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रावण

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_ravanदो दिन बाद दशहरा है भगवान राम की लंका के राजा रावण की विजय की स्मृति में  देशभर में किसी न किसी रूप में दशहरा पर्व मनाया जाता है,!दशहरा बार-बार यही याद दिलाता है कि यदि रावण की तरह अहंकारी हो तो जलना निश्चित है।देशभर में दशहरे के दिन रावण का पुतला दहन कर लोग एक दूसरे को विजय की बधाई देते हैं। इसी दिन राम ने रावण का वध किया था इसीलिए इसे विजयादशमी भी कहते हैं। कोई भी पिता अपने बेटे का नाम रावण नहीं रखना चाहता, क्योंकि रावण को बुराई का प्रतीक मानकर सेकड़ों सालों से उसका पुतला दहन किया जाता रहा है।रावण का पुतला जलाने की प्रथा कब और कैसे शुरू हुई यह तो हम नहीं जानते, लेकिन रावण का पुतला जलाना कितना उचित-अनुचित है! यह विचारणीय  है !

lankesh_ravana

दानववंशीय योद्धाओं में विश्व विख्यात दुन्दुभि के काल में रावण हुआ। रावण के दादा पुलस्त्य ऋषि थे। ब्रह्मा के पुत्र पुलस्त्य और पुलस्त्य के पुत्र विश्रवा की चार संतानों में रावण अग्रज था। इस प्रकार वह ब्रह्माजी का वंशज था! ऋषि विश्रवा ने ऋषि भारद्वाज की पुत्री इडविडा से विवाह किया था। इडविडा ने दो पुत्रों को जन्म दिया जिनका नाम कुबेर और विभीषण था। विश्रवा की दूसरी पत्नी कैकसी से रावण, कुंभकरण और सूर्पणखा का जन्म हुआ।कुबेर रावण का सौतेला भाई था। कुबेर धनपति था। कुबेर ने लंका पर राज कर उसका विस्तार किया था। रावण ने कुबेर से लंका को हड़पकर उस पर अपना शासन कायम किया। वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस दोनों ही ग्रंथों में रावण को बहुत महत्त्व दिया गया है। राक्षसी माता और ऋषि पिता की सन्तान होने के कारण सदैव दो परस्पर विरोधी तत्त्व रावण के अन्तःकरण को मथते रहते हैं।रावण में कुछ अवगुण जरूर थे, लेकिन उसमें कई गुण भी मौजूद थे, जिन्हें कोई भी व्यक्ति अपने जीवन में उतार सकता है। यदि हम रामायण के प्रसंगों को बारीकी से पढें, तो रावण न केवल महाबलशाली था, बल्कि बुद्धिमान भी था। फिर उसे सम्मान क्यों नहीं दिया जाता? कहा जाता है कि वह अहंकारी था।(पराक्रम और ज्ञान इंसान को अहंकारी बना ही देता है )
सुंबा राज्य के राजा, वास्तुकार और इंजीनियर मयदानव ने रावण के पराक्रम से प्रभावित होकर अपनी परम रूपवान पाल्य पुत्री मंदोदरी का विवाह रावण से कर दिया था!ऐसी मान्यता है कि रावण ने अमृत्व प्राप्ति के उद्देश्य से भगवान ब्रह्मा की घोर तपस्या कर वरदान माँगा लेकिन ब्रह्मा ने उसके इस वरदान को न मानते हुए कहा कि तुम्हारा जीवन नाभि में स्थित रहेगा। रावण ने शिव तांडव स्तोत्र की रचना करने के अलावा अन्य कई तंत्र ग्रंथों की रचना की। कुछ का मानना है कि लाल किताब (ज्योतिष का प्राचीन ग्रंथ) भी रावण संहिता का अंश है। रावण ने यह विद्या भगवान सूर्य से सीखी थी। ‘रावण संहिता’ में उसके दुर्लभ ज्ञान के बारे में विस्तार से वर्णन मिलता है।
वह तपस्वी भी था। रावण ने कठोर तपस्या के बल पर ही दस सिर पाए थे!जैन धर्म के कुछ ग्रंथों में रावण को प्रतिनारायण कहा गया है।
रावण समाज सुधारक और प्रकांड पंडित था। तमिल रामायणकारकंब ने उसे सद्चरित्र कहा है।(यदि सद्चरित्र  नहीं होता तो सीता हरण कर उसकी  अस्मिता भंग करने का दोषी होता  )उसके यही नहीं, रावण एक महान कवि भी था। उसने शिव ताण्डव स्त्रोत्मकी। उसने इसकी स्तुति कर शिव भगवान को प्रसन्न भी किया। रावण वेदों का भी ज्ञाता था। उनकी ऋचाओंपर अनुसंधान कर विज्ञान के अनेक क्षेत्रों में उल्लेखनीय सफलता अर्जित की। वह आयुर्वेद के बारे में भी जानकारी रखता था। वह कई जडी-बूटियों का प्रयोग औषधि के रूप में करता था।महाराष्ट्र के अमरावती और गढचिरौलीजिले में कोरकू और गोंड आदिवासी रावण और उसके पुत्र मेघनाद को अपना देवता मानते हैं। अपने एक खास पर्व फागुन के अवसर पर वे इसकी विशेष पूजा करते हैं। इसके अलावा, दक्षिण भारत के कई शहरों और गांवों में भी रावण की पूजा होती है।यदि राम और रावण की तुलना की जाये तो राम योग्य पुरुष थे परन्तु लंकापति रावण ज्योतिष और आयुर्वेद का ज्ञाता  तंत्र-मंत्र, सिद्धि और दूसरी कई गूढ विद्याओं का भी ज्ञाता था। ज्योतिष विद्या के अलावा, उसे रसायन शास्त्र का भी ज्ञान प्राप्त था। उसे कई अचूक शक्तियां हासिल थीं, जिनके बल पर उसने अनेक चमत्कारिककार्य संपन्न किए। रावण संहिता में उसके दुर्लभ ज्ञान के बारे में विस्तार से वर्णन किया गया है। वह राक्षस कुल का होते हुए भी भगवान शंकर का उपासक था। उसने लंका में छह करोड से भी अधिक शिवलिंगोंकी स्थापना करवाई थी।
यही नहीं, रावण एक महान कवि भी था। उसने शिव ताण्डव स्त्रोत्मकी। उसने इसकी स्तुति कर शिव भगवान को प्रसन्न भी किया। रावण वेदों का भी ज्ञाता था। उनकी ऋचाओंपर अनुसंधान कर विज्ञान के अनेक क्षेत्रों में उल्लेखनीय सफलता अर्जित की। वह आयुर्वेद के बारे में भी जानकारी रखता था। वह कई जडी-बूटियों का प्रयोग औषधि के रूप में करता था।
दानववंशीय योद्धाओं में विश्व विख्यात दुन्दुभि के काल में रावण हुआ। रावण के दादा पुलस्त्य ऋषि थे। ब्रह्मा के पुत्र पुलस्त्य और पुलस्त्य के पुत्र विश्रवा की चार संतानों में रावण अग्रज था। इस प्रकार वह ब्रह्माजी का वंशज था! ऋषि विश्रवा ने ऋषि भारद्वाज की पुत्री इडविडा से विवाह किया था। इडविडा ने दो पुत्रों को जन्म दिया जिनका नाम कुबेर और विभीषण था। विश्रवा की दूसरी पत्नी कैकसी से रावण, कुंभकरण और सूर्पणखा का जन्म हुआ।कुबेर रावण का सौतेला भाई था। कुबेर धनपति था। कुबेर ने लंका पर राज कर उसका विस्तार किया था। रावण ने कुबेर से लंका को हड़पकर उस पर अपना शासन कायम किया। वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस दोनों ही ग्रंथों में रावण को बहुत महत्त्व दिया गया है। राक्षसी माता और ऋषि पिता की सन्तान होने के कारण सदैव दो परस्पर विरोधी तत्त्व रावण के अन्तःकरण को मथते रहते हैं।रावण में कुछ अवगुण जरूर थे, लेकिन उसमें कई गुण भी मौजूद थे, जिन्हें कोई भी व्यक्ति अपने जीवन में उतार सकता है। यदि हम रामायण के प्रसंगों को बारीकी से पढें, तो रावण न केवल महाबलशाली था, बल्कि बुद्धिमान भी था। फिर उसे सम्मान क्यों नहीं दिया जाता? कहा जाता है कि वह अहंकारी था।(पराक्रम और ज्ञान इंसान को अहंकारी बना ही देता है )
सुंबा राज्य के राजा, वास्तुकार और इंजीनियर मयदानव ने रावण के पराक्रम से प्रभावित होकर अपनी परम रूपवान पाल्य पुत्री मंदोदरी का विवाह रावण से कर दिया था!ऐसी मान्यता है कि रावण ने अमृत्व प्राप्ति के उद्देश्य से भगवान ब्रह्मा की घोर तपस्या कर वरदान माँगा लेकिन ब्रह्मा ने उसके इस वरदान को न मानते हुए कहा कि तुम्हारा जीवन नाभि में स्थित रहेगा। रावण ने शिव तांडव स्तोत्र की रचना करने के अलावा अन्य कई तंत्र ग्रंथों की रचना की। कुछ का मानना है कि लाल किताब (ज्योतिष का प्राचीन ग्रंथ) भी रावण संहिता का अंश है। रावण ने यह विद्या भगवान सूर्य से सीखी थी। ‘रावण संहिता’ में उसके दुर्लभ ज्ञान के बारे में विस्तार से वर्णन मिलता है।
वह तपस्वी भी था। रावण ने कठोर तपस्या के बल पर ही दस सिर पाए थे!जैन धर्म के कुछ ग्रंथों में रावण को प्रतिनारायण कहा गया है।
रावण समाज सुधारक और प्रकांड पंडित था। तमिल रामायणकारकंब ने उसे सद्चरित्र कहा है।(यदि सद्चरित्र  नहीं होता तो सीता हरण कर उसकी  अस्मिता भंग करने का दोषी होता  )उसके यही नहीं, रावण एक महान कवि भी था। उसने शिव ताण्डव स्त्रोत्मकी। उसने इसकी स्तुति कर शिव भगवान को प्रसन्न भी किया। रावण वेदों का भी ज्ञाता था। उनकी ऋचाओंपर अनुसंधान कर विज्ञान के अनेक क्षेत्रों में उल्लेखनीय सफलता अर्जित की। वह आयुर्वेद के बारे में भी जानकारी रखता था। वह कई जडी-बूटियों का प्रयोग औषधि के रूप में करता था।महाराष्ट्र के अमरावती और गढचिरौलीजिले में कोरकू और गोंड आदिवासी रावण और उसके पुत्र मेघनाद को अपना देवता मानते हैं। अपने एक खास पर्व फागुन के अवसर पर वे इसकी विशेष पूजा करते हैं। इसके अलावा, दक्षिण भारत के कई शहरों और गांवों में भी रावण की पूजा होती है।यदि राम और रावण की तुलना की जाये तो राम योग्य पुरुष थे परन्तु लंकापति रावण ज्योतिष और आयुर्वेद का ज्ञाता  तंत्र-मंत्र, सिद्धि और दूसरी कई गूढ विद्याओं का भी ज्ञाता था। ज्योतिष विद्या के अलावा, उसे रसायन शास्त्र का भी ज्ञान प्राप्त था। उसे कई अचूक शक्तियां हासिल थीं, जिनके बल पर उसने अनेक चमत्कारिककार्य संपन्न किए। रावण संहिता में उसके दुर्लभ ज्ञान के बारे में विस्तार से वर्णन किया गया है। वह राक्षस कुल का होते हुए भी भगवान शंकर का उपासक था। उसने लंका में छह करोड से भी अधिक शिवलिंगोंकी स्थापना करवाई थी।
यही नहीं, रावण एक महान कवि भी था। उसने शिव ताण्डव स्त्रोत्मकी। उसने इसकी स्तुति कर शिव भगवान को प्रसन्न भी किया। रावण वेदों का भी ज्ञाता था। उनकी ऋचाओंपर अनुसंधान कर विज्ञान के अनेक क्षेत्रों में उल्लेखनीय सफलता अर्जित की। वह आयुर्वेद के बारे में भी जानकारी रखता था। वह कई जडी-बूटियों का प्रयोग औषधि के रूप में करता था।
ravana dahan
लेकिन इन सबके बावजूद  रावण की सीता हरण की एक गलती ने उसे ऐतिहासिक खलनायक बना दिया ……और राम को देवता की गद्दी पर विराजमान कर दिया !.लेकिन अगर देखा जाये तो  क्या वो गलती थी .लक्ष्मण ने सूर्पणखा की नाक काट दी थी, जो रावण की बहन थी। इसी कारण रावण ने सीता का हरण कर लिया था !क्या एक स्वाभिमानी भाई की नज़र के नज़रिए से देखा जाये तो  रावण अपनी जगह सही था शायद कोई भी बहन नहीं चाहेगी कि उसके अपमान का बदला लेने में उसका भाई इतना सक्षम होना ही चाहिए जिस पर वो गर्व कर सके ..क्या आज कोई भी स्त्री राम जैसे पति का वरण करना चाहेगी जो अपने जीवन का लम्बा समय पति के साथ वनवास का भोगने के बावजूद किसी की बातो में आकर गर्भवती अवस्था में उसका परित्याग कर दे ?
आज उसी रावण को एक बार मारने  के बाद रोज़ रोज़ मार कर उत्सव मनाया जाता है
दुख का विषय है कि आज हम चाहे कितने ही रावण जला लें लेकिन समाज में कुसंस्कार और अमर्यादा के रावण रोज पनप रहे हैं।  सीता के हरण पर रावण का वध करने और उत्सव मानाने वाले  देश की कितनी सीताये रोज़ किसी न किसी रावण के हाथो बेइज्जत हो रही है,कभी गुवहाटी में सरे राह रावणों के बीच  अपमानित होती है कभी दिल्ली  में किसी सड़क पर दौड़ती बंद कार में .! देश में असली रावण  तो आजाद घूम रहे है  और उनके  पुतले जलाकर किस बात के उत्सव मनाये जा रहे है ? दशहरे के नाम पर लाखो रूपये फूंके जा रहे है !!रावण ने जो किया वो एक स्वाभिमानी भाई की तरह एक भाई होने का फ़र्ज़ निभाया !लेकिन क्या आज कोई राम है जो देश की लुटती हुई सीताओ को बचा सके  !
gaingrape
यही नहीं देश के सत्ता के दलाल किसी रावण से कम है ?.जो देश  की हर अच्छाई का अपहरण कर  रहे है उनका वध करने के लिए कोई राम क्यों पैदा नहीं हो  रहा …..?.
ravan

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44 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Mohinder Kumar के द्वारा
November 29, 2012

दिप्ती जी, अच्छाई और बुराई के बीच में एक बहुत ही बारीक न दिखने वाली रेखा है.. शायद समय इस बात को तय करता है कि कौन किस समय क्या बन जायेगा. सारग्रभित लेख के लिये आभार. आजकल कहां गायब हैं आप.

    D33P के द्वारा
    December 5, 2012

    नमस्कार मोहिंदर जी सच कहा आपने अच्छाई और बुराई के बीच में एक बहुत ही बारीक न दिखने वाली रेखा है जिसे समय के साथ साथ देखने वाले का नजरिया भी तय करता है ! गायब कहाँ होना है ……….यहीं है इसी धरती पर इसी आसमान के तले….थोडा व्यस्त होने के कारण मंच से थोडा दूर रहना पड़ा ! प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत बहुत आभार

raj1985 के द्वारा
November 3, 2012

Shrimati Diptiji, Ye to bahot hi acchhi bat hai ki aap bure logo me bhi acchhai dekhti hai. To phir aaj ke ravano ki acchhai ki jankari bhi aap ko hi vistar ke sath deni chahiye. Tabhi to log unke bure karmo ke bavjud unke acchhe guno ko jankar unki puja karenge maharashtra jile ke aadivasio ki tarah. Kahne ko to mere dil me bhi bahot kuch hai par itna hi kahunga ki shabdo ke jaal me ulajhkar agar aap Ravan ke sita haran ko sirf ek galti manti hai aur use ek swabhimani purush manti hai to aaj ke ravana bhi aapke liye swabhimani purush hi to hai kyonki ye bhi apne kisi na kisi apman ka badla lene ke liye hi aisa kar rahe honge. Rahi bat dushman ki acchhai swikar karne aur Burai se sabak lene ki to aapki jankari ke liye ye bata du ki burai ke pratik ke rup me hi ravan ke putle ka dahan uski buraiyon se sabak lene ke liye kiya jata hai. Aur aapke us bhramak tathya ke bare me bhi spasht karna chahta hu ki ravan apni ek galti ke karan aitihasic khalnayak nahi bana tha. Usse pahle bhi wah kai pap kar chuka tha. Jiska ullekh maine pichhli pratikriya me kiya tha. Aaj agar kusanskar aur amaryada ke ravan roj panap rahe hai to unhe niyantrit karne ke liye aap jaisi striyo ko ma sita jaise adarsh bhi to apnane honge. Ram jaise sanskar bhi apne putro me pallavit karne honge. Ladkiyo ko bhi apni suraksha ke prati sajag rahne ki jarurat hai. Har ladki ki suraksha ke liye ek sipahi to tainat kiya nahi ja sakta. Aise me ladkiyo ko judo karate sikhkar apne aap ko majbut karne ki bhi aavashyakta hai. Kisi nirjan sthan ya ratri ke samay apne parijano ka sath le. Naitik patan bhi is samasya ka mukhya karan hai. Pashchimi sanskriti ka anusaran kar ladkiya aajkal chhote kapde pahnana, ladko ke sath akele ghumna, partiyo me akele jana, inhi sab laparvahiyo ka labh uthakar bure log apni mansha me safal ho rahe hai. Police aur prashasan ke sath ye hamari bhi jimmedari hai ki ham apni suraksha ke prati utne hi sajag rahe. Acchhai aur burai ka sangharsh nirantar hota raha hai aur hota rahega. Bas hame jarurat hai to sangharsh ke liye taiyar rahne ki, taras khane ki nahi. Aur ab mujhe ummeed hai ki aap apne is blog me sudhar kar ravan par garv karne ki bat ko vapas lengi. Dhanyavad.

raj1985 के द्वारा
October 30, 2012

kya chahti he aap ki ravan dahan band karke uski puja shuru karde. uski visheshtao ka gungan kare. wo aisa mahapandit aur shivbhakta tha jo chhal se sita mata ko har laya tha. Jo Sita mata ko barbar shadi ke liye vivash karne ki koshish karta tha ye jante huye bhi ki wah shadishuda hai. Kitne jankalyan ke karya usne apni chamatkari shaktiyon se kiye. Kuber ka rajya hadapana, uski patni se balatkar, rishi munio ko mar dena, atyachar karna ye sab swabhimani purush ke lakshan hai kya? Itna hi swabhimani hota to sidhe sriram se yudh karke apni bahan ke apman ka badla leta. aur apke anusar to is desh me koi bhi acha insan hai hi nahi to ye desh ab tak khatm kyu nahi ho gaya. ab tak aapko koi ravan kyu nahi utha le gaya. is desh me ab bhi kai log hai jo ram ke adarsho se shiksha lekar burayi ka samna kar rahe he. isliye ravan dahan aaj bhi prasangik hai. sriram ke sanskar hamari har pidhi ke yuvao tak pahuche, yahi is aayojan ka mukhya uddeshya hai jo buryi par acchai ki jeet ko bal deta hai aur logo ko acchai ke liye prerit karta hai.

    D33P के द्वारा
    November 2, 2012

    श्रीमान राज जी नमस्कार ……. मुझे न रावण के गुणों का बखान करना है न श्री राम का गुणगान .आपको जो हालत है दिखाई नहीं देते !रावण दहन इसलिए होता है जिससे लोगो को समझ में आये कि बुरे का क्या हश्र होता है !हमारे देश में जहा सीता हरण की सजा रावण को हर साल दी जाती है उसी देश में कितनी सीतायें सुरक्षित है ,कितने राम है ?इस देश की बात कर रहे है ……..क्या हालत है आज .सत्ता से लेकर जनता तक सब जगह एक से हालत है .आपको तरस नहीं आता जिस देश में आप है वहां ये सब देखकर ……आपके दिल में अच्छाई है पर सब ऐसे तो नहीं है न राज जी दिल में बहुत कुछ है लिखने के लिए पर …एक ही बात कहूँगी …… दुश्मन की भी अच्छाई स्वीकार करने और बुराई से सबक लेने में कोई बुराई नहीं है ….आप मेरे ब्लॉग तक आये इसके लिए आपका बहुत बहुत आभार …और स्वागत है ,उम्मीद है आगे भी आपका सहयोग बना रहेगा और प्रतिक्रिया का इंतज़ार भी

yogi sarswat के द्वारा
October 29, 2012

क्या गज़ब का लिखती हैं आप , आदरणीय दीप्ति जी, सादर नमस्कार ! विजयादशमी के अवसर पर राम-रावण के गुण-दोषों कि विवेचना करती रचना ! रावण का गुणगान, सम्पूर्ण स्त्री जाति की सीता से तुलना ! पुनः यह कहना ….. “”समाज में कुसंस्कार और अमर्यादा के रावण रोज पनप रहे हैं। सीता के हरण पर रावण का वध करने और उत्सव मानाने वाले देश की कितनी सीताये रोज़ किसी न किसी रावण के हाथो बेइज्जत हो रही है,कभी गुवहाटी में सरे राह रावणों के बीच अपमानित होती है “”” मन भ्रमित कर रहा है ! बहुत खूब

    D33P के द्वारा
    November 2, 2012

    नमस्कार योगी जी वैसे आप बहुत लम्बे अन्तराल के बाद मेरे पेज पर आये है आपका स्वागत है देर से जवाब के लिए माफ़ी चाहूंगी …….आपकी सकारात्मक प्रतिक्रिया के लिए आभार

shashibhushan1959 के द्वारा
October 27, 2012

आदरणीय दीप्ति जी, सादर ! विजयादशमी के अवसर पर राम-रावण के गुण-दोषों कि विवेचना करती रचना ! रावण का गुणगान, सम्पूर्ण स्त्री जाति की सीता से तुलना ! पुनः यह कहना ….. “”समाज में कुसंस्कार और अमर्यादा के रावण रोज पनप रहे हैं। सीता के हरण पर रावण का वध करने और उत्सव मानाने वाले देश की कितनी सीताये रोज़ किसी न किसी रावण के हाथो बेइज्जत हो रही है,कभी गुवहाटी में सरे राह रावणों के बीच अपमानित होती है “”" मन भ्रमित कर रहा है ! सादर !

    D33P के द्वारा
    October 27, 2012

    शशिभूषण जी सादर नमस्कार ………..मेरा अभिप्राय रावण का गुणगान नहीं है …..न मै राम विरोधी हु अभिप्राय केवल इतना है !हर साल रावण के पुतले को जलाने वाले ही समाज को कलंकित कर रहे है ,रावण दहन का उद्देश्य लोगो को बुराई का क्या हश्र होता है यही बताना है पर रावण दहन करने वाले ही बुराई में लिप्त है !आज समाज में क्या हो रहा है ? भ्रष्ठाचार .हत्या रेप अपहरण क्या कुछ नहीं हो रहा है जो लोग इन सबमे लिप्त है उनके अन्दर का रावण (बुरे ) नहीं मर सकता !ऐसे लोग रावण दहन करके क्या साबित करना चाहते है ………जलाना है तो अपने अन्दर की बुराई को जलाये ..रोज़ कागज़ का रावण जलाकर क्या होगा ? आपकी प्रतिक्रिया के लिए मै आपकी आभारी हूँ

rahulpriyadarshi के द्वारा
October 25, 2012

लंका वाले रावण के अपने उसूल थे,अपने कुछ कायदे थे,वो निहायत ही नियम-सम्मत तरीके से अपना विरोध प्रकट करता था,राक्षस था किन्तु उसूलों का पक्का था,इस मुह्जली कांग्रेस सरकार की तरह अनाचारी नहीं था,यही कारण रहा कि उसकी हत्या करने के लिए भगवन ने खुद अवतार लिया और उसके मोक्ष का मार्ग प्रसस्त किया,लेकिन ये सरकार अपने कर्मों से अपना गला खुद घोट रही है,इसके कर्म ही इसको ले डूबेंगे,इनमे शामिल लोगों को मोक्ष प्राप्ति कि आशा छोड़ देनी चाहिए,इन्हें मारने के लिए भगवन को अपना वक़्त जाया करने कि कोई जरुरत नहीं,इनका जाना आत्महत्या होगी,जिसकी सजा है कि अगले जन्म में नाली के कीड़े बनेंगे.आपके आलेख को मेरा समर्थन,अच्छा लगा. :)

    D33P के द्वारा
    October 27, 2012

    राहुल जी नमस्कार सकारात्मक टिप्पणी के लिए आभार सच में मुझे आपका समर्थन अच्चा लगा

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
October 24, 2012

मान्या दीप्ति जी , साभिवादन !……. आप ने बिलकुल सत्य कहा ये सारे लोग दुर्दांत दैत्य नहीं तो और क्या हैं ? सार्थक व समसामयिक आलेख के लिए बधाई !!

    D33P के द्वारा
    October 27, 2012

    विजय जी नमस्कार सकारात्मक टिप्पणी के लिए आभार

Ravinder kumar के द्वारा
October 24, 2012

इसमे संशय नहीं के रावण बुद्धिमान, तेजस्वी और ज्ञानी था. इतना ज्ञान और तेज होते हुए भी उसने महोदया, नमस्कार. एक स्त्री के हरण जैसा घृणित कार्य किया. इस कार्य के लिए उसे सामान्य अपराधियों से कठोर दंड मिलना अनिवार्य था. रही एक भाई के कर्त्तव्य को पूर्ण करने वाली वाली बात, तो गलती शूर्पनखा ने की थी. अगर रावण इतना ज्ञानी था तो उसे अपनी बहन को समझाना चाहिए था. परन्तु यह उसके लिए असहनीय था के कोई उसके निरंकुश शासन में हस्तक्षेप करे. शूर्पनखा की आड़ में वह अपनी हवस की पूर्ति करना चाहता था. आपका चिंतन अच्छा लगा. बधाई. नमस्कार.

    D33P के द्वारा
    October 27, 2012

    रविन्द्र जी . ………..सादर नमस्कार .. जो हुआ उसे टाला जा सकता था रावण ज्ञानी जरुर था पर अहंकार के अधीन रावण ने सीता हरण का जो कृत्य किया वही उसके विनाश का कारण बना ……..मेरा अभिप्राय रावण का गुणगान से नहीं है …..न मै राम विरोधी हु अभिप्राय केवल इतना है !हर साल रावण के पुतले को जलाने वाले ही समाज को कलंकित कर रहे है ,रावण दहन का उद्देश्य लोगो को बुराई का क्या हश्र होता है यही बताना है पर रावण दहन करने वाले ही बुराई में लिप्त है !आज समाज में क्या हो रहा है ? भ्रष्ठाचार .हत्या रेप अपहरण क्या कुछ नहीं हो रहा है जो लोग इन सबमे लिप्त है उनके अन्दर का रावण (बुराई ) नहीं मर सकता !ऐसे लोग रावण दहन करके क्या साबित करना चाहते है ………जलाना है तो अपने अन्दर की बुराई को जलाये ..रोज़ कागज़ का रावण जलाकर क्या होगा ?क्या आज लोगो को इतनी सी बात समझ में नहीं आती कि रावण अहंकारी था .चाहे जितने गुण हो पर उसकी बुराई ने उसका अंत किया ! आपने प्रतिक्रिया अंकित की इसके लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद

akraktale के द्वारा
October 24, 2012

दीप्ति जी              सादर, बहुत सुन्दर आलेख. इसमें कोई शक नहीं है कि धर्म ग्रंथों में जों रावण कि छवि पर्स्तुत कि गयी है उसका स्पष्ट उद्देश्य है कि जों व्यक्ति इतना बलशाली हो जिसके कब्जे में शनि जैसे डरावने गृह हो जिसका पुत्र भाई और पूरा ही परिवार इतना बल शाली हो जो स्वयं इतना पुन्य कमा चुका है कि उसका कहीं कोई तोड़ ही नहीं हो उसकी म्रत्यु कैसे हो देवताओं के लिए भी प्रश्नचिन्ह खडा कर दे. ऐसा व्यक्ति भी जब एक अनैतिक कार्य करता है तो फिर उसकी मौत निश्चित है. सीता हरण एक अनैतिक कार्य ही था. रावण का पौरुष इस बात में था कि वह लक्षमण को या तो शूर्पनखा से विवाह के लिए बाध्य कर दे या फिर प्रतिशोध स्वरुप उसे दंड दे. रामायण सीखने का विषय है किसी ने क्या किया क्या कहा का विषय नहीं है. आज रावण दहन जिन उद्देश्यों को लेकर शुरू किया गया था. वह पूर्ण नहीं हो रहे हैं और देश में असुरी शक्ति बढ़ रही है. रावण दहन का अब कोई अर्थ नहीं. सुन्दर आलेख के लिए बधाई स्वीकारें.

    D33P के द्वारा
    October 24, 2012

    अशोक जी सादर नमस्कार आपने सही कहा हमारा विरोध आज समाज में फैले रावण तत्व(बुराई) से है ,हर साल रावण के पुतले को जलाने वाले ही समाज को कलंकित कर रहे है !रावण दहन का उद्देश्य लोगो को बुराई का क्या हश्र होता है यही बताना है पर रावण दहन करने वाले ही बुराई में लिप्त है !हर वर्ष रावण दहन पर लाखो की धन राशि स्वाहा की जाती है !उसका उपयोग किया जा सकता है आपने प्रतिक्रिया अंकित की इसके लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद विजयादशमी के पावन पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएं.स्वीकार करे

    D33P के द्वारा
    October 24, 2012

    रावण ज्ञानी था वेदों का ज्ञाता था पर अहंकारी था और उसका अहंकार उसके सब गुणों पर भारी रहा यही उसके विनाश का कारण बना ,यही सीख का विषय है ,आज लोग सत्ता और धन के बल पर बुराई को अंजाम देने में पीछे नहीं है उनको यहाँ से कुछ सीख लेनी चाहिए ,बुराई का अंत बुरा ही होना निश्चित है

jlsingh के द्वारा
October 24, 2012

आदरणीया दीप्ति जी, सादर अभिवादन! आपका शोधपूर्ण आलेख सराहनीय है, पर यह विषय विवादित है. जैसा कि आप प्रतिक्रियायों महसूस कर रही होंगी! मैंने इसे दो दिन पूर्व पढ़ा था. तब मैंने जान बूझकर प्रतिक्रिया नहीं दी! राम हमारे आस्था के प्रतीक हैं, और उनकी गणना मर्यादापुरुषोत्तम के रूप में की जाती है. रावण ज्ञानी था पर उसमे अहंकार था …. ज्यादा मैं नहीं लिखूंगा. अन्य ज्ञानी पुरुष अपने विचार देंगे और दे रहे हैं. कुछ बातें तर्कहीन होती है … पर विचार विमर्श से कोई नुक्सान नहीं ….. आभार सहित!

    D33P के द्वारा
    October 24, 2012

    जवाहर जी नमस्कार आपने सही कहा ये बहुत विवादित विषय है !आरम्भ से ही हमें यही सिखाया गया है कि राम हमारे भगवान है ,हमारी धार्मिक आस्था के प्रतीक है ! रावण ज्ञानी था पर अहंकारी था और उसका अहंकार उसके सब गुणों पर भारी रहा ! हमारा विरोध या पक्ष राम या रावण से नहीं है !और न ही ये बहस का मुद्दा है !हमारा विरोध आज समाज में फैले रावण तत्व(बुराई) से है ,हर साल रावण के पुतले को जलाने वाले ही समाज को कलंकित कर रहे है ! आपका बहुत बहुत धन्यवाद जो आपने प्रतिक्रिया अंकित की विजयादशमी के पावन पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएं.

vasudev tripathi के द्वारा
October 24, 2012

आदरणीय दीप्ति जी, पूर्ण विनम्रता के साथ कुछ बिन्दु रखना चाहूँगा। रावण के विषय में मैंने आपने अथवा किसी अन्य व्यक्ति ने कहाँ से जाना होगा; निःसंदेह रामायण से ही.! तो क्यों न रामायण का गंभीर अध्ययन किया जाये ताकि इस तरह के भ्रमों से बचा जा सके जोकि आपके लेख में प्रतिबिंबित हो रहे हैं.! स्वयं रामायणकार रावण को कभी महान नहीं कह सका, उसने उसे अधम की श्रेणी में रखा., किन्तु आज के विद्वान न जाने कहाँ कहाँ से उसमें सद्गुणों को ढूंढ लाते हैं.!! मुझे बचपन से ही वाल्मीकि रामायण, मानस, अध्यात्म रामायण सहित अन्य कई ग्रंथों (पुराणों) के अध्ययन का अवसर मिला.. किन्तु ऐसी व्याख्याए खान से निकलती हैं मैं नहीं समझ पाता हूँ.! शास्त्रों का ज्ञाता होना, तंत्र अथवा रसायन का ज्ञाता होना अथवा महापंडित होना विशेषता तो होती है किन्तु सदगुण नहीं होता.! सद्गुणता अपनी सामर्थ्य व विशेषताओं के प्रयोग से सिद्ध होती है| विस्तार भय से मानस अथवा श्रीमद्वल्कीयरामायण के श्लोकों सन्दर्भों को नहीं रख सकता किन्तु एक श्लोक है संस्कृत में- “विद्या विवादाय धनम् मदाय, शक्ति: परेषाम् परिपीडनाय। खलस्य साधोर्विपरीतमेतद्ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय॥ अर्थात दुष्ट की विद्या विवाद के लिए, धन अहंकार के लिए, शक्ति दूसरों को कष्ट देने के लिए होती है। इसके विपरीत सद्गुणी साधु पुरुष के उपरोक्त गुण क्रमशः ज्ञान, दान व पर-रक्षा के लिए होते हैं। भारतीय दर्शन में विद्या व ज्ञान दो भिन्न स्थितियों के लिए अभिप्रेत हैं। रावण किस स्थिति में था..?? बल से सम्पूर्ण ब्रम्हाण्ड में उसके मचाए हाहाकार का विस्तृत वर्णन मिलता है- “अस भ्रष्ट अचारा…..। “हिंसा पर अति प्रीति तिन्ह के पापन कवन मिति”। सीता का अपहरण पहला पाप नहीं था जैसा कि आपने लिखा… हजारों स्त्रियॉं के बलात्कार का पाप अपने सिर ढोये घूमता था रावण। एक बलात्कारित स्त्री के श्राप के कारण ही रावण को सीता को अशोक वाटिका में रखना पड़ा था। वाल्मीकि रामायण के युद्धकाण्ड में पढ़ें। मानस के अरण्यकाण्ड में पढे कि मनुष्यों ऋषि मुनियों को उसके अनुचर मार के खा जाते थे; “निसिचर निकर सकल मुनि खाये…” विद्या में जिस तंत्र रसायन का आपने उल्लेख किया उसे मानस के लंकाकाण्ड अथवा वाल्मिकीय के उत्तरकाण्ड में पढ़ें, संसार के त्रास के लिए किस प्रकार प्रयोग किया गया.! रावण बहन का बदला राम लक्ष्मण से न लेकर चोरी से भेष बदलकर स्त्री चुराकर लेता है, आपको वो भी सही लगता है.! विस्तार तो बहुत है, उचित होगा आप रामायण में ही पढ़ें तथा सामर्थ्य व सद्गुणों में भी अंतर समझें। रामायण का रावण तो ऐसा ही है जिसे रामायण में दुष्ट, सठ, अधम, पापमति, निर्लज्ज, परस्त्रीगामी, हिंसक व अत्याचारी विशेषणों से भूषित किया गया है…! आपका रावण कहाँ से आया… कहना कठिन है! किन्तु पुतला उसी रावण का जलाते हैं जिसके विषय में हम रामायण जानते हैं और उसे बुराई के प्रतीक के रूप में मानते हैं.! …और आज राम हजारों सीताओं की रक्षा के लिए कहाँ से निकलकर आएंगे जब आज रावण को ही सही ठहराया जाने लगा है..????

    D33P के द्वारा
    October 24, 2012

    आदरणीय वासुदेव जी नमस्कार  निसंदेह जैसा कि आज तक हमने पढा है  राम एक आदर्श पुत्र थे। पिता की आज्ञा उनके लिये सर्वोपरि थी । पति के रूप में राम ने सदैव एकपत्नीव्रत का पालन किया। राजा के रूप में प्रजा के हित के लिये स्वयं के हित को हेय समझते  थे। विलक्षण व्यक्तित्व था उनका। वे अत्यन्त वीर्यवान, तेजस्वी, विद्वान, धैर्यशील, जितेन्द्रिय, बुद्धिमान, सुंदर, पराक्रमी, दुष्टों का दमन करने वाले, युद्ध एवं नीतिकुशल, धर्मात्मा, मर्यादापुरुषोत्तम, प्रजावत्सल, शरणागत को शरण देने वाले, सर्वशास्त्रों के ज्ञाता एवं प्रतिभा सम्पन्न थे । लेकिन साथ ही वाल्मीकि जी ने रावण के गुणों को निष्पक्षता के साथ स्वीकार करते हुये उसे चारों वेदों का विश्वविख्यात ज्ञाता और महान विद्वान बताते हैं। वे अपने रामायण में हनुमान का रावण के दरबार में प्रवेश के समय लिखते हैं- अहो रूपमहो धैर्यमहोत्सवमहो द्युति:। अहो राक्षसराजस्य सर्वलक्षणयुक्तता॥ आगे वे लिखते हैं “रावण को देखते ही राम मुग्ध हो जाते हैं और कहते हैं कि रूप, सौन्दर्य, धैर्य, कान्ति तथा सर्व लक्षणयुक्त होने पर भी यदि इस रावण में अधर्म बलवान न होता तो यह देवलोक का भी स्वामी बन जाता।”वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस दोनों ही ग्रंथों में रावण को बहुत महत्त्व दिया गया है। राक्षसी माता और ऋषि पिता की सन्तान होने के कारण सदैव दो परस्पर विरोधी तत्त्व रावण के अन्तःकरण को मथते रहते हैं। वाल्मीकि रावण के अधर्मी होने को उसका मुख्य अवगुण मानते हैं।तुलसीदास जी केवल उसके अहंकार को ही उसका मुख्य अवगुण बताते हैं। उन्होंने रावण को बाहरी तौर से राम से शत्रु भाव रखते हुये हृदय से उनका भक्त बताया है। तुलसीदास के अनुसार रावण सोचता है कि यदि स्वयं भगवान ने अवतार लिया है तो मैं जाकर उनसे हठ पूर्वक बैर करूंगा और प्रभु के बाण के आघात से प्राण छोड़कर भव-बन्धन से मुक्त हो जाऊंगा।रावण जहाँ दुष्ट था और पापी था वहीं उसमें शिष्टाचार और ऊँचे आदर्श वाली मर्यादायें भी थीं। राम के वियोग में दुःखी सीता से रावण ने कहा है, “हे सीते! यदि तुम मेरे प्रति काम भाव नहीं रखती तो मैं तुझे स्पर्श नहीं कर सकता।” शास्त्रों के अनुसार वन्ध्या, रजस्वला, अकामा आदि स्त्री को स्पर्श करने का निषेध है अतः अपने प्रति अकामा सीता को स्पर्श न करके रावण मर्यादा का ही आचरण करता है।रावण में कितना ही राक्षसत्व क्यों न हो, उसके गुणों विस्मृत नहीं किया जा सकता। रावण एक अति बुद्धिमान ब्राह्मण तथा शंकर भगवान का बहुत बड़ा भक्त था। वह महा तेजस्वी, प्रतापी, पराक्रमी, रूपवान तथा विद्वान था। लेकिन अहंकार जैसा की सर्वविदित है बुद्धि हर लेता है ,अहंकार जब बुद्धि हर लेता है, तो ज्ञानियों और शुभचिंतकों की सलाह भी अनसुनी कर दी जाती है। इसका परिणाम सर्वनाश के रूप में होता है वही रावण के साथ हुआ ,उसके सब गुणों पर अहंकार भारी रहा जो उसके विनाश का कारण बना ! हम हिन्दू है ,भारतवासी है जहा हर साल हम अपने इष्ट के सम्मान में रावण जला कर उनकी स्तुति करते है …..शायद रावण की प्रशसा करने से डरते है कि कोई क्या कहेगा ,क्यूंकि हम लकीर के फ़कीर है .अच्छे कि अच्छाई को स्वीकार करने में भी डरते है !मै राम विरोधी या धर्म विरोधी नहीं .पर दुशमन कि अच्छाई को स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं है मुझे ! मेरा यह मानना है हर इंसान के ह्र्ध्य में राम और रावण (अच्छाई और बुराई .(रावण को बुराई का नाम मैंने इसलिए दिया क्यूंकि सदियों से हम -आप उन्हें यही संबोधन देते आये है ) बसते है !बस मौका मिलने की देर है .रावण अपना सर उठा लेता है !आज कितने रावण हमारे समाज में सर उठाये घूम रहे है-हरियाणा के विवादास्पद का गीतिका कांडा कांड ..राजस्थान के भवरी कांड के राजनैतिक हस्तिया , बैंगलोर का गैंगरेप.. 2008 में राजधानी दिल्ली से सटे नोएडा में 14 वर्षीया आरुषी तलवार की हत्या ,गुवाहाटी कांड ,अपहरण इस तरह की अनगिनत घटनाएँ हम रोज़ समाचार पत्रों में टीवी पर देख सुन रहे है क्या इनको अंजाम देने वाले राम है ?ये रावण है जो हर साल हमारे सामने रावण के पुतले जलाते है पर अपने अन्दर के रावण को नहीं मार सकते जो मौका पाते ही बुराई को अंजाम देते है …….. वासुदेव जी रामायण .महाभारत , गीता की हमें उतनी ही जानकारी है जितना हमे साहित्य में उपलब्ध है या जितना हमने पढा है इसमें विविधता हो सकती है पर यह हमारे विवाद का मुद्दा नहीं है बात यहाँ रावण और श्री राम के गुणों और अवगुणों के बखान की भी नहीं है ,बात है बुराई की जो आज भी हमारे समक्ष है उसे दूर करने की ! आप शायद पहली बार मेरे ब्लॉग तक आये है आपका स्वागत है , आपने समय दिया उसके लिए मै आपकी बहुत बहुत आभारी हु

    D33P के द्वारा
    October 24, 2012

    विजयादशमी के पावन पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएं.

    vasudev tripathi के द्वारा
    October 24, 2012

    आदरणीय दीप्ति जी,आपके ब्लॉग पर संभवतः पहली बार ही आया हूंगा और यह पहली-दूसरी बार ही होगा कि किसी ब्लॉग पर दोबारा आकार प्रतिक्रिया दे रहा हूँ। आप पुनः वहीं भ्रमित हो गईं और विशेषताओं अथवा गुणों को सद्गुण के रूप में मान रही हैं। गुण निरपेक्ष है, दुर्गुण सद्गुण चरित्र को स्पष्ट करते हैं। मैंने पहले ही लिखा कि शौर्य, पराक्रम, शास्त्रज्ञता, पांडित्य विशेषताएँ/गुण हैं सद्गुण नहीं..! उसने शिव की भक्ति की तो भी अपने स्वार्थ व संसार के त्रास के लिए! आपने जो श्लोक दिया है वह सन्दर्भ से हटकर दिया है। इस श्लोक में रावण का कथन उसकी सच्चरित्रता का द्योतक नहीं है, वह सीता को अपने कपट शब्दों में फंसाना चाहता था। यह वाल्मिकीय रामायण के युद्धकाण्ड में स्वयं रावण ने ही स्पष्ट किया है जब सभा में रावण से नारान्तक ने पूंछा कि आपने सीता को अशोक वाटिका में क्यों रख छोड़ा है, आप बलपूर्वक भी भोग की अपनी लालसा पूर्ण कर सकते हैं? रावण ने कहा कि दुर्भाग्य से मैं ऐसा नहीं कर सकता क्योंकि मैं एक नारी के श्राप से पीड़ित हूँ जिसका मैंने बलात्कार किया था। यदि मैं किसी स्त्री की इच्छा के बिना उसका भोग करूंगा तो वरदान (अमरता का) खंडित होकर मेरे मस्तक के टुकड़े टुकड़े हो जाएंगे। रावण असंख्य स्त्रियॉं के बलात्कार का अपराधी था, उसने असंख्य मानवों ऋषियों की हत्या की थी जैसा कि रामायण में बार बार आता है। उसकी जितनी भी विशेषताएँ आपने गिनाईं हैं उनका उसने संसार पर अत्याचार में प्रयोग किया। सीधी सी बात है रामायण की भूमिका ही यही है कि जब रावण के अत्याचारों से पृथ्वी त्राहि त्राहि कर उठी तो नारायण ने राम के रूप में अवतार लिया। यही हिन्दुओं का विश्वास है जिसे रामायण ने अत्याचार के विरुद्ध सृजित किया। फिर रावण सच्चरित्र कहाँ से हो जाएगा.? विशेषताओं की प्रशंसा रामायणकार ने मुक्त कंठ की है व हिन्दू समाज भी उसकी प्रशंसा करने में संकोच नहीं करता। किन्तु विशेषता को जो आपने सद्गुण सिद्ध करने का प्रयास किया वह निरर्थक व रामायण की भावना व उद्देश्य के ही विरुद्ध है। कई द्वेषभाव से पीड़ित लेखक संदर्भों को तोड़मरोड़ कर ऐसी पुस्तकें लिखते हैं, मैं उनसे परिचित हूँ। किन्तु आपसे निवेदन है कि आप रामायण को मूल में रखकर निष्कर्ष निकालें ऐसी किसी पुस्तक के आधार पर नहीं!! पूरी विनम्रता के साथ अपनी बात रखने के बाद आपके द्वारा ब्लॉग पर किए गए स्वागत के लिए आपको धन्यवाद देना चाहूँगा। साथ ही आपकी सोच सकारात्मक है इसके लिए भी आपको हार्दिक साधुवाद।

    D33P के द्वारा
    October 27, 2012

    वासुदेव जी पुनः स्वागत करने पर मै हर्षित हु . ………..सादर नमस्कार ………..न मुझे वाल्मीकि की रामायण से मतलब है न तुलसीदास जी के गुणगान से ..और न ही मेरा अभिप्राय रावण का गुणगान से है …..न मै राम विरोधी हु अभिप्राय केवल इतना है !हर साल रावण के पुतले को जलाने वाले ही समाज को कलंकित कर रहे है ,रावण दहन का उद्देश्य लोगो को बुराई का क्या हश्र होता है यही बताना है पर रावण दहन करने वाले ही बुराई में लिप्त है !आज समाज में क्या हो रहा है ? भ्रष्ठाचार .हत्या रेप अपहरण क्या कुछ नहीं हो रहा है जो लोग इन सबमे लिप्त है उनके अन्दर का रावण (बुराई ) नहीं मर सकता !ऐसे लोग रावण दहन करके क्या साबित करना चाहते है ………जलाना है तो अपने अन्दर की बुराई को जलाये ..रोज़ कागज़ का रावण जलाकर क्या होगा ?क्या आज लोगो को इतनी सी बात समझ में नहीं आती कि रावण अहंकारी था .चाहे जितने गुण हो पर उसकी बुराई ने उसका अंत किया ! वासुदेव जी आपकी प्रतिक्रिया के लिए मै आपकी आभारी हूँ

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
October 23, 2012

प्रतीक्षा करें , अभी काफी देर है | अभी और पराकाष्ठ पर पहुँचने दीजिए ! इन दैत्यों का दमन अवश्य होगा | नास्त्यत्र संदेहः ! दीप्ति जी ! साभिवादन !

    D33P के द्वारा
    October 24, 2012

    विजयादशमी के पावन पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएं. प्रतिक्रिया हेतु आपका बहुत बहुत धन्यवाद

rekhafbd के द्वारा
October 23, 2012

दीप्ति जी रावण ने जो किया वो एक स्वाभिमानी भाई की तरह एक भाई होने का फ़र्ज़ निभाया !लेकिन क्या आज कोई राम है जो देश की लुटती हुई सीताओ को बचा सके !विचारणीय आलेख ,दशहरा की हार्दिक शुभकामनाएं

    D33P के द्वारा
    October 24, 2012

    विजयादशमी के पावन पर्व पर आपको भी हार्दिक शुभकामनाएं.और प्रतिक्रिया हेतु आभार

pitamberthakwani के द्वारा
October 23, 2012

दीप्ति जी, आपने अपने ब्लॉग में अपने नामऔर फोटो की जगह तो ‘डी ३३ पी’ लिखा है ,दीप्ति तो कही नहीं देखा है ! फिर क्या और कैसे गलत हूँ? फिर भी माफी चाहूंगा! आपने जो जवाब दिया उससे मेरी जानकारी में इजाफा हुआ आभार! महाभारत के सवाल पर कुछ नहीं कहा, क्या मै मानकर चलूँ की आप इस बारे में नहीं बता स्सकेंगी?

    D33P के द्वारा
    October 24, 2012

    विजयादशमी के पावन पर्व पर आपको हार्दिक शुभकामनाएं. आपने सही कहा आपने जो देखा वही लिखा ” D33P ” मैंने महाभारत के बारे में भी जितना उपलब्ध हो सका पढा,,,और बहुत ही रुचिकर लगा ! यह विश्व का सबसे लंबा साहित्यिक ग्रंथ और साहित्य की सबसे अनुपम कॄतियों में से एक माना जाता है, ! पर इसको पढने के बाद मेरा व्यक्तिगत मत है यह केवल सत्ता के लिए लड़ा गया पारिवारिक युद्ध ही था आभार

Santlal Karun के द्वारा
October 23, 2012

आदरणीया, सीता-हरण सर्वथा अनुचित था, सूपर्णखा की नाक काटना भी उतना ही अनुचित था, उसके विवाह-प्रस्ताव को और सीता पर उसके प्रहार को और तरीके से टाला जा सकता था | आप ने महा प्रतापी लंकेश के जीवन और कर्म का प्रामाणिक वर्णन किया है और आज के रावणों से बखूबी जोड़ा है | इस अच्छे आलेख की ये पंक्तियाँ मुझे ज्यादा अपील करती हैं — ” क्या आज कोई भी स्त्री राम जैसे पति का वरण करना चाहेगी जो अपने जीवन का लम्बा समय पति के साथ वनवास का भोगने के बावजूद किसी की बातो में आकर गर्भवती अवस्था में उसका परित्याग कर दे ? आज उसी रावण को एक बार मारने के बाद रोज़ रोज़ मार कर उत्सव मनाया जाता है दुख का विषय है कि आज हम चाहे कितने ही रावण जला लें लेकिन समाज में कुसंस्कार और अमर्यादा के रावण रोज पनप रहे हैं। सीता के हरण पर रावण का वध करने और उत्सव मानाने वाले देश की कितनी सीताये रोज़ किसी न किसी रावण के हाथो बेइज्जत हो रही है,कभी गुवहाटी में सरे राह रावणों के बीच अपमानित होती है कभी दिल्ली में किसी सड़क पर दौड़ती बंद कार में .! देश में असली रावण तो आजाद घूम रहे है और उनके पुतले जलाकर किस बात के उत्सव मनाये जा रहे है ? दशहरे के नाम पर लाखो रूपये फूंके जा रहे है !!रावण ने जो किया वो एक स्वाभिमानी भाई की तरह एक भाई होने का फ़र्ज़ निभाया !लेकिन क्या आज कोई राम है जो देश की लुटती हुई सीताओ को बचा सके !” अभिनव कुकर्मी मनुष्य से जोड़कर इस पौराणिक आख्यानक लेख की प्रस्तुति पर हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

    D33P के द्वारा
    October 24, 2012

    आदरणीय  संतलाल जी नमस्कार विजयादशमी के पावन पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएं.स्वीकार करे आपका बहुत बहुत स्वागत है .आपने अपना कीमती समय दिया और ब्लॉग पर अपनी सकारात्मक प्रतिक्रिया दी जिसके लिए आपका आभार

yatindranathchaturvedi के द्वारा
October 23, 2012

यह पोस्ट साहित्य और राष्ट्रीय मर्यादा से वंचित हो गया, क्योंकि जो कल्पना की गयी है, अगर यह सच होजाय, तो वह काल्पनिक तीरंदाज……. तब देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद के लिए ऐसी कल्पना शत्रु देश ही करेंगे, कोइ भी देश भक्त नहीं।

    D33P के द्वारा
    October 24, 2012

    यतीन्द्र जी सादर नमस्कार .आप किस मर्यादा की बात कर रहे है ?गुवाहाटी के सरे राह एक लड़की को शिकार बनाने की बात को या सडको पर दौड़ती बंद कार से रेप के बाद सड़क पर फेंक दी गई लड़की की मर्यादा या राजस्थान के भवरी कांड में लिप्त सत्ता के दल्लो की मर्यादा या हरियाणा के सत्ता धारी द्वारा अंजाम दिए गए गीतिका-कांडा कांड की .ये तो कुछ मसले है जो लोगो की नज़र से गुजरे ……ऐसे अनगिनत कांड होंगे जो किसी को पता भी नहीं होंगे !हम भी इसी देश के नागरिक है ,ये देश हमारा है पर जो आज हालत है वो किसी भी सच्चे नागरिक को दुखी करने के लिए काफी है !दुखी होने वाले देश के दुश्मन नहीं है पर जो देश को गर्त में ले जा रहे है वो दुःख और देश के विनाश का कारण जरुर बन रहे है ! आप मेरे ब्लॉग तक आये आपका स्वागत है और प्रतिक्रिया के लिए आभार भी साथ ही विजयादशमी के पावन पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएं.स्वीकार करे

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
October 23, 2012

आदरणीया दीप्ती जी, सादर अभिवादन/ सस्नेह वास्तव में गंभीरता के साथ चिंतन योग्य विषय. बधाई.

    D33P के द्वारा
    October 24, 2012

    आदरणीय प्रदीप जी ,प्रणाम हर साल रावण के पुतले को जलाने वाले ही समाज को कलंकित कर रहे है  ,रावण दहन का उद्देश्य लोगो को बुराई का क्या हश्र होता है यही बताना है पर रावण दहन करने वाले ही बुराई में लिप्त है !हर वर्ष रावण दहन पर लाखो की धन राशि भी स्वाहा की जाती है !उसका उपयोग किया जा सकता है वास्तव में सब कुछ चिंतनीय है

October 23, 2012

दीप्ति जी नमस्कार , आपके खयालात मुझसे कितने मिलते हैं….मैं आपके रावण के बारे में जानकारी से आश्चर्य चकित हूँ। चूंकि मैं निजी तौर पर रावण जी का बहुत बड़ा प्रशंसक हूँ। आपकी ये पंक्तियाँ कितनी सच्छी है:———- “रावण की सीता हरण की एक गलती ने उसे ऐतिहासिक खलनायक बना दिया ……और राम को देवता की गद्दी पर विराजमान कर दिया !.लेकिन अगर देखा जाये तो क्या वो गलती थी .लक्ष्मण ने सूर्पणखा की नाक काट दी थी, जो रावण की बहन थी। इसी कारण रावण ने सीता का हरण कर लिया था !क्या एक स्वाभिमानी भाई की नज़र के नज़रिए से देखा जाये तो रावण अपनी जगह सही था।”….. आज तो गली गली में महा रावण हैं जो अपहरण के साथ बलात्कार भी करते हैं और उल्टे वही रावण का पुतला भी जलते हैं….बहुत ही सटीक वर्णन के भूरी भूरी प्रशंशा करता हूँ आपकी लेखनी की, । साभार

    D33P के द्वारा
    October 24, 2012

    आदरणीय सूरज जी ,बहुत अन्तराल के बाद आपके आगमन पर आपका स्वागत है ! दुश्मन के गुणों को खुले दिल से स्वीकार करने में कोई बुराई भी नहीं है ! आपकी सकारात्मक प्रतिक्रिया के लिए मै आपकी आभारी हु .आपने अपना कीमती समय दिया और ब्लॉग पर अपनी सकारात्मक प्रतिक्रिया दी जिसके लिए आपका आभार

    D33P के द्वारा
    October 24, 2012

    विजयादशमी के पावन पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएं.स्वीकार करे

vijay के द्वारा
October 23, 2012

आदरणीय दीप्ती जी नमस्ते ,सीताहरण को किसी भी तरीके से तर्कसगत नहीं ठराया जा सकता है अगर रावण ने सही किया था तो वर्तमान हालात में नारी पर अत्याचार को भी लोग सही सिद्ध करने के तर्क प्रस्तुत कर देगें बदले की भावना से किया जाने वाला कृत्य किसी भी युग में सही नहीं कहलाया जा सकता है लेकिन आपकी लेखन शेली, और प्रस्तुतीकरण निश्चित ही आदित्य है उपरोक्त वर्णित विचार को छोड़ सभी विचारो से सहमती, सुंदर लेख के लिए बधाई

    D33P के द्वारा
    October 23, 2012

    विजय जी नमस्कार ,आपने सही कहा हरण किसी भी हालत में सही नहीं कहा जा सकता !हमारे देश में जहाँ एक सीता के हरण की सजा के रूप में सदियों से हर वर्ष रावण को जलाया जा रहा है रावण तो जल गया . पर उसी देश में रावण जलाने वालो के अन्दर के रावण को कौन जलाएगा , कितने रावण आज भी जिन्दा है उनका क्या ?कभी दहेज़ की मांग पे ,कभी बहु को जिन्दा जलाने के नाम पर ,कभी सरे राह बेटियों की अस्मत लूटने के नाम पर ,कभी गरीबो का हक लूटने के नाम पे .कितने रावण आज भी सर उठाये घूम रहे है! प्रतिक्रिया के लिया मै आपकी आभारी हु …

pitamberthakwani के द्वारा
October 23, 2012

सुश्री डी १३ पी , नमस्कार , आपकी पोस्ट से जो ज्ञान मिला वह अमूल्य है! आपने लिखा है रावण,कुम्भकरण,और सूर्पनखा,विशार्वा और कैकसी से हुए , जब की हमारी जानकारी है की कुबेर और विभीषण दो पुत्र और थे! कुल मिलाकर कैकसी के ४ पुत्र और एक पुत्री थी!कुल ५ संताने थी! क्या सही है औउर क्या गलत ? इस पर विचार कर बताने का कष्ट करें! आप क्या महाभारत के बारे में भी जानकारी रखती है? बताये! आप अपने बारे मे और जानकारे दे सकें तो आभारी होऊंगा!आभार!

    D33P के द्वारा
    October 23, 2012

    पीताम्बर जी नमस्कार ……….. (१) ब्लॉग तक आने के लिए आपने अपना अमूल्य समय दिया उसके लिए आभार (२) ऋषि विश्रवा ने ऋषि भारद्वाज की पुत्री इडविडा से विवाह किया था। इडविडा ने दो पुत्रों को जन्म दिया जिनका नाम कुबेर और विभीषण था। विश्रवा की दूसरी पत्नी कैकसी से रावण, कुंभकरण और सूर्पणखा का जन्म हुआ। (कुल मिलकर ऋषि विश्रवा की पांच संताने हुई )और इस प्रकार कुबेर और विभीषण रावण के सौतेले भाई थे ! एक निवेदन और ……. डी १३ पी नहीं दीप्ति नाम है हमारा ,रेल गाड़ी तो न बनाइये….LOL


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