रह रह कर एक दुसरे की जरुरत बन जाती है !उम्र के उस दौर में जहा बच्चे अपनी जिदंगी माता पिता से दूर रहकर अपने परिवार के साथ गुजरते है और वृद्ध माता पिता के पास एक दुसरे के साथ के अलावा कोई आश्रय नहीं है ! इसलिए वो एक दुसरे को तवज्जो देते है !एक दुसरे के साथ प्यार भरी बाते .साथ जीने मरने की कसमें .>एक दुसरे के बिना न रह पाने की बातें ,इन सब बातो के पीछे का सच क्या इतना ही कड़वा है ?अगर कुछ दिन के लिए पत्नी मायके चली जाये तो पति की प्यार भरी मनुहार “तुम्हारी बहुत याद आ रही है वापिस आ जाओ ना” ये पत्नी के प्रति प्यार और उसकी याद है या एक जरुरत .( पति की शारीरिक जरुरतो को पूरा करने का एक साधन) .जो पत्नी की अनुपस्थिति में महसूस होती है ….बना बनाया खाना  हाथ में धुले प्रेस किये हुए  कपडे, .साफ सुथरा बिस्तर हर चीज़ जो आपको चाहिए पत्नी उसे समय पर पूरा करती है  .और पत्नी की अनुपस्थिति में वो सब काम उसे खुद करने पड़ते है ………माँ का कहना कि अब तो तुम्हारी शादी हो गई है अब भी तुम्हारे  सब काम मै थोड़ी ना करुँगी ,अब तो तुम्हरी सेवा के लिए बीबी है …….बीबी नहीं हो गई एक नौकरानी हो गई …..पति भी यही समझता है मेरी सेवा के लिए एक अदद पत्नी वर्सेस  नौकरानी आ गई है जहा उसकी ही हुकूमत चलती है ,!मायके वाले कहते है अब तो पति ही तुम्हारा सब कुछ है और ससुराल ही तुम्हारा आश्रय ! अब बेचारी स्त्री कहा जाये ” जीना यहाँ मरना यहाँ ,इसके सिवा जाना कहा ” की तर्ज़ पर पूरी जिन्दगी वहा व्यतीत करने को बाध्य है !
विवाह का   पवित्र बंधन ,जन्मजन्मान्तर तक निभाना है या एक थोपे हुए रिश्तो को घडी की टिक टिक के साथ चलाना है ,जिन्दगी की अंतिम साँस तक जब तक शरीर  में दम है ,!आज अगर किसी भी शादी शुदा  दम्पति से पुछा जाये क्या इस रिश्ते में सचमुच प्यार है ?तो कोई भी इस कडवी सच्चाई को स्वीकार नहीं करेगा ……पर एक सोच है  विवाह को  पवित्र बंधन का नाम दिया जाये ( जैसा की सामाजिक रूप से स्वीकृत है )या एक समझौता .?

ये रिश्ता है या सौदा  ?
हिन्दू संस्कारो में विवाह को  पवित्र बंधन का नाम दिया गया है !जहा लड़की को सिखाया जाता है पति देवता है .उसकी अवज्ञा से पाप लगेगा ,उसकी सेवा उसका धर्म है !विवाह को जन्मजन्मान्तर का रिश्ता माना जाता है ! क्या ये सब ढोंग है
स्त्री और पुरुष विवाह करके  जिदंगी का एक लम्बा हिस्सा एक दुसरे के साथ गुजार देते है ! क्या वो रिश्ता  एक मजबूरी है जो  उन पर थोप दी गई ,.एक समझोता …जो समाज के डर से निभाना भी जरुरी है !और लम्बे समय साथ रह रह कर एक दुसरे की जरुरत बन जाती है !उम्र के उस दौर में जहा बच्चे अपनी जिदंगी माता पिता से दूर रहकर अपने परिवार के साथ गुजरते है और वृद्ध माता पिता के पास एक दुसरे के साथ के अलावा कोई आश्रय नहीं है ! इसलिए वो एक दुसरे को तवज्जो देते है !एक दुसरे के साथ प्यार भरी बाते .साथ जीने मरने की कसमें .>एक दुसरे के बिना न रह पाने की बातें ,इन सब बातो के पीछे का सच क्या इतना ही कड़वा है ?अगर कुछ दिन के लिए पत्नी मायके चली जाये तो पति की प्यार भरी मनुहार “तुम्हारी बहुत याद आ रही है वापिस आ जाओ ना” ये पत्नी के प्रति प्यार और उसकी याद है या एक जरुरत .( पति की शारीरिक जरुरतो को पूरा करने का एक साधन) .जो पत्नी की अनुपस्थिति में महसूस होती है ….बना बनाया खाना  हाथ में धुले प्रेस किये हुए  कपडे, .साफ सुथरा बिस्तर हर चीज़ जो आपको चाहिए पत्नी उसे समय पर पूरा करती है  .और पत्नी की अनुपस्थिति में वो सब काम उसे खुद करने पड़ते है ………माँ का कहना कि अब तो तुम्हारी शादी हो गई है अब भी तुम्हारे  सब काम मै थोड़ी ना करुँगी ,अब तो तुम्हरी सेवा के लिए बीबी है …….बीबी नहीं हो गई एक नौकरानी हो गई …..पति भी यही समझता है मेरी सेवा के लिए एक अदद पत्नी वर्सेस  नौकरानी आ गई है जहा उसकी ही हुकूमत चलती है ,!मायके वाले कहते है अब तो पति ही तुम्हारा सब कुछ है और ससुराल ही तुम्हारा आश्रय ! अब बेचारी स्त्री कहा जाये ” जीना यहाँ मरना यहाँ ,इसके सिवा जाना कहा ” की तर्ज़ पर पूरी जिन्दगी वहा व्यतीत करने को बाध्य है !

विवाह का   पवित्र बंधन ,जन्मजन्मान्तर तक निभाना है या एक थोपे हुए रिश्तो को घडी की टिक टिक के साथ चलाना है ,जिन्दगी की अंतिम साँस तक जब तक शरीर  में दम है ,!आज अगर किसी भी शादी शुदा  दम्पति से पुछा जाये क्या इस रिश्ते में सचमुच प्यार है ?तो कोई भी इस कडवी सच्चाई को स्वीकार नहीं करेगा ……पर एक सोच है  विवाह को  पवित्र बंधन का नाम दिया जाये ( जैसा की सामाजिक रूप से स्वीकृत है )या एक समझौता .?

Hindu-marrige

क्या आधुनिक  युवा वर्ग की “live  in  reletionship “ इन्ही समझौतों और परिस्थितियों  से  बाहर निकलने की कोशिश है ?क्या वो  शादी  जैसे रिश्ते की अहमियत नहीं समझते ,क्या  बदती उम्र में उनको अकेलेपन के सन्नाटो से बचने के लिए साथी की जरुरत नहीं होगी ?क्या नसीरा  जी के संपर्क में आये दम्पति अपवाद नहीं थे ?.क्यूंकि अपवाद तो हर जगह मौजूद है !ये सौदागरी कुछ  हद तक हो सकती है पर इससे वैवाहिक रिश्तो की अहमियत कम नहीं हो जाती ,इस सामाजिक रिश्ते  के साथ केवल दो व्यक्ति नहीं कई अनजान लोग जुड़ जाते है !जिससे सामाजिक सौहार्द में बढोत्तरी होती है !विवाह की महत्ता को किसी भी तरह से कम नहीं आँका जा सकता !

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60 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

vikramjitsingh के द्वारा
August 9, 2012

”हम चलें….,तो साया भी अपना साथ ना दे, तुम चलो…..तो ज़मीं चले…..आसमां चले..”

pritish1 के द्वारा
July 29, 2012
    D33P के द्वारा
    July 29, 2012

    thanx

vijay के द्वारा
July 28, 2012

आदरणीय दीप्ती जी नमस्ते आपका लेख बहुत अच्छा लगा सत्य को बिना लाग लपेट के प्रस्तुत करने के लिए निश्चित ही आप बधाई  की पात्र है   

    D33P के द्वारा
    July 28, 2012

    विजय जी प्रथम आगमन पर आपका स्वागत है …… पसंद करने और आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभार

yogi sarswat के द्वारा
July 27, 2012

आदरणीय दीप्ती जी सादर नमस्कार , भारतीय परिवेश मैं वैवाहिक संबंधों की जो एहमियत है, उसको देखते हुए दोनों ही ओर से किसी भी सौदेबाजी पर मुझे किंचित मात्र यकीन नहीं है, हाँ अपवाद हर जगह मौजूद हैं और प्यार की इस सौदागरी के सौदागर भी हो सकते हैं, किन्तु जिनकी संख्या उँगलियों पर गिनी जा सकती है ! बेहतरीन और यथार्थ लेखन के लिए बधाई ! असल में ऐसे लेख नियमित आते रहने चाहिए ! बहुत सार्थक लेख

    D33P के द्वारा
    July 28, 2012

    योगी जी सादर अभिवादन .. आपने सही कहा सामाजिक रूप से या जैविक नजरिये से विवाह से बेहतर कोई विकल्प नहीं है ….जहा आपसी सामंजस्य नहीं होगा वहा कोई भी रिश्ता हो टूटने में समय नहीं लगता !इसलिए विवाह के रिश्ते में जहा सामाजिक रूप से कई अनजान लोग जुड़ जाते है, स्थिरता लाने के लिए आपसी समझ बहुत जरुरी है !जहा जिस रिश्ते में सौदागरी हो चाहे को भी रिश्ता हो ,उनकी उम्र कम ही होती है प्रतिक्रिया के लिए आभार

Sumit के द्वारा
July 25, 2012

आपकी रचना पढके मुझे जगजीत जी की २ पंक्तिया याद आती है, जो की एक अनजाने सच की तरफ इशारा करती है : कहते है प्यार का रिश्ता, है जनम का रिश्ता ……. है जनम का जो ये रिश्ता, तो बदलता क्यों है ………… http://sumitnaithani23.jagranjunction.com/2012/07/24/चम्पू-का-प्रेम-पत्र/

    D33P के द्वारा
    July 28, 2012

    सुमीत जी अभिवादन .. समय और प्रतिक्रिया के लिए आभार

ajaykr के द्वारा
July 23, 2012

aadrneeya दीप्ती जी ,सादर प्रणाम | आपने बहुत ही ज्वलंत मुद्दा उठाया हैं ………….. हमने सारे परिवार को विवाह के केन्द्र पर खड़ा किया हैं ,प्रेम के केन्द्र पर नही|हमने यह मान रखा हैं की विवाह कर देने से दो व्यक्ति प्रेम में आ जायेंगे ,बंधन में होंगे तो प्रेम आ जायेंगा | प्रेम का जन्म स्वतंत्रता की भूमि में होता हैं जहां कोई बंधन नही,कोई जबरदस्ती नही,जहां कोई कानून नही हंव |प्रेम व्यक्ति का अपना आत्मदान हैं –बंधन नही,जबरदस्ती नही|इसके पीछे कोई विवशता या मजबूरी नही | जब हम लड़का /लड़की को विवाह के बंधन में बिना प्रेम के बाधते हैं ,बिना आंतरिक परिचय के,बिना एक दूसरे के प्राणों के संगीत के ,तब हम केवल पंडित के मंत्रो और वेदों की पूजा में और थोथे उपक्रमों में उनको विवाह से बाँध देते हैं|फिर आशा करते हैं की उनके जीवन में प्रेम पैदा होंगा ,प्रेम तो पैदा होने से रहा हाँ उनके सम्बन्ध कामुक ,सेक्सुअल होतें हैं | हाँ प्रेम पैदा हों जाय तो व्यक्ति साथ जुडकर परिवार निर्माण कर सकता हैं | प्रेम के आभाव में गृहस्थी संघर्ष कलह द्वेष ,ईर्ष्या और २४ घंटे उपद्रव का अड्डा बन जाती हैं |सारी दुनिया म स्त्रियाँ हिस्टीरिया ,न्युरोसिस से पीड़ित हों रही हैं |विक्षिप्त उन्माद से भरती जा रही हैं |सब परिवार में प्रेम के आभाव से हैं | आपका अजय

    ajaykr के द्वारा
    July 23, 2012

    मेरा नया लेख ‘अपना जीवन साथी कैसे चुने “आ गया हैं |और मैं वशी शाह साहब की कुछ पंक्तियाँ आपको नजर करना चाहूँगा – मुहब्बत अखिरिश है क्या ? वसी ! मैं हंस के कहता हूँ – किसी प्यासे को अपने हिस्से का पानी पिलाना भी ..मुहब्बत है ! भंवर मे डूबते को साहिल तक लाना भी ..मुहब्बत है ! किसी के वास्ते नन्ही सी क़ुरबानी .मुहब्बत है ! कहीं हम राज़ सारे खोल सकते हों मगर फिर भी , किसी की बेबसी को देख कर खामोश होजाना भी …मुहब्बत है ! हो दिल मे दर्द , वीरानी मगर फिर भी किसी के वास्ते जबरन ही मुस्कराना भिओ मुहब्बत है ! कहीं बारिश मे भीगते बिल्ली के बच्चे को ज़रा सी देर को घर में ले आना , भी मुहब्बत है ! कोई चिडया जो कमरे में भटकती आ गयी हो उस को पंखा बंद कर , रास्ता बाहर का दिखलाना ,मुहब्बत है ! किसी का ज़ख़्म सहलाना , किसी के दिल को बहलाना .. मुहब्बत है ! मीठा बोल , मीठी बात , मीठे लब्ज़ सब क्या है ? मुहब्बत है ! मुहब्बत एक ही बस एक ही इंसान की खातिर मगन रहना , कब है ? मुहब्बत के हजारों रंग , लाखों रूप हैं किसी भी रंग में , हो जो हमें अपना बनती है ये मेरे दिल को भाती है ………. [वसी शाह ] **************************************************आपका अजय

    D33P के द्वारा
    July 24, 2012

    अजय जी आपने सही कहा जब भिन्न परिवार के, भिन्न प्रष्ठभूमि के,भिन्न विचारधाराओ के दो व्यक्ति मिलते है तो उनके बीच कई तरह के मतभेद हो सकते है ,(मतभेद तो रक्त संबंधो यथा पिता- पुत्र, भाई- बहन ,में भी होता है )किन्तु साथ रहते रहते उनके बीच जो आत्मिक सम्बन्ध बनता है वही भावनाए उन्हें ता -उम्र जोड़े रखती है ! अपवाद सभी जगह है जहा तारतभ्य स्थापित करने में दम्पति विफल हो जाते है वहा उनके मध्य अलगाव भी हो जाता है !आप किसी भी दम्पति से दुसरे पक्ष के बारे में जब बात करेंगे तो उसी तरह की शिकायते सुनाने को मिलेगी जैसा अनुभव लेखिका नासिरा शर्मा जी को हुआ पर इसका मतलब ये कदापि नहीं कि उनके मध्य कटुता ही है !वो भी स्नेह है छोटी मोटी शिकायते जो दो व्यक्तियों को साथ रहने में हो सकती है उन्हें उसी नज़रिए से देखना उचित है न कि वैवाहिक संस्कार पर ही आक्षेप लगाना !समय के साथ साथ लोगो की मानसिकता में परिवर्तन होता जा रहा है फिर भी वैवाहिक रिश्तो की अहमियत कम नहीं हो जाती जहा निस्वार्थ दो व्यक्ति अपना पूरा जीवन एक दुसरे के सहारे बिता देते है ! आपके कीमती समय और प्रतिक्रिया के लिए आभार

    D33P के द्वारा
    July 24, 2012

    वशी शाह साहब की पंक्तियाँ लाजवाब है share करने का शुक्रिया

    ajaykr के द्वारा
    July 26, 2012

    आदरणीय ,दीप्ती जी,सादर प्रणाम , आपके बेटी के जन्मदिन की अग्रिम शुभकामनाएँ |

    ajaykr के द्वारा
    July 26, 2012

    आदरणीय ,दीप्ती जी,सादर प्रणाम , आपके बेटी के जन्मदिन की अग्रिम शुभकामनाएँ ,ईश्वर से कामना हैं की वो भी आपकी ही तरह यशस्वी हों ऑ

    D33P के द्वारा
    July 26, 2012

    lot of thanx for ur wishes Ajay ji

allrounder के द्वारा
July 21, 2012

नमस्कार दीप्ती जी, भारतीय परिवेश मैं वैवाहिक संबंधों की जो एहमियत है, उसको देखते हुए दोनों ही ओर से किसी भी सौदेबाजी पर मुझे किंचित मात्र यकीन नहीं है, हाँ अपवाद हर जगह मौजूद हैं और प्यार की इस सौदागरी के सौदागर भी हो सकते हैं, किन्तु जिनकी संख्या उँगलियों पर गिनी जा सकती है !

    D33P के द्वारा
    July 21, 2012

    allrounder जी सच कहा आज तो विदेशो में भी भारतीय वेवाहिक रिश्तो को मान दिया जाता है !विदेशो में बसे भारतीय भी देश की संस्कृति में रंगे इस रिश्ते को अपनाना चाहते है न कि live -in -rileshanship की तर्ज़ पर जिन्दगी गुजरना चाहते है !अपवाद तो हर जगह है .ऐसे रिश्ते हमारे देश में में भी टूट जाते है जहा आपसी सामंजस्य नहीं है ,आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभार

phoolsingh के द्वारा
July 21, 2012

अच्छा लिखा है आपने, लेकिन क्या सब कुछ जरुरत के अनुकूल ही होता है क्या भावनाए कुछ नहीं होती ? क्या ये ही सत्य है की हर इन्सान केवल अपनी जरूरतों के लिए पत्नी को याद करता है क्या? क्या केवल पत्नी ही अपना धर्म निभाती है क्या कोई पुरुष अपना पति धर्मं नही निभाते आपसे यही पूछने की गुस्ताखी चाहता हूँ? फूल सिंह

    D33P के द्वारा
    July 21, 2012

    phool singh जी ,,मैंने क्या लिखा बात वो नहीं है मैंने जब अख़बार में .लेखिका नासिरा शर्मा का लेख पढा :“पति और पत्नी में बड़ा सौदागर कौन” लगा उनको कही कुछ गलत अनुभव हुआ है .पति – पत्नी के इस रिश्ते में थोड़ी मान मनुहार हो सकती है पर सौदा नहीं , जहा तक जरुरत की बात है वो हर जगह स्वीकार करनी पड़ेगी जहा पत्नी पति और परिवार की सेवा करती है वही पति भी परिवार की हर जरूरत पूरी करने के लिए प्रतिबद्ध है !सामाजिक तौर पर पारिवारिक भरणपोषण के लिए पति जिम्मेदार है न कि पत्नी !रिश्ते में दोनों का सहयोग जरुरी है इसे सौदा तो नहीं कहा जा सकता !दोनों ही एक दुसरे के पूरक है !आपकी प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद

Mohinder Kumar के द्वारा
July 20, 2012

दीप्ति जी, प्रेम की खुश्बू जिन्दगी में दूर तक जाती है जवकि सौदे के करार जल्द ही टूट जाते हैं. जिन्दगी में किसी भी औरत या मर्द को शारीरिक रूप से प्यार करने वाले कई मिल जायेंगे मगर उम्र भर निभाने वाले विरले ही मिलेंगे. शादी एक ऐसा करार है जिसमें दोनों एक दूसरे के सुख दुख के साथी होते हैं… अगर कोई इसे भार समझ कर निभा रहा है या फ़िर खुदगर्जी के लिये निभा रहा है तो निश्चय ही प्रताडना का अधिकारी है. विचारों को साझा करने के लिये आभार… लिखते रहिये.

    D33P के द्वारा
    July 21, 2012

    किसी भी रिश्ते में चाहे दोस्ती हो ,पति पत्नी का रिश्ता ,चाहे भाई बहन ,और संतान और अभिभावक का रिश्ता हो प्रेम की अहमियत है! प्रेम के अभाव में किसी भी रिश्ते में तनाव अवश्यम्भावी है ! शादी जैसा प्रेममयी रिश्ता शायद ही कोई है जहा दो अजनबी बिना शर्तो के एक दुसरे का साथ निभाते है केवल प्रेम के सहारे पूरी जिन्दगी गुजार देते है .! पर आजकल आये दिन इस रिश्ते को भी शर्मसार करने वाले किस्से सुनने को मिल जाते है …….बात वही है कि अपवाद हर जगह है …….मोहिंदर जी आपने समय दिए उसके लिए आपका आभार और प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद

akraktale के द्वारा
July 19, 2012

दीप्ति जी सादर, सबकी अपनी अपनी सोच होती है, इसीलिए कहा जाता है जो दिखता है हमेशा वह सत्य नहीं होता. पत्नी द्वारा पति के लिए किये गए कार्य में नौकरानी का भाव दिखता जरूर होगा किन्तु उसमे छिपी मोहब्बत को देख पाने के लिए गहराई चाहिए. हम एक सच्चे मित्र के अस्वस्थ होने पर उसकी सेवा दिन रात करते हैं क्या इसी आशा से करते हैं की कल वह हमारी सेवा करेगा? नहीं हम एक सच्चा साथी खोना नहीं चाहते, फिर पति पत्नी का रिश्ता तो उससे भी बढाकर होता है फिर कैसे कोई उसे मालिक और नौकर के नजरिये से देख सकता है. बस नजर नजर का फर्क है.

    D33P के द्वारा
    July 21, 2012

    हो सकता है लेखिका नासिरा शर्मा की मुलाकात जिस दम्पति से हुई ….एक अपवाद हो या हो सकता है उस दम्पति के मध्य वो एक परिस्थितिजन्य कटुता हो ! हम स्वय शादीशुदा जिन्दगी बसर कर रहे है इस रिश्ते की कीमत हम भी जानते है ! इस रिश्ते की गहराई ,बिना लाग लपेट एक दुसरे का ख्याल रखना ,सेवा करना इसमें कोई सौदा कैसे हो सकता है ! अगर कोई इस रिश्ते पर निशाना साधता है तो यक़ीनन ये नज़रिए का फर्क होगा . अशोक जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया …..आपने समय दिया उसके लिए आपका आभार

Rajkamal Sharma के द्वारा
July 19, 2012

आदरणीय दीप्ती बहिन जी …. सादर अभिवादन ! किसी एक मिसाल को हम पूरी मानव जाती पर लागू नहीं मान सकते है इस अगर मगर के चक्कर से निकलना ही होगा हमको कल को तो कहने वाले यह भी कह सकते है की बच्चे अपने माता पिता के उपर निर्भर होते है अगर उनकी यह निर्भरता खत्म हो जाए तो वोह उनसे अलग होने + रहने में एक पल की भी देरी नहीं लगाएंगे यस फिर कल को कोई यह भी उठ कर कहने लग जाएगा की माता पिता औलाद को स्वार्थवश अपने बुढापे के सहारे बनाने के लिए ही पाल पोस कर बड़ा करते है ऐसे तो हम किसी भी रिश्ते के बीच में से प्यार को माइंस करके देखने की भूल कर बैठेंगे आपने अपने विचार रखे है पढ़ कर अच्छा लगा सुन्दर लेख पर मुबारकबाद :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-? :-x :-) :-? :-x :-) :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-P :-? :-x :-) :evil: ;-) :-D :-o :-( :-D :evil: ;-) :-D :mrgreen: :-? :-x :-) : :roll: :oops: :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) जय श्री कृष्ण जी

    D33P के द्वारा
    July 21, 2012

    राजकमल जी नमस्कार आपका स्वागत है …..आपने दुरुस्त कहा कोई भी उदाहरण अपवाद हो सकता है जैसा कि लेखिका नासिरा शर्मा की मुलाकात जिस दम्पति से हुई हो सकता है उस दम्पति के मध्य वो एक परिस्थितिजन्य कटुता हो लेकिन उसे हम हर दम्पति पर लागु नहीं कर सकते ! हर रिश्ता प्रेम और विश्वास से परवान चड़ता है !अगर वैवाहिक रिश्ते में रिक्तता आ जाएगी तो वो सौदा ही होगा .कम से कम भारतीय समाज में इस रिश्ते का जो महत्व प्राचीन काल से चला आ रहा है उसकी कोई सानी नहीं !आपने समय दिया उसके लिए आपका आभार

yogeshkumar के द्वारा
July 19, 2012

मोहतरमा, आपने कहा पुरुष ब्लॉगर इसे अन्यथा ना ले …मगर मैंने तो अन्यथा ले लिया … हा हा हा … वैसे आपका ब्लॉग थोडा नारीवादी हो गया.. आपने लिख दिया महिलाओं को घर के काम मजबूरी में करने पड़ते हैं.. और ये काम उनसे करवाए जाते हैं… मैं आप से इन बातों में सहमत नहीं हूँ.. पति पत्नी का रिश्ता वास्तव में एक दुसरे का अधूरापन पूरा करता है… वैसे तो मैं अभी अविवाहित हूँ और अपना सारा काम स्वयं ही करता हूँ.. जरूरत नहीं लगती कि कोई मेरे कपडे धोये और मेरे लिए खाना पकाए….. मुझे नहीं लगता मुझे अगर विवाह करना है तो इसलिए करना है कि मेरी पत्नी मेरे कपडे और मेरे लिए खाना पकाए…. मुझे तो live in relation समझ नहीं आता… विवाह का कोई विकल्प नहीं.. ये प्रकृति ने कुछ कमियाँ पुरुषों में कुछ महिलाओं में दी है.. मुझे नहीं लगता ये सम्बन्ध एक सौदा है और सारे पुरुष एक सौदागर हैं… जो आपने कहानी बताई वो एक अपवाद है …मेरे पास भी ऐसे जीते जागते किस्से हैं जहाँ महिला अपने फायदे के लिए अपने पति यहाँ तक कि बच्चे तक को छोड़ देती है… मगर वो भी एक अपवाद है…

    D33P के द्वारा
    July 21, 2012

    नमस्कार योगेश जी माफ़ी चाहूंगी अगर आपने इसे अन्यथा लिया या आपको इससे किसी भी तरह से ठेस लगी .आपने लिखा मेरा लेख थोडा नारीवादी हो गया .क्या करू नारी हु ना.इसलिए अपना पक्ष पहले रखना पड़ेगा वैसे आपने सही कहा इस रिश्ते की गहराई ,बिना लाग लपेट एक दुसरे का ख्याल रखना ,सेवा करना इसमें कोई सौदा कैसे हो सकता है ! अगर कोई इस रिश्ते पर निशाना साधता है तो यक़ीनन ये नज़रिए का फर्क होगा . आप अविवाहित है अपना सब काम आप स्वय करते है ….चलिए ये भी अच्छा है आपकी पत्नी को आपका खूब सहयोग रहेगा ( LOL ) आपने सही कहा जब अख़बार में .लेखिका नासिरा शर्मा का लेख पढा :“पति और पत्नी में बड़ा सौदागर कौन” लगा उनको कही कुछ गलत अनुभव हुआ है .पति – पत्नी के इस रिश्ते में थोड़ी मान मनुहार हो सकती है पर सौदा नहीं , जहा तक जरुरत की बात है वो हर जगह स्वीकार करनी पड़ेगी जहा पत्नी पति और परिवार की सेवा करती है वही पति भी परिवार की हर जरूरत पूरी करने के लिए प्रतिबद्ध है !सामाजिक तौर पर पारिवारिक भरणपोषण के लिए पति जिम्मेदार है न कि पत्नी !रिश्ते में दोनों का सहयोग जरुरी है इसे सौदा तो नहीं कहा जा सकता !दोनों ही एक दुसरे के पूरक है ! ये तो give n take है जो हर रिश्ते पर लागु होता है ! पर आज रोज़ अखबारों में ,दूरदर्शन पर ,पत्रिकाओ में हर तरह के किस्से मिल जाते है जो इन रिश्तो को शर्मिंदा भी करते है ……पर इसके बावजूद ये रिश्ता बहुत अहम् है जिसकी किसी भी तरह से तौहीन करना उचित नहीं है आपकी प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद

    yogeshkumar के द्वारा
    July 26, 2012

    मोहतरमा, लेखिका नासिर शर्मा की किताबें तो मैंने नहीं पढ़ी …या यूं कहें आपके लेख के पहले मैं उन्हें जानता भी नहीं था …खैर…. मेरा कहने का मतलब किसी दूसरे के द्वारा किये गए सर्वे पे विश्वाश करने के बजाय अगर हम अपनी अंतर आत्मा से अपने अन्दर झांके और अपने से जुडें लोगों को देखे तो हमें अहसास हो जायेगा की हम सौदागर हैं या उन्हें सच्चे दिल से चाहते हैं.. बहुत बार हम अखबार में लिखे या दूसरे की बातों पर विश्वाश कर लेते हैं ..जबकि उनका संदर्भ कुछ और होता है…. अपना जमीर अपनी अंतर आत्मा से बड़ा कोई धर्म और कोई सर्वे नहीं होता ….. अगर उसके अन्दर कोई कोई काम या निहित स्वार्थ की भावना नहीं जुडी हो तो… कभी कभी लेखक या लेखिका अपने से जुडें किसी मित्र से धोखा खाने के बाद सारी नारी या सारे पुरुषों को उसी तराजू में तौलने लगते है… आखिर लेखक या लेखिका भी इन्सान हैं ..आपकी तरह ..मेरी तरह ….

    D33P के द्वारा
    July 26, 2012

    आये दिन हम किताबो में ,अखबारों में कुछ पढते है कभी टीवी पर कुछ देखते है बहुत सी सामग्री पढने के बाद दिल को छु जाती है या लिखी हुई बात पर सवालिया निशान खड़ा कर देती है ,वास्तव में लिखने वाला हमेशा वही लिखता है जो वो देखता है ,सुनता है या महसूस करता है ! हम उन बातो पर कभी विश्वास करते है,कभी नहीं करते पर कभी कभी न चाहते हुए भी सोचने पर मजबूर हो जाते है ! और उससे बड़ी बात लिखने वाला का नजरिया कुछ और होता है देखने ,सुनने और पढने वाले का नजरिया कुछ और होता है ! आपका कहना बहुत सही है अपनी अंतर आत्मा से बड़ा कोई धर्म और कोई सर्वे नहीं होता! आपका बहुत बहुत आभार

akashsen के द्वारा
July 19, 2012

दीप्ति जी नमस्कार ब्लॉग फीचर्ड होने की बधाई स्वीकार करे !

    D33P के द्वारा
    July 21, 2012

    आकाश जी धन्यवाद

Bhupesh Kumar Rai के द्वारा
July 19, 2012

दीप्ति जी नमस्कार, आज भले ही कुछ लोग पश्चिम की नक़ल करते हुए लिव इन रिलेशनशिप की बात करते हैं, पर यह निर्विवाद सत्य है की विवाह का कोई विकल्प नहीं है.हमारे समाज में कुछ नियम बने हैं(जिन्हें कभी-कभी परंपरा का नाम भी दिया जाता है), जिन्हें यदि विकृत रूप में न प्रकट किया जाय तो वह बहुत ही प्रभावकारी हैं.पति-पत्नी एक दूसरे के पूरक हैं और विवाह उन्हें स्थाई रूप से जोड़ने का माध्यम है.आपके आख़िरी पेराग्राफ से इस सच्चाई का ही भान होता है.

    D33P के द्वारा
    July 21, 2012

    जी सच कहा आज तो विदेशो में भी भारतीय वेवाहिक रिश्तो को मान दिया जाता है !विदेशो में बसे भारतीय भी देश की संस्कृति में रंगे इस रिश्ते को अपनाना चाहते है न कि live -in -rileshanship की तर्ज़ पर जिन्दगी गुजरना चाहते है !अपवाद तो हर जगह है .ऐसे रिश्ते हमारे देश में में भी टूट जाते है जहा आपसी सामंजस्य नहीं है ,आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभार

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
July 19, 2012

अंतिम अनुच्छेद की बातें जंचीं और अच्छी लगीं ! अब तो आज की लडकियां — अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी , आँचल में है दूध और आँखों में पानी की तर्ज़ की तो रहीं नहीं जो इतना सोंचने या मंथन करने की बात है ! सधन्यवाद !!

    D33P के द्वारा
    July 21, 2012

    आपने समय दिया उसके लिए  और आपकी प्रतिक्रिया के लिए  आपका आभार

Punita Jain के द्वारा
July 19, 2012

विवाह एक ऐसी व्यवस्था है ,जिसका कोई विकल्प हो ही नहीं सकता | कुछ कारणों से भले ही कुछ लोगों का विश्वास इस व्यवस्था पर कम हो गया हो ,परन्तु विवाह के बिना तो रिश्तों में स्थायित्व ही नहीं रहेगा और समाज में एक अव्यवस्था फ़ैल जाएगी | आपने अंत में सही कहा है –विवाह की महत्ता को किसी भी तरह से कम नहीं आँका जा सकता !

    D33P के द्वारा
    July 21, 2012

    पुनीता जी नमस्कार आपने दुरुस्त कहा विवाह एक  ऐसी  व्यवस्था है ,जिसका कोई विकल्प हो ही नहीं सकता…… आपका बहुत बहुत शुक्रिया …..आपने समय दिया उसके लिए आपका आभार

jlsingh के द्वारा
July 19, 2012

क्या नसीरा जी के संपर्क में आये दम्पति अपवाद नहीं थे ?.क्यूंकि अपवाद तो हर जगह मौजूद है !ये सौदागरी कुछ हद तक हो सकती है पर इससे वैवाहिक रिश्तो की अहमियत कम नहीं हो जाती ,इस सामाजिक रिश्ते के साथ केवल दो व्यक्ति नहीं कई अनजान लोग जुड़ जाते है !जिससे सामाजिक सौहार्द में बढोत्तरी होती है !विवाह की महत्ता को किसी भी तरह से कम नहीं आँका जा सकता ! आदरणीय दीप्ति जी, सादर अभिवादन! आपने अपने या नासिर जी के प्रश्न का उत्तर खुद ही अपने अंतिम पाराग्राफ़ मे दे दिया ! पति-पत्नी एक दुसरे की जरूरत तो हैं ही, एक ‘अनजाना सा बंधन’ जो प्यार का ही हो सकता है, मैंने कई बुजुर्ग दंपत्ति को साथ रहते, एक दूसरे को मदद करते, मुस्कुराहटों के साथ बतियाते देखा है … इसे सौदागर जैसे शब्द से नवाजना घोर नाइंसाफी होगी! माफ़ करेंगी मेरी यही राय और अनुभव है … नोक-झोंक प्यार को बढ़ावा ही देते हैं ….

    D33P के द्वारा
    July 21, 2012

    नमस्कार आपने सही कहा जब अख़बार में .लेखिका नासिरा शर्मा का लेख पढा :“पति और पत्नी में बड़ा सौदागर कौन” लगा उनको कही कुछ गलत अनुभव हुआ है .पति – पत्नी के इस रिश्ते में थोड़ी मान मनुहार हो सकती है पर सौदा नहीं। रिश्ते में दोनों का सहयोग जरुरी है जहा पत्नी पति और परिवार की सेवा करती है वही पति भी परिवार की हर जरूरत पूरी करने के लिए प्रतिबद्ध है !सामाजिक तौर पर पारिवारिक भरणपोषण के लिए पति जिम्मेदार है न कि पत्नी !रिश्ते में दोनों का सहयोग जरुरी है इसे सौदा तो नहीं कहा जा सकता !दोनों ही एक दुसरे के पूरक है ! ये तो give n take है जो हर रिश्ते पर लागु होता है ! आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभार

dineshaastik के द्वारा
July 19, 2012

विवाह से अच्छा, रिश्तों में स्थिरता लाने वाला विश्वनीय एवं हजारों वर्ष की उम्र वाला अन्य कोई विकल्प नहीं है। आये भी होंगे लेकिन दोषों के कारण अपने शैशव अवस्था में ही समाप्त हो गये। हाँ, इस वैवाहिक बंधन में दासता के भाव को समाप्त करके, मित्रता का भाव लाना जरूरी है।

    nishamittal के द्वारा
    July 19, 2012

    दिनेश जी से सहमत हूँ पूर्णतया

    dineshaastik के द्वारा
    July 28, 2012

    आदरणीय दीप्ति जी को, दिनेश आस्तिक का प्रणाम। राजकमल यह नहीं हैं असली, तर्काधारित यह इल्जाम। छद्मनाम लेकर यह जन्में, इनके और अनेकों रूप,  कभी बोल बम्ब काले आदि, जाने कितने इनके नाम। इन्हें न जो कुई गुरू मानता, दें कमेन्ट इनके विपरीत, साजिश रचते बहुत घृणित यह, कर देते उसको बदनाम। महिलाओं को भी न बक्शे, भाषा इनकी बहुत अशिष्ट। सुरत शक्ल बहुत सुन्दर है, आतंकी से लेकिन काम।

    D33P के द्वारा
    July 28, 2012

    दिनेश जी सादर अभिवादन .. आपने सही कहा सामाजिक रूप से या जैविक नजरिये से विवाह से बेहतर कोई विकल्प नहीं है …..विवाह जैसे बंधन न हो तो समाज में जो अव्यवस्था होगी उससे स्थिति भयावह हो जाएगी !जहा आपसी सामंजस्य नहीं होगा वहा कोई भी रिश्ता हो टूटने में समय नहीं लगता !इसलिए विवाह के रिश्ते में जहा सामाजिक रूप से कई अनजान लोग जुड़ जाते है, स्थिरता लाने के लिए आपसी समझ बहुत जरुरी है ! प्रतिक्रिया के लिए आभार

    dineshaastik के द्वारा
    July 28, 2012

    आदरणीय दीप्ति जी, सादर नमस्कार। उपरोक्त प्रतिक्रिया आदरणीय राजकमल जी के परिपेक्ष में लिखी थी।

    D33P के द्वारा
    July 28, 2012

    दिनेश जी शुभ प्रभात …. प्रभात का स्वागत शुभ मनस्थिति से करे तो पूरा दिन शुभ रहेगा ! सब अपने मानसिक स्तर और मनस्थिति से विचार व्यक्त करते है !मैंने अभी अन्ना अनशन के समय अन्ना जी की एक बात ग्रहण की थी कि अपमान सहना सीखो .वर्ना लोग जीना दुश्वार कर देंगे और मंजिल आपके कई कदम दूर चली जाएगी !माफ़ी चाहूंगी अगर कुछ गलत लगे तो !आभार

    dineshaastik के द्वारा
    July 28, 2012

    आदरणीय दीप्ति जी आपकी बात  शत प्रतिशत सही है मार्गदर्शन करने  के लिये आभार…किन्तु इस मामले में यदि आप लोग मेरा कहीं दोष पायें तो आप लोग जो सजा मुकर्र करें, मैं उसे हृदय से अंगीकृत करूँगा।

    D33P के द्वारा
    July 28, 2012

    दिनेश जी आप आदरणीय है .आपकी लेखनी की मै प्रशंसक हु .. यहाँ दोष किसी का भी नहीं है ,हम सब यहाँ भिन्न परिवेश ,भिन्न परिवार से सम्बन्ध रखते है .,भिन्न विचारधाराओ ,भिन्न मानसिकता से है…. तो मतभेद लाजिमी है ! हमारे बीच कटुता नहीं ,विचार व्यक्त करते समय,किसी विचारधारा का विरोध करते समय भी सौहार्द और शालीनता होनी चाहिए ……….कहते है नफरत काम से करो करने वाले से नहीं ………..विरोध करते समय भी दिल में कटुता न हो तो उसका आनद भी अलग है

    dineshaastik के द्वारा
    July 28, 2012

    आदरणीय दीप्ति जी आपके विचारों से पूर्णतः सहमत हूँ। यह जानकर अति हर्ष हुआ कि आपके मेरे आलेख बहुत ही अच्छे लगते हैं।

rajuahuja के द्वारा
July 19, 2012

माननीया दीप्ति जी, सादर ! विवाह हमारी संस्कृति की उत्कृष्ट पद्धति है ! जिसमे परस्पर विश्वास और सम्मान के साथ तमाम उम्र साथ रहने की प्रतिबद्धता है ! जीवन के झंझावातों में कभी कभार रिश्तों में खटास आ जाती है जो स्थाई नहीं रहती रिश्ते अपनी मर्यादा कायम रखते हैं ! live in reletionship तो पश्चिमी सभ्यता का अंधानुसरण है, जो सतही है !रिश्तों की गहराई से सर्वथा अनजान, दो विपरीत लिंगियों का परस्पर आकर्षण मात्र !

    D33P के द्वारा
    July 23, 2012

    राजू आहूजा जी आपका बहुत बहुत स्वागत है, आपकी बात से पूर्णतया सहमत हु ….जिन रिश्तो में गहराई नहीं है,मर्यादा नहीं हो. केवल सतही तौर पर साथ रहते है .चाहे वो कोई भी रिश्ता हो ,स्थाई नहीं हो सकता ! और फिर कहावत सही है कि जहा दो बर्तन होंगे तो आवाज़ तो होगी ही ,जब विपरीत विचारधारा ,भिन्न परिवारों के दो अजनबी साथ रहने लग जाते है तो किसी मुद्दे पर मतभेद हो सकता है .फिर भी विवाह ऐसे दो व्यक्तियों को बिना किसी स्वार्थ और स्नेह से साथ रहने की अनुमति देता है जो सामाजिक व्यवस्था को सुचारू रूप से सञ्चालन में सहयोगी है! वही पश्चिमी तर्ज़ पर live in reletionship जब तक मन किया साथ रहे जब चाहे अलग हो जाये किसी भी तरह से हमारे संस्कारो के अनुकूल नहीं है ! आपके कीमती समय और प्रतिक्रिया के लिए के लिए आभार

shashibhushan1959 के द्वारा
July 18, 2012

आदरणीय दीप्ती जी, सादर ! विवाह और लिव इन रिलेशनशिप – इन दोनों में कोई तुलना ही नहीं है ! नकली विग में और असली बालों में कोई तुलना हो सकती है क्या ? ऐसा कहने वाले मानसिक रूप से कुंठित ही कहे जायेंगे ! बिना किसी कागजी प्रमाण-पत्र के पति-पत्नी सम्पूर्ण जिंदगी एक दुसरे के साथ और एक दुसरे के लिए बिता देते हैं ! पत्नी की तुलना नौकरानी से करना, पति-पत्नी के रिश्ते को व्यापारिक दृष्टिकोण से तुलना करना, ये सब मानसिक दिवालियेपन की निशानी है ! ऐसे लोग स्वयं अपने जीवन में कहीं न कहीं किसी न किसी कुंठा और पूर्वाग्रह से ग्रस्त होते हैं, और चाहते हैं की उनकी इस कुंठित विचारधारा का समर्थन करने वाले कुछ और लोग बने ! सम्पूर्ण विश्व हम भारतीयों के वैवाहिक जीवन की स्थिरता पर चकित होता है ! ऐसे लोग इस स्थिरता को आघात पहुंचाते हैं ! “”क्या आधुनिक युवा वर्ग की “live in reletionship “ इन्ही समझौतों और परिस्थितियों से बाहर निकलने की कोशिश है ?”" हरगिज नहीं ! “live in reletionship “ पारिस्थितिक समझौता है, विवाह जीवन भर साथ निभाने की गारंटी है ! अपवादों की बात अलग है ! सादर !

    D33P के द्वारा
    July 24, 2012

    शशिभूषण जी सादर नमस्कार आपने सही कहा विवाह और लिव इन रिलेशनशिप – इन दोनों में कोई तुलना ही नहीं है! “live in reletionship “ को पारिस्थितिक समझौता कहे या आज की पीढी की मानसिकता जहा वो आजाद रहने का स्वाद लेना चाहते है , जब तक मन किया साथ रहे जब चाहे अलग हो जाये किसी भी तरह से हमारे संस्कारो के अनुकूल नहीं है ! लेकिन इसका आकर्षण भी अस्थायी है ,जानवरों की तरह ( लिव इन रिलेशनशिप)लोग जिसके साथ जब मर्जी हो रहने लग जाये और जब चाहे अलग हो जाये ,तो अव्यवस्था तो लाजिमी है !लेकिन विवाह का कोई विकल्प नहीं है वैदिक काल से विवाह प्रथा चली आ रही है जिससे समाज में व्यवस्था भी है विवाह ऐसे दो व्यक्तियों को बिना किसी स्वार्थ और स्नेह से साथ रहने की अनुमति देता है जो सामाजिक व्यवस्था को सुचारू रूप से सञ्चालन में सहयोगी है! आपके कीमती समय और प्रतिक्रिया के लिए के लिए आभार

yamunapathak के द्वारा
July 18, 2012

एक सीधी सच्ची और सुन्दर बात सिर्फ उनके लिए जो वाकई विवाह जैसी पवित्र व्यवस्था पर अटूट विश्वास रखते हैं. विवाह के बाद लाभ-हानि,maalik-दास ,सेवा क्यों karanaa,परायेपन का बोध जैसा कुछ भी नहीं रहता.यह आपसी विशवास,प्रेम,सहयोग का सम्बन्ध है.कोई रक्त सम्बन्ध नहीं पर फिर भी अटूट भरोसा होता है इस रिश्ते में.शर्त यह की व्यापारी ना बनो; प्यार करो ज़रूरत दोनों को एक-दुसरे की है पर यह ज़रूरत का भाव प्यार में कैसे छुप जाता है की एक दुसरे के लिए जीना ही मकसद बन जाता है . यह एहसास से परे की अनुभूति है गूंगे का स्वाद जिसका ज़िक्र मुश्किल है. धन्यवाद दीप्तिजी.

    rajuahuja के द्वारा
    July 18, 2012

    वाह यमुना जी ! बहुत सुन्दर बात कही आपने ” गूंगे का स्वाद ” जिसकी व्याख्या के लिए शब्द ही नहीं, अतिसुन्दर !…..साधुवाद !

    D33P के द्वारा
    July 21, 2012

    सही कहा यमुना जी जहा रिश्ते में प्रेम है चाहे वो कोई भी रिश्ता हो लाभ-हानि,मालिक -दास ,सेवा क्यों करे ,अपने पराये का बोध खत्म हो जाता है सिर्फ प्रेम रहा जाता है ! आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभार

akashsen के द्वारा
July 18, 2012

नमस्कार दीप्ति जी बहुत सही कहा .परिस्थितिया चाहे जो भी हो पर विवाह की महत्ता को किसी भी तरह से कम नहीं आँका जा सकता.अपवाद हर जगह है

    D33P के द्वारा
    July 21, 2012

    प्रतिक्रिया के लिए आभार

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
July 18, 2012

इस सामाजिक रिश्ते के साथ केवल दो व्यक्ति नहीं कई अनजान लोग जुड़ जाते है !जिससे सामाजिक सौहार्द में बढोत्तरी होती है !विवाह की महत्ता को किसी भी तरह से कम नहीं आँका जा सकता ! सहमत , आदरणीया दीप्ती जी.  मेरे स्वास्थ्य में काफी सुधार है. आभार.

    D33P के द्वारा
    July 18, 2012

    सादर प्रणाम प्रदीप जी ……आप स्वस्थ रहे आपका आश्रीवाद और स्नेह हम सब पर बना रहे .अपना ध्यान रखे ! आपके कीमती समय और प्रतिक्रिया के लिए आभार


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